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पहाड़ी क्षेत्रों में खड़ा होगा पानी का संकट

देहरादून/ब्यूरो

Updated Sat, 03 Nov 2012 03:54 PM IST
water crisis may begin in mountain areas
अगर हिमालयी क्षेत्रों के छोटे ग्लेशियरों के लिए वक्त पर कोई बड़ा कदम नहीं उठा तो पहाड़ी समुदायों के लिए पानी का संकट खड़ा होना तय है। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर हालिया हुए अध्ययनों के आधार पर 16-20 मीटर प्रतिवर्ष आंकी गई है, लेकिन कम ऊंचाई पर स्थित छोटे ग्लेशियरों में यह दर अपेक्षाकृत बढ़ी है। तकरीबन एक मीटर। लिहाजा, इनके पिघलने की औसत संयुक्त दर 30 मीटर से 50 मीटर तक पहुंच गई है।
इस बात का खुलासा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बंगलूरू के दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज के वैज्ञानिक अनिल वी कुलकर्णी ने किया। वे वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान में शुक्रवार से शुरू हुई इंडियन एकेडमी आफ साइंसेज बंगलूरू की 78वीं वार्षिक संगोष्ठी में बतौर ग्लेशियर विशेषज्ञ पहुंचे थे। उन्होंने ‘स्टेट आफ हिमालयन ग्लेशियर्स’ पर अपना पेपर पेश किया। उनके मुताबिक ब्लैक कार्बन के साथ ही अन्य मानवीय गतिविधियों की वजह से भविष्य में इनके प्रभावित होने का खतरा सामने खड़ा है।

आईपीसीसी की रिपोर्ट के साथ ही एमओईएफ को भी घेरा
आईपीसीसी की 2035 तक ग्लेशियरों के लुप्त हो जाने की रिपोर्ट के साथ ही वन एवं पर्यावरण मंत्रालय (एमओईएफ) के पेपर पर भी चर्चा हुई। इस पेपर में कहा गया था कि एक बड़ा ग्लेशियर वॉर्मिंग से जहां एक हजार से 10 हजार साल में प्रभावित होता है, वहीं छोटे ग्लेशियर पर इसका असर सौ से एक हजार साल में देखने को मिल सकता है। एक अन्य बात उन्होंने 11वीं सदी के मध्य काल या छह हजार वर्ष पूर्व हुई नेचुरल वॉर्मिंग से प्रभावित होने की कही। कहा कि यह सारी बातें हिमालय गतिकी को पूरी तरह न समझ पाने की वजह से उत्पन्न हुई हैं।
 
स्नो हारवेस्टिंग बचा सकती है ग्लेशियरों का भविष्य
दूसरे देशों की तरह भारत में भी स्नो हारवेस्टिंग ग्लेशियरों के पिघलने से होने वाले नुकसान की भरपाई कर सकती है। वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. अनिल कुमार गुप्ता के अनुसार इसमें बर्फ वाले स्थानों पर ऐसा ढांचा तैयार किया जाता है, जिसमें बर्फ के पिघलने की दर कम हो जाती है। ग्लेशियर अधिक समय तक कायम रहते हैं।

पिघल ही नहीं रहे बल्कि एडवांस भी हो रहे ग्लेशियर
हिमालयी ग्लेशियर केवल पिघल ही नहीं रहे बल्कि कहीं-कहीं एडवांस भी हो रहे हैं। इस संदर्भ में लद्दाख का जिक्र किया जा सकता है। हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियरों के प्रारंभिक स्वरूप पर होने वाला शोध साबित करता है कि पृथ्वी विकासक्रम में सर्वप्रथम बर्फ के एक गोले के रूप में थी, जिसे वैज्ञानिकों ने अपनी भाषा में स्नो बॉल कहा। यही पहला ग्लेशिएशन था।

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