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मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है.....

Dehradun

Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
देहरादून। जगजीत सिंह की गाई एक गजल का शेर ‘मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, मेरे हक में क्या फैसला देगा...’, मानवाधिकार के मामलों में सटीक बैठता है। पुलिस से जुड़े मानवाधिकार के अधिकतर मामलों में जांच का जिम्मा उसी थाने के पास होता है, जिस थाने के किसी कर्मचारी-अधिकार पर मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगा होता है। ऐसे में भला न्याय की कितनी उम्मीद की जा सकती है।
पुलिस द्वारा कई दिनों तक हिरासत में रखकर यातनाएं देने, झूठे मामलों में फंसाने, कथित मुठभेड़ में मार गिराने की आशंकाएं या फिर हिरासत में मौत जैसे मामले। ऐसे अधिकतर मामलों में आयोग से जांच के लिए मिले आदेश में शिकायतें ही झूठी बता दी जाती हैं। इसके कारण प्रारंभिक स्तर पर ही आरोपों से घिरे पुलिस कर्मी साफ बच जाते हैं। पहले जांच अपर पुलिस अधीक्षक स्तर से होती थी, लेकिन अब सीओ स्तर पर ही इनका निस्तारण कर दिया जाता है। गंभीर मामलों में ही आयोग स्तर से कोई अधिकारी जांच के लिए आता है। पुलिस हिरासत में हुई अनिल बरसाती की मौत में भी कुछ ऐसा ही हुआ। यह बात अलग है कि नैनीताल हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद मामले की जांच सीबीआई के सुपुर्द कर दी गई। रणवीर एंनकाउंटर में जरूर मानवाधिकार आयोग ने आरोपी पुलिसकर्मियों पर शिकंजा कसा था।
83 में से 76 जांचों का निस्तारण
देहरादून। 2012 के बीत गए महीनों में मानवाधिकार आयोग से पुलिस को 83 शिकायतें मिली थी। जिनमें से 76 जांचों का पुलिस अब तक निस्तारण कर चुकी हैं, जबकि सात मामले अभी विचाराधीन है। हालांकि पिछले साल के मुकाबले शिकायतों का आकंड़ा तो बढ़ा है, लेकिन किसी भी शिकायत को लेकर पुलिस के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है।
कैसे करे पुलिस नियमों का पालन?
देहरादून। मानवाधिकार आयोग के नियमों को लेकर प्रचार होने के साथ पुलिस विभाग में भी काफी हो-हुल्ला है, लेकिन कई ऐसी व्यवहारिक दिक्कतें हैं, जिसका पुलिस चाहकर भी पालन नहीं कर सकती। मसलन, किसी भी अपराधी को पकड़कर थाने रखने के लिए पुलिस के पास केवल 24 घंटे का समय होता है। इस अवधि में पूछताछ के साथ माल बरामदगी करना किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसे में पुलिस जानबूझकर उसकी गिरफ्तारी दिखाने में देरी करती है। दूसरा नियम यह भी है कि गिरफ्तारी के साथ इस अवधि में ही पकड़े गए व्यक्ति के परिजनों को भी सूचना देनी जरूरी है। शातिर अपराधी और उनके पैरोकार आयोग के नियमों का सहारा लेकर पुलिस से पेशबंदी भी करते हैं। खासतौर से संगीन मामलों में पुलिस को कार्रवाई के लिए पूरा समय नहीं मिल पाता है। जिसका सीधा फायदा अपराधियों को मिलता है। तीसरी दिक्कत यह है कि पूछताछ के लिए पकड़कर थाने लाए जाने वाले हर व्यक्ति का पूरा हिसाब जीडी में दर्ज करना चाहिए, जो व्यवहारिक तौर पर बड़ा कठिन है।
‘मानवाधिकार आयोग से आने वाली तमाम शिकायतों को गंभीरता से लेकर जांच-पड़ताल कराई जाती हैं। काफी शिकायतें पेशबंदी से जुड़ी होती हैं, जबकि कुछ संज्ञान लेने लायक नहीं होती।’
-केवल खुराना, एसएसपी देहरादून
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