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सिद्धपीठ गोदेश्वर महादेव भरते हैं सबकी गोद

अमर उजाला, देहरादून

Updated Wed, 29 Jan 2014 03:36 PM IST
sidhpeeth gopeshwar mahadev mandir
उत्तराखण्ड देवभूमि में कई सिद्धपीठ, देवस्थल अपनी सिद्धता के लिए प्रसिद्ध हैं। श्रद्धापूर्वक व्रत रखने एवं पूजा करने से अतिशीघ्र से भगवान शिव शंकर खुश हो जाते हैं।
हजारों साल पुराने शाल वृक्ष के नीचे है मंदिर
उस ही निराकार महादेव का मंदिर उत्तराखंड ग्राम ठंटोली, पो0ओ0 कठूडबड़ा, पटटी मल्ला ढ़ांगू, पौडी गढ़वाल में शिवलिंगाकार पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है, जहां यह मंदिर हजारों साल पुराने शाल वृक्ष के नीचे है। यह मंदिर ग्यारह गांव से घिरा हुआ है।

इसलिए है गोदेश्वर महादेव का महत्व
इस मंदिर का महात्म्य यह है कि जो निसंतान दंपति श्रावण एवं माध मास के प्रत्येक सोमवार को अथवा शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष की चतुर्थदर्शी तिथि को भगवान शंकर का व्रत रखकर पूजा-अर्चना के साथ जलाभिषेक करते हैं।

भगवान भोलेनाथ उनकी गोद में संतान देकर उनकी मनोकामना पूर्ण करते हैं। संतान रूपी फल प्राप्ति के आधार पर इस मंदिर का नाम गोदेश्वर महादेव पड़ा है।

इतिहास
इस मंदिर के बारे में यह कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व पहाड़ी की तलछट में बसे गाँव के ग्वालों ने गाय चुगाते समय इस स्थान पर लिंगाकार रूप में एक पत्थर देखा और इस पत्थर को खोदकर निकालने की ‌कोशिश की। पत्थर का अंत न मिलने पर थक हार कर अपनी गायों के साथ वापस गांव चले गये।

उसी रात भगवान गोदेश्वर महादेव ने गांव के एक वृद्ध ब्राह्नमण को सपने में दर्शन देकर उस स्थान पर अपनी उपस्थिति व्यक्त की तथा शाल वृक्ष के नीचे पूजा स्थल बनाने की बात कही। ग्रामीणों द्वारा तत्काल पूजा स्थल तैयार किया गया तथा जलाभिषेक के लिए पत्थर का एक कुंड भी रखा गया।

कहते हैं कि सुदूर गांव से एक किसान की गाय स्वतः अपने खुटें से खुलकर इस मंदिर में प्रातःकाल पहुंचते ही पत्थर के कुंड में अपना दूध प्रवाहित करके वापस चली जाती थी। एक दिन किसान ने गाय का पीछा किया और देखा कि गाय अपना दूध पत्थर कुंड में डाल रही है।

क्रोधित होकर उस किसान ने गाय के सामने ही उस कुंड को कुल्हाड़ी से तोड़ दिया। आज भी यहां श्रद्वालु दूध मिश्रित जल की धारा सूर्यार्घ देते समय कुंड में प्रवाहित करते हैं और फिर उसका अभिषेक लेते हैं।

निराली प्राकृतिक छटा
मनोरम प्राकृतिक दृश्य से भरपूर सिद्धपीठ गोदेश्वर महादेव मंदिर के उत्तर-पश्चिम में एक छोटी नदी बहती है, इस नदी की धारा में लगभग दो सौ फीट सीधे नीचे झरना बहता है, इस झरने का नाम भी गोदेश्वर झरना है।

यह गढ़वाली में गोदंयू छिछाड़ नाम से विख्यात है। मंदिर के उत्तर-पूर्व में भी एक नदी बहती है जिसे ग्वील नदी कहते हैं। दोनों का संगम ठंटोली गांव की तलहटी पर होता है। मंदिर में घंटा एवं शंखनाद होने पर उसकी गूंज ग्यारह गांवों के इलाके में पहुंचती है।

ऐसे पहुंचे
मंदिर में पहुंचने के लिए ऋषिकेश से लैंसडोन मार्ग वाया गैड़खाल तथा कोटद्वार मोटर मार्ग से वाया सलोगी होते हुए आने वाले यात्री प्राकृतिक सुन्दरता का आनंद लेते हुए जाखनी खाल में उतरने के बाद लगभग तीन मील पैदल मार्ग चलते हुए सिद्धपीठ गोदेश्वर महादेव मंदिर पहुंचते हैं।

यहां पहुंचते ही श्रद्धालु की सारी थकान दूर हो जाती है और मनचित शांति पाकर आनन्दित हो जाता है। भगवान गोदेश्वर महादेव सभी श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण करते हैं।
(वागीश मोहन कण्डवाल, देहरादून)
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