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भूख से लड़ती महिलाएं

सुभाषिनी सहगल अली

Updated Fri, 10 Nov 2017 05:42 PM IST
women fight against hunger

सुभाषिनी सहगल अली

हिमाचल प्रदेश में चुनाव, गुजरात में चुनाव, उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकायों के चुनाव। चुनाव की बड़ी हलचल है। नारे गूंज रहे हैं। पर्चे-पोस्टर की जंग छिड़ी है। वायदों और आरोप-प्रत्यारोप के हंगामे में आम लोगों, गरीबों, महिलाओं और बच्चों के जीवन से जुड़े मुद्दों की बातें करने की कोशिश वामपंथी कर रहे हैं। शोरगुल में वे कहीं-कहीं सुनाई भी दे रहे हैं। नोटबंदी से पैदा हुई बेरोजगारी, बदहाली और परेशानी, उसके कारण हुई लोगों की मौतों की बात ठीक एक साल बाद सुनाई देने लगी है। जीएसटी से मची तबाही का हल्ला भी होने लगा है। पर इस देश में व्याप्त भूख की बात अभी कम हो रही है। भूख की जिम्मेदारी अक्सर भाग्य या भाग्या विधाता पर डाल दी जाती है। हमारे देश में अनाज की कमी नहीं है। अगर अनाज भूखे पेटों तक पहुंच नहीं रहा, तो उसकी जिम्मेदारी सरकार की है।
भारत भूखा देश है। भारत कुपोषण से ग्रस्त है। जनता को भूखा और कुपोषित रखने का काम सरकारी नीतियां कर रही हैं। सरकार की सोच ज्यादा लोगों को सस्ता राशन उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि उस सस्ते राशन से, जो उसके गोदामों में सड़ रहा है, वंचित रखने की है। इसके कई तरीके सरकारों ने ढूंढ निकाले हैं, जैसे-राशन कार्ड न देना, गरीबी की ऐसी परिभाषा गढ़ना कि गरीब उसके बाहर चला जाए, राशन के बदले बैंक के खाते में पैसा जमा करने का वायदा करना, और खाता तथा राशन कार्ड, दोनों को आधार कार्ड से जोड़ देना।

आधार की अनिवार्यता का विरोध निजता की सुरक्षा के सवाल को लेकर हो रहा है, पर इस अनिवार्यता का गरीब परिवारों पर क्या असर पर रहा है, उसकी कम चर्चा है। चुनावों में इसे केंद्रीय मुद्दा बनाने की जरूरत है। संतोषी की मौत को मुद्दा बनाने की जरूरत है।

संतोषी झारखंड के सिमडेगा जिले के एक गरीब परिवार की ग्यारह साल की बच्ची थी। उसके परिवार के पास बीपीएल का राशन कार्ड भी था और आधार कार्ड भी। उनको पिछले साल तक राशन मिल रहा था। फिर अचानक सरकार ने नया नियम लागू कर दिया कि राशन कार्ड को आधार कार्ड के साथ जोड़कर नई बीपीएल शृंखला तैयार की जाएगी। उस नई लिस्ट से संतोषी के परिवार का नाम कट गया। जब उसकी मां राशन की दुकान पर गई, तो उसे इसका पता चला। उसके बाद वह फिर नहीं गई। वह अपनी बड़ी बेटी के साथ जंगल से लकड़ी बीनकर बेचती हैं और दिन में चालीस रुपये कमा लेती हैं। कभी-कभी उन्हें डेढ़ सौ रुपये दिहाड़ी पर मजदूरी मिल जाती है। उनके पास बार-बार पांच-छह किलोमीटर दूर राशन की दुकान के चक्कर लगाने का समय नहीं है। पर मजदूरी की राशि बाजार में अनाज के बढ़ते दाम का मुकाबला नहीं कर पाई और 28 सितंबर को संतोषी मर गई। उसकी मां का कहना है कि वह ‘भात-भात’ कहते हुए मरी।

आज से सौ साल पहले, इन्हीं दिनों, रूस के बड़े शहरों-मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग में हजारों महिलाओं ने ‘रोटी’ की मांग करते हुए घरों से निकलकर सड़कों पर जार के सैनिकों की गोलियों का सामना किया था। उन्होंने मजदूरों को भी ललकारा और क्रांतिकारी ताकतों में अपनी बहादुरी से जबर्दस्त ऊर्जा भरने का काम किया। भूख से लड़ने वाली वे महिलाएं दुनिया की पहली क्रांति की फौज की अगली कतारों में थीं। संतोषी ‘भात-भात’ कहती दम तोड़ गई। पर भूख हमारे देश में जिंदा है। इस भूख को मिटाने की लड़ाई जरूरी है-वोट के माध्यम से और सड़कों पर उतर कर।

-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।
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