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अपनों के मारे कई ‘सितारे’

Dehradun

Updated Mon, 17 Dec 2012 05:30 AM IST
ऋषिकेश। हाल ही में रिलीज गढ़वाली एलबम ‘हीरा समधणी’ के एक गीत ‘नरु मा नारेण’ ने पहाड़ की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में एक नई बहस छेड़ दी है। लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी और गजेंद्र राणा के बहाने दबी जुबान से ही सही इस क्षेत्र से जुड़े अन्य लोगों और अतीत की घटनाओं को भी कुरेदने की कोशिश हो रही हैं, जिनमें कइयों को नए और प्रतिभाशाली कलाकारों को हतोत्साहित करने के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया है।
सन् 1993 में टी-सीरीज कंपनी से विरेंद्र सिंह रावत की आवाज में ‘चौंठी मा कू तिल’ शीर्षक से एक एलबम बाजार में आया और काफी चर्चित रहा। लेकिन इस कलाकार को उस बैनर से दोबारा न्योता नहीं मिल पाया, जिसके लिए कंपनी के तत्कालीन सलाहकार और एक नामी कलाकार से जुड़े व्यक्ति को जिम्मेदार माना गया। ऐसा ही वाकया लोक गायक संतोष खेतवाल के बारे भी बताया जाता है, जिसमें उन्हें 1995 में ‘प्यारी छुमा’ फिल्म के गीतों के सुपर डुपर हिट होने के बाद इसी कंपनी द्वारा बाकायदा रिकार्डिंग का आमंत्रण मिला, मगर तीन बार रिकार्डिंग की डेट्स मिलने के बावजूद ऐन मौके पर रिकार्डिंग कैंसिल कर दी गई। एक गढ़वाली फिल्म के निर्माता और अभिनेता का कहना है कि उत्तराखंड बनने के बाद राज्य में कलाकारों को एकजुट करने और उनके हितों के लिए एसोसिएशन बनाने का प्रयास किया गया था मगर, इस प्रयास की असफलता में भी एक नामी कलाकार की भूमिका रही है। इसी तरह कई लोग भारी भरकम नामों के आगे कुछ भी बोलना सही नहीं मानते हैं। बीते ढाई दशक के अंतराल में पहाड़ की सांस्कृतिक भूमि में कई ऐसे लेखक और गायक रहे जिन्हें प्रतिभा के बावजूद मंच नहीं मिल पाया।

इंसेट
कंपनियों ने भी किया नवोदितों का शोषण
ऋषिकेश। बीते दौर में नई प्रतिभाओं को ऑडियो रिकार्डिंग का मौका ही बमुश्किल मिल पाता था। कारण कंपनियों के साथ उनके कथित सलाहकार बने कई गायक, संगीतकार नवोदित कलाकारों का मनमाना शोषण करते रहे हैं। उन्हें कला के एवज में मानदेय दिलाना तो दूर रिकार्डिंग और कैसेट रिलीज होने पर पूरी कीमत भी उनसे वसूली जाती थी। कमोबेश यह सिलसिला आज भी जारी है। फर्क इतना आया है कि तब संगीत कंपनियों के मालिक गैर पहाड़ी थे, और अब अपने ही लोग इस काम को अंजाम दे रहे हैं।
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