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केवी में कोटे के अंदर कोटा गैरकानूनी

New Delhi

Updated Sat, 10 Nov 2012 12:00 PM IST
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने केंद्रीय विद्यालयों में कमजोर वर्ग, एससी/एसटी, विकलांग आदि के लिए आरक्षित 25 प्रतिशत सीटों में से 22 प्रतिशत सीटें एससी/एसटी वर्ग के लिए निर्धारित करने के फैसले को गैरकानूनी ठहराते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि केंद्रीय विद्यालय द्वारा दाखिले के लिए निर्धारित उक्त दिशा-निर्देश शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 का उल्लंघन हैं। अदालत ने उसे नए सिरे से दाखिला दिशा-निर्देश बनाने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश डी. मुर्गेसन व न्यायमूर्ति राजीव सहाय एंडलो की खंडपीठ ने कहा कि 22 प्रतिशत सीटें मात्र एससी/एसटी के लिए आरक्षित करने संबंधी केंद्रीय विद्यालय संगठन के दिशा-निर्देश की धारा 5-3 सरासर अन्य बच्चों के अधिकारों का हनन कर रही है। शैक्षिक सत्र 2013-14 में दाखिले के लिए दिशा-निर्देश नए सिरे से तय किए जाएं। खंडपीठ ने यह फैसला सोशल ज्युरिस्ट संस्था की याचिका का निपटारा करते हुए दिया है। याची ने आरोप लगाया कि संगठन का यह रवैया मनमाना, अव्यवहारिक व कमजोर वर्ग, विकलांग आदि बच्चों को मिले शिक्षा के अधिकार का हनन है। देशभर के करीब एक हजार और दिल्ली के 50 केंद्रीय विद्यालयों में पहले कुल सीटों में से 25 प्रतिशत सीटें कमजोर वर्ग, एससी/एसटी, विकलांग आदि बच्चों के लिए आरक्षित थीं। लेकिन कोटे के अंदर कोटा यानी 22 प्रतिशत सीटें एससी/एसटी के लिए आरक्षित कर दी गईं। ऐसा करने से यह आरक्षण एक तरह से 90 प्रतिशत बैठता है।
याची के तर्क
याची के अनुसार यदि संगठन को एससी/एसटी को आरक्षण देना है तो सामान्य वर्ग से आरक्षण देना चाहिए और पहले से निर्धारित कोटे से कोटा देने से अन्य बच्चों के लिए कोई सीट ही नहीं बचेगी। किसी स्कूल में यदि 40 सीटें है तो आरक्षण के तहत 10 सीटें कमजोर वर्ग, एससी/एसटी, विकलांग आदि वर्ग के लिए आरक्षित हो जाती हैं। यदि संगठन के नए नियम को माना जाए तो एससी/एसटी वर्ग के लिए निर्धारित 22 प्रतिशत आरक्षण के अनुसार 10 में से 9 सीटें हो जाएंगी और मात्र एक सीट बाकी के लिए बचेगी। आखिर एक सीट किस-किस को आवंटित होगी। अत: संगठन के उक्त निर्णय को खारिज किया जाए।
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