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बच्चों से ज्यादा शिक्षकों को पढ़ाई की जरूरत

Dehradun

Updated Sun, 12 Aug 2012 12:00 PM IST
देहरादून। पाठ्यक्रम के लिहाज से शिक्षक बेहद पिछड़े हैं। नेट के जरिए छात्र-छात्राएं ज्यादा अपडेट हैं। साफ है कि बच्चों से ज्यादा शिक्षकों को पढ़ाई की जरूरत है। प्रिंसिपल प्रोग्रेसिव स्कूल्स एसोसिएशन की ओर से आयोजित प्रिंसिपल्स एंड टीचर्स नेशनल कांफ्रेंस के पहले दिन शनिवार को वक्ताओं ने स्कूलों की स्थिति, प्रिंसिपलों की भूमिका पर मंथन किया।
कनक चौक के समीप स्थित एक होटल के सभागार में ‘इमरजिंग चैलेंजेज टू स्कूल्स इफैक्टिव लीडरशिप’ विषय पर यह कांफ्रेंस शुरू हुई। कांफ्रेंस का उद्घाटन कृषि मंत्री हरक सिंह रावत ने दीप जलाकर किया। उन्होंने सरकारी और पब्लिक स्कूलों के बीच की खाई कम किए जाने पर जोर दिया। इसमें अंग्रेजी को सबसे बड़ी बाधा करार दिया।
कहा कि सीबीएसई स्कूलों में लागू सीसीई प्रणाली परीक्षा का दबाव कम करने में कामयाब रही है। एसोसिएशन की स्मारिका का विमोचन भी किया गया। मौकेपर एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रेम कश्यप, डा. एचएस मान, एचके छाबड़ा, किरण कश्यप, नवीन पंत, मनोज खेड़ा आदि उपस्थित रहे।

सीसीई अच्छी प्रणाली पर यह बाधाएं भी--
-इंफ्रास्ट्रक्चर को पाठ्यक्रम से जरूरी मान लिया जाना
-कारपोरेट का शिक्षा को पैसा कमाने का धंधा मान लेना
-प्रधानाचार्र्यों से ‘मल्टी टास्कर’ के रोल में काम कराना
-वेतन के मोर्चे पर शिक्षकों, प्रिंसिपलों का पीछे होना


बच्चों को नासा नहीं, श्री हरिकोटा भेजें
विभिन्न स्कूल बच्चों को स्टडी टूर के नाम पर नासा भेजते हैं। आईआईटी के कांफ्रेंस में आए विशेषज्ञ ने नासा को एजुकेशन की जगह एंटरटेनिंग टूर का दर्जा देते हुए अंतरिक्ष से जुड़ी जानकारियों के लिए इसकी जगह श्री हरिकोटा को तरजीह दिए जाने की बात कही।

कई स्कूलों में बस झंडे-से-झंडे तक पढ़ाई
कांफ्रेंस में विशेषज्ञों ने कई स्कूलों में पढ़ाई की स्थिति को झंडे-से-झंडे तक की पढ़ाई कहकर बयां की। जब सवाल उठा कि झंडे-से-झंडे तक क्या है तो बोले-15 अगस्त से लेकर 26 जनवरी तक। कई जगह शिक्षा के हालात यही हैं। साल में छह माह भी पढ़ाई नहीं होती।
देखिए, दुनिया से कितने पीछे हैं हम
देहरादून। अपने यहां अभी तक खेल-खेल में बच्चों तक पढ़ाई पहुंचाने की केवल बात हो रही है। उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य, सामुदायिक सहभागिता जैसे मुद्दे अभी दूर की कौड़ी हैं। स्कूलों का सारा ध्यान केवल इंफ्रास्ट्रक्चर के बूते ज्यादा-से-ज्यादा कमाई करना है। ऐसे में दूसरे देशों की तरफ नजर दौड़ना सम-सामयिक हो सकता है। गौरतलब है कि इन देशों में ऐसे क्षेत्रों में सबसे ज्यादा बसावट बढ़ रही है, जहां अच्छे स्कूल स्थित हैं। प्रिंसिपल्स एंड टीचर्स नेशनल कांफ्रेस के दौरान यह मुद्दा भी उठा----
यूके एप्रोच :
सुरक्षा, स्वास्थ्य, खेल-खेल में सीखना, नागरिकता की भावना
आस्ट्रेलिया (विक्टोरिया) एप्रोच :
खुला वातावरण, छात्र आधारित शिक्षा, छोटी कक्षा में गुण निर्धारण, सीनियर सेकेंड्री में एक ही गुण पर फोकस, ग्रुप लर्निंग, व्यावसायिक शिक्षा पर जोर
यूएस एप्रोच :
कोई बच्चा न छूटने पाए (एनसीएलबी), छात्र आधारित शिक्षा, समुदाय और अभिाभवकों की सहभागिता, शोध के लिए प्रशिक्षण
(आईआईटी नई दिल्ली के विशेषज्ञ डा. हरीश चौधरी की ‘इंटरनेशनल ट्रेंड इन स्ट्रेटेजिक प्लानिंग इन एजुकेशन टू मीट चैलेंजेज इन ग्लोबल ईरा’ प्रेजेंटेशन पर आधारित)
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