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‘एअरोसॉल पार्टिकल्स’ बिगाड़ रहे हिमालयी क्षेत्र की जलवायु

Dehradun

Updated Thu, 22 Nov 2012 12:00 PM IST
देहरादून। लगातार बढ़ रहे वाहन, औद्योगिक इकाइयां और धूल भरी आंधियाें से हिमालयी रीजन की जलवायु में तेजी से परिवर्तन आ रहा है। इस वजह से पिछले कुछ वर्षों में जमीन से करीब तीन किलोमीटर की ऊंचाई पर ‘एअरोसॉल पार्टिकल्स’ की परत जमा हो रही है। इसकी वजह फेफड़े और ह्दय की बीमारी, फसलों में पैदावार की कमी और पेयजल प्रदूषण बढ़ रहा है। यह निष्कर्ष इसरो, और नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के विशेषज्ञों की शोध से निकला है। एअरोसॉल पार्टिकल की बढ़ रही संख्या का आंकलन करने के लिए लीडार की मदद ली जा रही है। अब तक जो आंकड़े मिले हैं, वे चौंकाने वाले हैं। इनके मुताबिक एअरोसॉल पार्टिकल्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में गर्मी के समय में ज्यादा असर डालते हैं। क्योंकि हवा गर्म होने की वजह से यह ऊपर उठते रहते हैं। हालांकि अभी उत्तराखंड में इनका असर काफी कम है।
क्या है एअरोसॉल पार्टिकल
उद्योगों से निकलने वाला धुआं, धूल, भूकंप और ज्वालामुखी फटने की वजह से जो भी गैस या कण हवा में तैरते हुए ऊपर पहुंचते हैं, उन्हें एअरोसॉल पार्टिकल कहा जाता है। इन हानिकारक पार्टिकल्स में ओजोन, कार्बनडाई आक्साइड, मीथेन और सल्फरडाई आक्साइड के होते हैं। जो फसलों और सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं।

रडार और लीडार
रडार हवा, तापमान और वर्षा के रुख का पता लगाते हैं जबकि लीडार की किरण हानिकारक कणों के बीच पहुंचकर उनकी स्थिति का जायजा लेती है।

एअरोसॉल पार्टिकल की कहां कैसी स्थिति
उत्तराखंड में-5 प्रतिशत--(पिछले सात वर्षों में बनी है यह स्थिति)
कानपुर उप्र-70 प्रतिशत
बंगलूरू--28 प्रतिशत

कोट--
एअरोसॉल पार्टिकल का लगातार बढ़ना चिंता का विषय है। जलवायु में लगातार हो रहे परिवर्तन का एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है। अभी तक जो भी शोध हुए हैं उसमें पाया गया है कि जहां जहां भी वाहनों और उद्योगों की संख्या बढ़ रही है वहा यह दिक्कत आ रही है।-प्रोफेसर राम सागर निदेशक आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान
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