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श्राद्ध पक्ष में दून की कई युवतियां देंगी पितरों को तर्पण

Dehradun

Updated Sun, 30 Sep 2012 12:00 PM IST
देहरादून। श्राद्ध पक्ष, यानी पितरों को तृप्त कर उनकी असीम कृपा, आशीर्वाद का लाभ देने वाला पक्ष आज से शुरू हो रहा है। हिंदू शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि महिलाएं भी पूर्वजों का श्राद्ध कर्म कर सकती हैं। इसके बावजूद पितृ सत्तात्मक समाज में यह परंपरा बनती, बढ़ती चली गई कि पुत्र-पौत्र ही पूर्वजों को तर्पण दे सकते हैं। हालांकि, अब बदलते समय के साथ अब बेटियां न सिर्फ पिता का अंतिम संस्कार कर रही हैं, बल्कि विधि-विधान से श्राद्ध कर्म की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं। दून में भी ऐसी कई बेटियां हैं, जिन्होंने रूढ़ियों की बेड़ियां तोड़ने का साहस दिखाया है। मिलते हैं, इन बेटियों से:
मैं घर की सबसे छोटी बेटी हूं। पिता ने हमेशा बेटा ही माना। पिछले साल उनका निधन हो गया तो मां और बाकी बहनों को संभालना मुश्किल हो गया। मैं ही टूट जाती तो उन्हें कैसे संभालती। हिम्मत की और पिता को अग्नि देने का फैसला लिया। दहन के साथ सारी क्रियाएं मैंने ही संपन्न कीं। अब पापा का पहला श्राद्ध है। पूर्णमासी के दिन पूरी रीति के अनुसार मैं यह परंपरा निर्वाह करूंगी।
-तिमिका गौतम, निवासी मोहिनी रोड

पापा के साथ जब मैं पहली बार उनकी दुकान पर बैठी तो लोगों ने बातें बनाईं। पापा से कहा कि लड़की को इस तरह दुकान पर बिठाना ठीक नहीं। लेकिन, पापा ने किसी की नहीं सुनी मुझे कहा, तू तो मेरा बेटा है। दो साल पहले हार्ट-अटैक से पिता की मौत हो गई। मैंने ही उन्हें अग्नि दी, उनकी सभी क्रियाएं की। इसके बाद दुकान को संभाला। दो छोटी बहनों की शादी की, अब मां को संभाल रही हूं। मां संग पापा का श्राद्ध करूंगी।
-गीतू नारंग, खुड़बुड़ा

पति की 11 साल पहले मौत हो गई थी। तब मेरी तीनों बेटियां स्कूल में पढ़ती थीं। पति को अग्नि तो जेठ ने दी लेकिन फिर मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद हर साल हवन, दान आदि बड़ी बेटी शिल्पी ने किया। तीनों बेटियों की शादी हो गई, अब वे नहीं आ पातीं। अब मैं ही पति का श्राद्ध कर्म करती हूं। पिछले दिनों पति की पुण्यतिथि पर मैंने स्वास्थ्य शिविर भी लगवाया था।
-साधना अरोड़ा, निवासी मन्नूगंज

वायु पुराण हो या गरुड़ शास्त्र सभी में स्त्री को क्रियाएं करने का अधिकार दिया गया है। श्राद्ध विवेक ग्रंथ के द्वितीय परिच्छेद में भी महिलाओं को दहन, तर्पण की बात कही गई है। शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि किसी भी व्यक्ति की अंतिम क्रियाएं छूटनी नहीं चाहिए। पुत्र न हो तो बेटी करे, कोई न हो तो फिर पंडित को ही यह कर्म करना चाहिए। ऐसा करने वाले को कई गुना यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
-आचार्य भरत राम तिवारी, उपाध्यक्ष, उत्तराखंड विद्वत सभा
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