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क्यों नहीं सुधरती पुलिस

विभूति नारायण राय

Updated Fri, 06 Oct 2017 09:21 AM IST
Why not improve police

पुलिस प्रशिक्षण

यह एक बड़ी रोचक स्थिति है कि जिस संस्था से नागरिकों का सबसे अधिक वास्ता पड़ता है, उस पर इस देश में सबसे कम राष्ट्रीय बहसें होती हैं। हमारे यहां 1860 के दशक में बने कानूनों ने एक आधुनिक संस्था के रूप में जिस पुलिस का निर्माण किया था, वह अपनी मूल आत्मा में आज भी कमोबेश वैसी ही है, जैसी अपने जन्म के समय थी। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा हाल में पुलिस सुधारों के लिए 25,000 करोड़ रुपयों की राशि  वर्ष 2017-18 से अगले तीन वर्षों में खर्च करने का संकल्प लिया गया है। पुलिस यद्यपि राज्यों का विषय है, लेकिन इस धनराशि का अधिकतर हिस्सा केंद्र सरकार प्रदान करेगा।
वर्ष 1861 में पुलिस ऐक्ट बनने के बाद पुलिस सुधारों के लिए पहला बड़ा प्रयास वर्ष 1902 के पहले पुलिस कमीशन के रूप मंे सामने आया था। सात सदस्यीय उस कमीशन में दो भारतीय भी थे। उस कमीशन ने पुलिस के ढांचे में सुधार के लिए बड़ी महत्वपूर्ण संस्तुतियां की थीं और उनके आधार पर बुनियादी परिवर्तन किए भी गए। यद्यपि उस कमीशन की ज्यादातर सिफारिशें सर्वसम्मति से की गईं, लेकिन एक मुद्दे पर सदस्य महाराजा दरभंगा ने असहमति का नोट दिया था और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के पृथक्करण की सिफारिश की थी। उनकी वह बात हालांकि नहीं मानी गई, लेकिन उस कमीशन की ज्यादातर सिफारिशें लागू कर दी गईं। वर्ष 1902 के पुलिस कमीशन की उस रपट को पढ़ना मजेदार होगा। उसमें विस्तार से तत्कालीन पुलिस की भर्ती नीति, उसको मिलने वाला न्यून वेतन, दयनीय  शैक्षणिक स्तर, उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार, पुलिसकर्मियों का गैर पेशेवराना रवैया, जनता के प्रति उसका क्रूर व्यवहार, अपर्याप्त प्रशिक्षण, अस्वास्थ्यकर आवास और जनता के मन मे उसकी बेहद खराब छवि पर कमीशन की टिप्पणियां गौरतलब हैं। मैं इसे दिलचस्प पठन सामग्री इसलिए मानता हूं कि इसे पढ़ते समय ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि आप 19 वीं शताब्दी की किसी संस्था के बारे में पढ़ रहे हैं। इसके बजाय ऐसा लगता है कि आज के ही पुलिस बल का जिक्र किया जा रहा है। मुझे नहीं लगता कि हालात बहुत ज्यादा बदले हैं।
     
वर्ष 1902 के बाद कई पुलिस कमीशन नियुक्त हुए और उनकी सिफारिशों के अतिरिक्त प्रशासनिक निर्णयों के तहत भी बहुत सारे प्रयास हुए हैं, लेकिन यह परखना दिलचस्प होगा कि क्या इनमें से कोई भी संस्था के रूप में पुलिस के अंदर किसी तरह का बुनियादी बदलाव ला सका है। आपातकाल खत्म होने के बाद सत्ता मे आई जनता पार्टी की सरकार ने वर्ष 1978 में धर्मवीर आयोग का गठन किया था, जिसने पुलिस तंत्र मंे बुनियादी फर्क लाने मंे सक्षम हो सकने वाले सुझाव दिए थे, लेकिन इसकी रपट आने तक सत्ता परिवर्तन हो गया और पिछले चार दशकों से यह नॉर्थ ब्लॉक के किसी बाबू की आलमारी में धूल फांक रही है। मुझे लगता है कि अगर जनता पार्टी की सरकार रही होती, तब भी इसकी संस्तुतियां लागू नहीं होतीं। जनता पार्टी टूटने के बाद उससे निकले दलों की ही तो सरकार तब से देश के किसी न किसी राज्य मंे रही है, लेकिन किसी ने भी आज तक धर्मवीर आयोग की सिफारिशों की सुध नहीं ली है। इसका कारण बहुत स्पष्ट है कि कोई भी राजनीतिक दल अपनी पकड़ से मुक्त जनता और संविधान के प्रति निष्ठा रखने वाला पुलिस बल नहीं चाहता। हर राजनीतिक दल को ऐसा पुलिस बल सुहाता है, जो भले ही गैर पेशेवर हो, लेकिन जिसकी पूरी निष्ठा उसके प्रति हो। हालांकि पुलिस का गैर पेशेवर रवैया अपने आकाओं की कितनी किरकिरी करा सकता है, यह हमने पिछले दिनों हरियाणा के पंचकूला में  देख ही लिया, जब बाबा राम रहीम के अनुयायियों को पहले तो बड़ी संख्या में सड़कों पर आने दिया गया, उसके बाद घबराहट में जरूरत से कई गुना ज्यादा पुलिस बल का प्रयोग कर तीस से अधिक लोगों को मार दिया गया।

संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार, प्रति एक लाख की आबादी पर पुलिस की संख्या 222 होनी चाहिए, जबकि भारत में एक लाख की आबादी पर पुलिस की स्वीकृत संख्या 181 है, और उसमंे भी उपलब्ध पुलिस बल सिर्फ 131 है। पुलिस बलों का भी 80 प्रतिशत कांस्टेबल हैं, जिनकी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक है और अपर्याप्त तथा बाबा आदम के जमाने का प्रशिक्षण जिन्हें दक्ष पेशेवर बनने से रोकता है। केंद्र सरकार ने पुलिस सुधार के लिए जिस 25,000 करोड़ रुपये की धनराशि की घोषणा की है, क्या वह राशि पुलिस के सबसे निचले पायदान पर खड़े किंतु सबसे महत्वपूर्ण इस अंग को पेशेवर बना सकेगी? ज्यादा संभावना यही है कि इस बड़ी राशि का अधिकांश हिस्सा हथियारों, वाहनों और संचार उपकरणों पर खर्च होगा। अब तक का हमारा अनुभव यही बताता है कि ऐसा प्रशिक्षण तंत्र विकसित करने में, जो पुलिसकर्मियों को कम से कम बेहतर मनुष्य बना सके, ताकि वे खुद को जनता के मित्र संगठन में तब्दील कर सकें, सबसे कम धन व्यय किया जाएगा।

आवश्यकता दरअसल पूरी मानसिकता को बदलने की है। हम कब तक इस तथ्य को नजरंदाज करते रहेंगे कि स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी कोई भला मानुष मुसीबत में भी पुलिस के पास नहीं जाना चाहता, आज भी थानों में रपट नहीं लिखी जाती और अब भी एक औसत पुलिसकर्मी थर्ड डिग्री को ही विवेचना का सबसे प्रभावी जरिया समझता है? पुलिस सुधार के लिए जिस भारी-भरकम राशि का प्रावधान किया गया है, उसका कम से कम आधा तो विश्व स्तरीय प्रशिक्षण संस्थान विकसित करने, फोरेंसिक प्रयोगशालाएं बनाने और पुलिसकर्मियों का जनता के साथ व्यवहार सुधारने पर खर्च होना ही चाहिए। अदालतों और जेलों का सुधार भी इस प्रक्रिया का अंग होना चाहिए। जनता के लिए भी यह समझना आवश्यक है कि एक सभ्य और कानून-कायदों की पाबंद पुलिस उसका अधिकार और जरूरत है।
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