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ओलंपियन के ‘घर’ में हॉकी की दुर्दशा

Dehradun

Updated Wed, 29 Aug 2012 12:00 PM IST
देहरादून। यह बानगी है स्कूलों में देश के राष्ट्रीय खेल हॉकी की। हॉकी के लिए मैदान ही नहीं है तो किस तरह खिलाड़ियों से आगे बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। राजधानी में ही राज्य बनने के 12 साल पूरे होने को हैं, लेकिन एस्ट्रोटर्फ तक नहीं है। यहां तक कि घास के मैदान भी ठीक नहीं हैं। स्कूलों में खेलों की कोई व्यवस्था नहीं है। स्कूली प्रतियोगिता में पूरे जिले से पांच से अधिक टीमें नहीं आ पाती हैं। ऐसा नहीं है कि राज्य का देश की हॉकी में कोई योगदान नहीं है। यहां से ओलंपियन हरदयाल सिंह, सैय्यद अली, आरएस रावत समेत लईक अहमद, शिवानी बिष्ट, कमला दलाल, सरला दलाल, रीना सोनकर निकल चुके हैं।
लेकिन बात अलग स्कूली हॉकी की हो तो उसकी स्थिति काफी खराब है। साई से रिटायर हो चुके हॉकी कोच पीके महर्षि का कहना है कि स्कूली हॉकी में जब सुधार होगा, तभी राज्य की हॉकी में बदलाव आएगा। इसके लिए स्कूलों में अनिवार्य रूप से खेल कराए जाने होंगे। अभी बालक हॉकी में ही छह खिलाड़ी स्पोर्ट्स कालेज के होतें है तो बाकी खिलाड़ियों को कोटे के आधार पर भरा जाता है। इससे खेलने वाले छह होते हैं, जबकि बाकी कोटे जाते हैं, साफ है कि टीम की स्थिति क्या होगी।

खुल गई पोल
देहरादून। एमकेपी इंटर कालेज में बुधवार (आज) से बालिकाओं की नेहरू हॉकी प्रतियोगिता शुरू हो रही है। प्रतियोगिता की मेजबानी तो ले ली गई, लेकिन संसाधनों की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। प्रतियोगिता से ठीक एक दिन पहले आयोजकों को मैदान की सुध आई। नजर दौड़ाई तो चारों ओर आधा-आधा फुट घास दिखी। सवाल उठा कि इस मैदान पर कैसे मैच होंगे। इसके बाद अफरातफरी मची। आखिर दून स्कूल से घास काटने की मशीन मंगाई गई, तब जाकर मैदान को किसी तरह खेलने लायक बनाया गया।

गेंद को दुश्मन समझते थे दादा
दादा (मेजर ध्यानचंद) और मेरा 12-13 साल का साथ रहा। हम दोनों फौज में मेरठ में तैनात थे। 1950 में उन्होंने ध्यानचंद इलेवन टीम बनाई थी, इसमें मैं भी शामिल था। तब हमारी टीम का मुकाबला पाकिस्तान से हुआ था। उस मैच में दादा सेंटर फारवर्ड पोजीशन पर खेले थे। वह हमेशा कहते थे कि हॉकी पासिंग का खेल है। सही समय और सही जगह से पास किया जाए तो विपक्षी टीम को ढेर किया जा सकता है। दादा कहते थे कि गेंद को हमेशा दुश्मन समझो, उसे अपने पास मत रखो। वह डी के नजदीक ड्रिबलिंग को ठीक नहीं मानते थे। उनका कहना था कि केवल एक-दो खिलाड़ियों को छकाओ और सीधे विपक्षी पोस्ट पर गोल दाग दो।
-हरदयाल सिंह, पूर्व ओलंपियन

राज्य में सुविधा नहीं, बाहर कर रहे अभ्यास
देहरादून। राज्य में खेल सुविधाएं नहीं होने के कारण खिलाड़ियों को अभ्यास के लिए बारह जाना पड़ रहा है। आगे बढ़ने के लिए वे अपना पैसा खर्च करने को मजबूर हैं, जबकि उनकी कामयाबी पर सरकार वाहवाही बटोरने से पीछे नहीं रहती। एथलेटिक्स के लिए राज्य में सिंथेटिक ट्रैक नहीं है। राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं सिंथेटिक पर ही होती हैं। ऐसे में उत्तराखंड पुलिस के नीरज कुमार और मुकेश रावत बेंगलुरू में अभ्यास कर रहे हैं तो पंकज डिमरी और रवींद्र रौतेला पटियाला में। उनका कहना है कि विभाग टीए-डीए तो देता है, लेकिन बाहर रहने पर अपना खर्चा तो होता ही है। वहीं हॉकी की यहां कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण भारतीय जूनियर टीम में खेल चुकी शिवानी बिष्ट भी मध्य प्रदेश में अभ्यास कर रही हैं। क्रिकेट की बात करें तो ई. अभिमन्यु को पश्चिम बंगाल, जबकि निष्ठा फरासी और एकता बिष्ट को भी दूसरे प्रदेशों में जाना पड़ा।
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