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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

New Delhi

Updated Thu, 27 Sep 2012 12:00 PM IST
नई दिल्ली। दिल्ली में कोर्ट फीस बढ़ाए जाने की अधिसूचना पर हाईकोर्ट की ओर से जारी आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने अधिसूचना पर रोक लगा दी थी। सर्वोच्च अदालत के आदेश के बाद दिल्ली सरकार के लिए कोर्ट फीस बढ़ाने का रास्ता अंतरिम तौर पर साफ हो गया है।
जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय की पीठ ने दिल्ली सरकार की ओर से दायर याचिका पर हाईकोर्ट के 9 अगस्त के अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी। दिल्ली सरकार ने कहा कि विधायिका की ओर से पारित दिल्ली कोर्ट फीस (संशोधन) अधिनियम, 2012 पर हाईकोर्ट की ओर से लगाई गई रोक कानून सम्मत नहीं है। कोर्ट फीस बढ़ाकर सरकार आर्थिक सुधारों की तरफ कदम बढ़ा रही है। सरकार का मकसद आर्थिक विकास को बढ़ाना है। सरकार ने इस तथ्य को भी गलत बताया, जिसमें कहा गया है कि यदि बढ़ी दरों के खिलाफ दायर याचिका अंतिम सुनवाई के बाद स्वीकार कर ली जाती है तो बढ़ी हुई कोर्ट फीस को लौटाना मुमकिन नहीं होगा।
सरकार ने दावा किया कि ऐसी स्थिति में फीस की वापसी में कोई मुश्किल नहीं होती क्योंकि कोर्ट फीस का भुगतान करने वाले मुवक्किल और उसके वकील का सारा ब्यौरा रिकॉर्ड किया जाता है। सरकार ने यह भी कहा कि नौ अगस्त के आदेश के बाद याचिका सुनवाई के लिए तीन बार सूचीबद्ध हुई, लेकिन सुनवाई न होने की वजह से रोक का आदेश नहीं हटा। जबकि दिल्ली सरकार को इससे हर रोज लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
कोर्ट फीस 54 साल के लंबे अंतराल के बाद बढ़ाई गई जबकि इतने वर्षों में न्यायिक प्रशासन पर खर्च कई गुना बढ़ गया है। 1958 में न्यायिक प्रशासन पर सिर्फ छह लाख रुपये सालाना खर्च होता था जबकि अब यह बढ़कर 576 करोड़ रुपये हो गया है। न्यायिक प्रशासन के मद में खर्च होने वाली रकम का महज 20 प्रतिशत हिस्सा ही कोर्ट फीस के जरिए प्राप्त होता है। न्यायिक प्रशासन पर व्यय होने वाली रकम का बहुत थोड़ा भाग ही कोर्ट शुल्क के रूप में सरकार को मिलता है। बता दें कि याचिका में दिल्ली सरकार ने कहा है कि दो साल की लंबी कवायद के बाद कोर्ट फीस बढ़ाने का फैसला सरकार ने लिया है। जुलाई 2010 में हाईकोर्ट की कंप्यूटर कमेटी और दिल्ली सरकार की गठित उपसमिति ने कोर्ट फीस की समीक्षा की सिफारिश की थी। इसके बाद जुलाई 2011 में दिल्ली सरकार की कैबिनेट ने प्रस्ताव को मंजूरी दी। जून 2012 में दिल्ली विधानसभा ने संशोधित विधेयक को पारित किया, जिसे अगले ही महीने राष्ट्रपति ने स्वीकृति दी। 31 जुलाई को उपराज्यपाल ने अधिसूचना जारी कर दी और नई दरें एक अगस्त से लागू हो गईं, लेकिन नौ अगस्त को हाईकोर्ट ने बिना किसी स्पष्ट कारण के रोक लगा दी।
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