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तुम तो ऐसी नहीं थी

अमिताभ श्रीवास्तव

Updated Tue, 11 Dec 2012 05:25 PM IST
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हे साइज जीरो जनवाहिनी साइकिल! बचपन से यह प्रश्न इस बालमति को आतंकित करता रहा है कि दो चक्रों पर चलकर भी आप गिरती क्यों नहीं। वह प्रश्न आज तक हल न हुआ और आज सवाल उठ खड़ा है, आप ‘उन्हें’ गिराती क्यों नहीं। अकसर आप कहती रहीं कि वे वैसे नहीं, जैसे वे खुद को कहते हैं। उनके राजकुंवर कई बार आपके पिछले पहिए की हवा भी निकाल गए। भला हो आपके पहलवान जी का कि भरी बुढ़ौती में फूंक-फूंक कर हवा भरी और फिर तुम ऐसी चली कि जो जीता, वह सिकंदर के मिस्टर परफेक्शनिस्ट की स्वीट साइकिल हो गई।
पर फिर क्या हुआ। तुम चली किधर और पहुंची किधर। तुम्हें पता ही नहीं चला कि तुम्हारे कैरियर पर कब ‘वे’ बैठ गए। फिर चुपके से वे उतरे और वालमार्ट बैठ गए। तुम तो अपने कैरियर की बड़ी सुहानी कहानी कहती थी। बड़े गुमान से फरमाती थी कि इस कैरियर पर देश का अन्नदाता विराजता है, इस देश की तकदीर बदलने वाला मजदूर बैठता है, वह बैठता है, जिसके पास खुद को बैठने का ठौर भले नहीं है, लेकिन जिसे वह चाहे, वही इस देश की राजगद्दी पर बैठता है। फिर कैसा भचका लगा कि वह बंदा सड़क पर जा गिरा और वह परदेसी जा चढ़ा, जिसका जिक्र आते ही पहलवान जी उस पर चढ़ बैठते थे।
 
किस अदा से तुम खेतों की मेड़ों पर इठलाती थी। न तुम्हें देसी मिट्टी के तेल की जरूरत थी, न विदेश से आए पेट्रोल की। फिर क्या हुआ कि तुम गांव के खेत भूल गई। पगडंडी छोड़ शहर की सड़क पर उतर आई। सह गए यह सब देखकर। सोचा, तुम्हें भी आगे जाने की जल्दी होगी। पर झटखा खा गए, जब देखा कि तुम तो राजपथ पर अदा दिखा रही हो। ऐसा राजपथ जिस पर उस खेत की मिट्टी को भी टिकने का हक नहीं, जिसकी मिट्टी तुम्हारे पहलवान जी मला करते थे। तुम तो साइकिल थी, तुम हाथी की चाल कैसे चल पड़ी।

कौन-सी जिम्मेदारी निभाने को मिली तुम्हें? एक ऐसी खटारा को खींचने की, जो खुद ही टैं बोलने के लिए राइट टाइम खोज रही हो। वह खटारा तो सर्विसिंग कराकर चलने की कोशिश भी कर ले, पर तुम्हें तो शहरी सफारी राजपथ की पार्किंग पर भी जगह नहीं देंगे। राजपथ वालों की सोसाइटी में साइकिल चलने की जगह नहीं। यहां बस साइकिल एक जगह बांध कर उस पर दुबला होने के लिए पसीने बहाए जाते हैं। उम्मीद है, यह सब सुनकर तुम्हें पसीना नहीं आएगा।
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