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सात महिलाएं ‘राज्य स्त्री शक्ति तीलू रौतेली’ पुरस्कार से सम्मानित

Dehradun

Updated Wed, 17 Oct 2012 12:00 PM IST
देहरादून। नवरात्र के प्रथम दिवस महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग ने स्त्री शक्ति को नमन किया। यहां सम्मानित किया गया ऐसी सात महिलाओं को जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में न सिर्फ बहादुरी दिखाई बल्कि समाज के लिए एक मिसाल कायम की। मंगलवार को इन महिलाओं को ट्रॉफी के साथ दस-दस हजार रुपये प्रदान किए गए। इस मौके पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।
कार्यक्रम में उत्तराखंड महिला समेकित विकास योजना के तहत बीपीएल वर्ग की 10 महिलाओं को गैस कनेक्शन दिए गए। 22 आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए ट्राफी प्रदान की गई। मुख्य अतिथि महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास, पर्यटन उद्यान एवं संस्कृति मंत्री अमृता रावत ने आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों का मानदेय बढ़ाने आश्वासन दिया। अवकाश की मांग पर उन्होंने केंद्र सरकार से वार्ता की बात कही। विभाग के निदेशक चंद्र सिंह नपलच्याल ने सभी का धन्यवाद किया। इस मौके पर विशिष्ट अतिथि राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा सुशीला बलूनी, उपाध्यक्ष कमलेश सिंघल, कामिनी गुप्ता, मुकुल चौहान, आशा रानी ध्यानी, आरती बलोडी, अखिलेश मिश्रा, भारती तिवारी भी मौजूद रहीं।


विभाग की वेबसाइट लांच
देहरादून। समारोह में महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग की वेबसाइट भी लांच की गई। अब एक क्लिक पर महिलाएं विभाग की योजनाएं और अपने अधिकार जान सकेंगी। इसका पता है--
www.wecd.uk.gov.in



आम महिलाओं के खास काम
देहरादून। हालातों से लड़कर जीतने की बात हो या फिर दूसरों को अन्याय के विरुद्ध खड़ा करने का जज्बा, इन आम महिलाओं की कुछ करने की पहल और हिम्मत ने इन्हें खास बना ही दिया। आइए मिलते हैं राज्य स्त्री शक्ति वीरांगना तीलू रौतेली पुरस्कार पाने वाली खास महिलाओं से...

पशु बलि रोकने को अड़ गई
पौड़ी निवासी सरिता नेगी ससुराल में आई तो वहां अष्टबलि की परंपरा देख सिहर उठी। उन्होंने महिलाओं को एकत्रित किया और जुट गई परंपरा के नाम पर पशुओं की बलि के विरोध में। कड़े विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। नतीजा आज कांडा, मुंडनेश्वर और बुंखाल जैसी जगहों पर पशु बलि बंद हो चुकी है। सरिता का कहना है कि लंबे संघर्ष के बाद आंदोलन का नतीजा देखकर काफी खुश हूं। भक्ति किसी की हत्या से नहीं हो सकती, उसके लिए मन की श्रद्धा ही काफी है।

बेड़ियां तोड़ दी पति और सास को मुखाग्नि
देहरादून प्रेमनगर निवासी स्नेहलता ने अपने प्रियजनों के लिए बेड़ियां तोड़ने में झिझक नहीं की। 2004 में एक्सीडेंट में पति की मृत्यु के बाद सास के सहारे से खड़ी हुई। पति को खुद मुखाग्नि देने का साहस किया। एक कार्यालय में लिपिक का काम शुरू कर घर की बागडोर संभाली। फिर जब 2011 में सास की मृत्यु हुई तो खुद दाह संस्कार से संबंधित सभी कर्मकांड किए। स्नेहलता की नजर में उन्होंने जो कुछ किया वह अपनी स्वर्गीय सास की प्रेरणा से किया। वह उन्हें बहू नहीं बेटी मानती थीं। स्वावलंबन में ही स्त्री का सम्मान है।

ताइक्वांडो से कमाया नाम
अल्मोड़ा निवासी 12वीं की छात्रा गरिमा बिष्ट ने पढ़ाई के साथ खेलों में भी परचम लहराया। जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक उसके ताइक्वांडो खेल ने सबको प्रभावित किया ही था। लेकिन राष्ट्रीय स्तर के ओलंपियाड में उसने सिल्वर मेडल जीत राज्य का नाम रोशन किया। अब वह आर्मी ऑफिसर बन देश की सेवा करना चाहती है। अब उनकी तमन्ना देश के लिए मेडल जीतने की है।


प्रधान बन दिखाई विकास की राह
चमोली के गांव धूमाकुंडी में प्रधान रही मीना रावत ने अपने पद का सद्उपयोग कर गांव को सुख सुविधाओं से लैस किया। एएनएम सेंटर, पक्की सड़क, हाई स्कूल और पेयजल योजना को गांव का रास्ता दिखाया। मीना का कहना है कि महिलाए पद मिलने के बाद भी इसका इस्तेमाल नहीं करतीं। अगर वे चाहें तो पुरुषों से बेहतर करके दिखा सकती हैं। खुद कदम उठाने की जरूरत है।


परिवार के लिए बनी खेवनहार
पिथौरागढ़ की नम्रता बोहरा ने पिता और बड़े भाई की मृत्यु के बाद हिम्मत नहीं हारी। उनकी दो बहनों की पहले ही मौत हो चुकी थी। नम्रता ने अपने दो भतीजों के भविष्य के लिए एक छोटी सी कपड़ों की दुकान से आमदनी का जरिया खोजा। भतीजों की अच्छी परवरिश के लिए उन्होंने शादी भी नहीं की। नम्रता मानती हैं कि लड़कियां लड़कों से कम नहीं हैं। कन्या भ्रूण हत्या करने वालों को सोचना चाहिए कि बेटी उनके बुढ़ापे की लाठी बनने में सक्षम होती है।

महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर
ऊधमसिंह नगर निवासी गीता चौहान ने घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया। सबसे पहले उन्होंने एक पीड़ित महिला को सिलाई सिखाई और उसका बुटीक खुलवाया। उन्होंने ऐसी महिलाओं के लिए मुहिम चला दी और महिलाओं से कहलवाया घरेलू हिंसा को न। उन्हें संतोष है कि वह बड़ी संख्या में महिलाओं को आत्मनिर्भर बना पाई हैं। कहती हैं कि हर महिला को घरेलू हिंसा को ना कहने का अधिकार है।

समाज सेवी बन पाया सुख
चमोली निवासी किरन पुरोहित को अपने पति से समाज सेवा से जुड़ने की प्रेरणा मिली। 1991 के उत्तरकाशी के भूकंप से लेकर हिमालय बचाओ अभियान तक में किरन पुरोहित ने सजग भूमिका निभाई। वह अब चाइल्ड लेबर और बच्चों में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति पर काम कर रही हैं। कहती हैं, ‘मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि हर महिला अपनी क्षमता अनुसार कुछ न कुछ सामाजिक कार्य करने लगे तो देश की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकती है।’
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