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संसद के गेट तक पहुंचा आंदोलन

New Delhi

Updated Mon, 27 Aug 2012 12:00 PM IST
नई दिल्ली। समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार की जो लड़ाई बार-बार जंतर-मंतर तक पहुंच कर ठिठक जाती थी, उसे अरविंद केजरीवाल ने संसद के गेट तक पहुंचा दिया। इस बार न अन्ना हजारे थे और न कार्यकर्ताओं का जोश बढ़ाने वाली ‘मैं अन्ना हूं’ लिखी उतनी टोपी। नेतृत्व भी अरविंद केजरीवाल का था और टोपी भी। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्यों ने रविवार को पूरे दिन दिल्ली पुलिस को जमकर छकाया। वहीं दोनों बड़ी पार्टियों कांग्रेस-भाजपा को यह संदेश भी दे दिया कि अगर उन्हें बेहतर राजनीतिक नेतृत्व मिले तो वे भी किसी राजनीतिक कार्यकर्ता से कम जोशीले नहीं हैं।
भ्रष्टाचार की लड़ाई को राजनीतिक विकल्प और संसद के अंदर पहुंचकर लड़ने के संकल्प के साथ अन्ना हजारे ने इस बार का अनशन तोड़ा था। इसके बाद उनके समर्थकों के बीच मायूसी दिखी थी। टीम अन्ना के भंग होने के बाद यह पहला मौका था, जिसे सदस्यों की एकजुटता और कार्यकर्ताओं के जोश ने तय मुकाम पर पहुंचाया। यह अलग बात है कि भाजपा के विरोध को लेकर किरण बेदी आंदोलन से दूर रहीं। रविवार को छुट्टी के दिन दिल्ली-एनसीआर के लोग खासकर युवाओं को इतनी बड़ी संख्या में सड़कों पर उतारना बदली रणनीति का हिस्सा है। इस आंदोलन ने यह साबित किया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी गई लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। वहीं अंदरूनी विरोध के बावजूद अरविंद केजरीवाल का कद और बढ़ा है। केजरीवाल अपनी इस भूमिका की तैयारी पहले से कर रहे थे। जंतर-मंतर पर अन्ना से तीन दिन पहले अनशन पर बैठने का फैसला भी इसी कड़ी का हिस्सा था। रविवार को हजारों कार्यकर्ता न सिर्फ सड़कों पर उतरे, बल्कि पुलिस की लाठियों, आंसू गैस के गोलों और वाटर कैनन का भी सामना किया। इतना ही नहीं जिन बसों में आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को ले जाने की कोशिश की गई, तो उसकी हवा निकालकर कार्यकर्ता सुबह से शाम तक रणनीति बदलते रहे। केजरीवाल की लोगों से घरों में लौटने की अपील के बाद भी कार्यकर्ता घर न जाकर जेल जाने को तैयार थे। साफ है कि लोगों को अभी राजनीतिक विकल्प के तौर पर भले ही बेहतर नेताओं की कमी और सशक्त नेतृत्व न दिख रहा हो, लेकिन कार्यकर्ताओं ने साबित कर दिया है कि वे किसी अन्य राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं से अधिक जुझारू हैं।
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