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घाटों को छोड़ मध्य में सिमटी गंगा

Dehradun

Updated Tue, 27 Nov 2012 12:00 PM IST
ऋषिकेश। तीर्थनगरी में इस साल शीतकाल में गंगा घाटों को छोड़कर काफी दूर चली गई है। लोग इसका कारण गंगा और सहायक नदी अलकनंदा पर बांधों की शृंखला का असर बता रहे हैं। वह इसे नदी के अस्तित्व के लिए खतरनाक संकेत मान रहे हैं।
बांधों के कारण जगह-जगह रोकी जा रही नदियों की धारा का असर अब तीर्थनगरी में भी दिखने लगा है। स्वर्गाश्रम क्षेत्र में इन दिनों गंगा के मध्य भाग तक सूखने से किनारों पर रेत के टापू उभर गए हैं। इसके चलते स्नानार्थियों को डुबकी लगाने के लिए जोखिम उठाकर गंगा के बीच तक जाना पड़ रहा है। वहीं, त्रिवेणीघाट और सामने वाले छोर पर भी रेत और पत्थरों के टीलों का आकार काफी बढ़ गया है। जानकार इसका कारण ग्लेशियरों का कम पिघलना और बांधों में विद्युत उत्पादन के लिए अत्यधिक वाटर स्टोरेज बता रहे हैं। इससे न सिर्फ गंगा के प्रति आस्था और विश्वास रखने वालों की परेशानी बढ़ गई हैं, बल्कि पानी की कमी के कारण चीला जलविद्युत परियोजना में भी बिजली उत्पादन महीनों से प्रभावित है।
स्वर्गाश्रम निवासी डॉ. नारायण सिंह रावत, लक्ष्मणझूला निवासी अनिल मेहरोत्रा का कहना है कि बीते चार दशक में गंगा मध्य तक कभी सूखी हुई नहीं दिखी। मगर, बांधों में पानी के रुकने से गंगा की जलधारा इस साल सिमटती नजर आ रही है।
उधर, केंद्रीय जल आयोग के अनुसार हर साल गंगा के जलस्तर में इन दिनों गिरावट आंकी जा रही है। गत वर्ष अक्तूबर-नवंबर माह के सापेक्ष इस साल जलस्तर कम आंका गया है। उत्तराखंड जल विद्युत निगम के अधिशासी अभियंता आईएम करासी के अनुसार इन दिनों पानी का डिस्चार्ज कम मिल रहा है, जिससे चीला में गतवर्ष के मुकाबले विद्युत उत्पादन लगभग 20 हजार यूनिट कम हो रहा है।

तालमेल के बिना खतरा भी बरकरार
बांधों से पानी छोड़े जाने को लेकर परियोजना प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन-पुलिस में कई दफा आपसी तालमेल का अभाव दिखता है। ऐसे में यदि अचानक टिहरी बांध से पानी छोड़ा जाता है तो डुबकी लगाने के लिए टापूओं को पार कर गंगा के मध्य तक पहुंचने वाले स्नानार्थियों के लिए खतरे की स्थिति भी पैदा हो सकती है।

क्या कहते हैं संत
प्रख्यात कथा वाचक गोपालमणि बताते हैं कि गंगा पूर्वजों के उद्धार के लिए धरती पर आई है। यह सामान्य नदी नहीं है। 1916 में ब्रिटिश सरकार ने गंगा पर बांध निर्माण की योजना बनाई थी, जिसका पूरे देश में विरोध हुआ था। इसके बाद अंग्रेजों को गंगा के महत्व का पता चला तो उन्होंने यह योजना स्थगित ही नहीं की देवनदी को विशेष दर्जा भी दिया।


नवंबर माह का पांच साल का अनुमानित वाटर डिस्चार्ज
2008- 336.85 मीटर
2009-336.48 मीटर
2010-336.15 मीटर
2011-337.15 मीटर
2012 (चालू माह में)- 336.70
केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के अनुसार
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