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तड़प-तड़प कर मर गया सांड

Dehradun

Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
देहरादून। झाझरा में बस की टक्कर से गंभीर रूप से घायल सांड की रविवार रात तड़प-तड़पकर मौत हो गई। ‘अमर उजाला’ ने सोमवार के ही अंक में यह खबर प्रकाशित की थी। दो सप्ताह से वह सड़क किनारे पड़ा हुआ था। शुरुआत में पशुपालन विभाग के डाक्टर उपचार करने आए थे, लेकिन बाद में स्थानीय लोग ही उसकी देखभाल कर रहे थे। लोगों ने पशुपालन विभाग समेत पशुओं के नाम पर चल रहे कुछ संगठनों से भी संपर्क किया था। लेकिन, कोई उसकी मदद या इलाज के लिए नहीं पहुंचा। उधर, सोमवार को सांड की मौत की सूचना मिलते ही कुछ लोग मौके पर पहुंचे और तड़के ही शव उठाकर ले गए।
गर्दन बचाने में जुटे अधिकारी
सांड की मौत के बाद पशुपालन विभाग में हड़कंप है। विभाग के अधिकारी गर्दन बचाने में जुटे हैं। स्थानीय निवासी शीतल कश्यप और आभा ने बताया कि विभाग के कुछ लोगों ने सोमवार को गांव में आकर ग्रामीणों से एक पत्र पर हस्ताक्षर कराए। इसमें लिखा था कि विभाग की ओर से सांड का हरसंभव उपचार किया गया।

पशुपालन विभाग खुद बीमार
पशुपालन विभाग में पर्याप्त सुविधाएं न होने से दुर्घटना में घायल पशुओं को बचाना आसान नहीं है। अधिकतर मामलों में ऐसे पशुओं की मौत हो जाती है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. अविनाश आनंद के मुताबिक दुर्घटना में घायल बड़े पशु के बचने की संभावना बेहद कम रहती है, खासकर तब जबकि पशु पिछले पांवों पर खड़ा न हो पा रहा हो। उन्होंने बताया कि पशु सेवा केंद्र सेलाकुई में क्षेत्रीय प्रसार अधिकारी और सहसपुर के डॉक्टर ने उक्त सांड का उपचार किया था।

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गोवंश संरक्षण के नाम पर ‘पाखंड’
देसी और जर्सी गोवंश में किया जा रहा भेदभाव
-जर्सी गायों को छोड़ दिया जाता है बेहाल
अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। राजधानी में कई संस्थाएं गोवंश संरक्षण का दावा करती हैं। लेकिन, जमीन पर जो हकीकत नुमायां हो रही है वह साफ संकेत करती है कि संरक्षण के नाम पर पाखंड ही किया जा रहा है। आलम यह है कि खुद को गोवंश का हितैषी बताने वाले कुछ लोग देसी और जर्सी गोवंश में भी भेदभाव कर रहे हैं।
उत्तराखंड में गोसंरक्षण अधिनियम 2007 लागू है, जो समस्त गोवंश के संरक्षण के लिए समान रूप से लागू है। लेकिन पशु प्रेमी संगठनों और पुलिस द्वारा समय-समय पर तस्करों से छुड़ाए गए गोवंश में जर्सी गोवंश को गोसदनों में रखने से इनकार किया जा रहा है। यही नहीं, कोई जर्सी गोवंश घायल हो जाए तो उसे उपचार भी नहीं दिया जाता। ताजा मामला झाझरा में सामने आया। जब यहां घायल सांड के उपचार के लिए श्री गोपाल गोलोकधाम समिति से संपर्क किया गया तो जवाब मिला कि देसी सांड होने पर ही उपचार कर गोसदन में रखा जा सकता है। गोवंश में भेदभाव की वजह बताई जाती है कि जर्सी गोंवश का दूध और गोमूत्र अनुपयोगी माना जाता है।

हाल में सहसपुर से 141 गोवंश तस्करों से छुड़ाए गए थे। उन्हें गोसदनों में रखने की बात आई तो हरिद्वार के गोसदन से यहां पहुंचे लोगों ने सिर्फ देसी नस्ल के गोवंश को चिह्नित किया। जर्सी नस्ल के गोवंश को छोड़ दिया गया। प्रदेश में कई गोशालाएं सरकारी अनुदान पर चल रही हैं, इसके बावजूद वे गोवंश में भेदभाव करती हैं।
-गौरी मौलखी, सचिव पीएफए
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