आपका शहर Close

उपकृत क्यों हों भारत रत्न?

कुमार प्रशांत

Updated Tue, 19 Nov 2013 06:49 PM IST
Why are obliged Bharat Ratna?
अभी आंखों से वह छवि धुंधली भी नहीं पड़ी है, जिसे देख-देखकर, पिछले तमाम वर्षों में हमने अपनी आंखें सेंकी हैं। ईमानदार उपलब्धियों के लिए तरसता यह देश, इधर के वर्षों में सचिन तेंदुलकर के प्रति जितना कृतज्ञ हुआ है, उतना किसी के प्रति नहीं हुआ।
सचिन ने अपनी खेल-प्रतिभा और एकाग्र साधना के बल पर इस देश को उपलब्धियों का वह शिखर दिखलाया, जिसमें कोई मिलावट नहीं थी, कोई भ्रष्टाचार नहीं था। क्रिकेट की दुनिया में फिसलन भरी जितनी राहें हैं, उनमें से किसी भी रास्ते का सहारा नहीं था। कप्तान बनने और विशेष दर्जे में अपना नाम बनाए रखने की कोई जोड़-तोड़ नहीं थी। करोड़ों की कमाई का व्यापार-जगत उनके सामने खुला रहा और बिछा भी रहा, पर कभी यह सुनाई नहीं दिया कि अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए इस आदमी ने पर्दे के पीछे से कोई चाल चली हो।

आईपीएल की लूट भरी दुनिया में मुंबई इंडियंस जैसी टीम की कप्तानी और उसके मालिक (दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में से एक) के साथ पारिवारिक मैत्री के बाद भी ऐसी फुसफुसाहट नहीं उभरी कि इसने कोई ऐसा सौदा किया, जिसका दायरा खेल से बाहर का था। जैसे इसने दुष्यंत कुमार की गजल ही जी कर दिखा दी- मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं/ वह खेल आपको दिखाता हूं!

ऐसे मनोभावों के बीच, और ऐसे वक्त में केंद्र सरकार ने एक बेतुकी-सी बात की कि सचिन को भारत-रत्न देने की घोषणा कर दी। अगर यह देश में बने भावुक माहौल को भुनाने या उसमें बह जाने का उदाहरण है, तो ये दोनों ही बातें किसी गंभीर सरकार के लायक नहीं हैं।

मुझे तो यह भी अटपटा लग रहा है कि जब देश में माहौल यह बनाया जा रहा है कि भारत रत्न देकर सरकारें हमें उपकृत करती हैं और जब उन्हें ऐसा लगता है कि यह आदमी उपकृत होने के दायरे से बाहर जा रहा है, तो उससे भारत रत्न छीन लेने की आवाज उठाई जाती है, तब किसी सचिन या किसी विज्ञानरत सीएनआर राव को यह स्वीकार ही क्यों करना चाहिए?

जब ऐसा भाव ही न हो कि एक कृतज्ञ राष्ट्र अपनी महिमावान संतान को सम्मानित कर उपकृत हो रहा है और हर चीज बौने लोगों की बौनी पहुंच का ही आधार रखती हो, तब हमें खुद ही वह लक्ष्मण-रेखा खींचनी चाहिए, जिसे पार करने की इजाजत हम किसी बौनी व्यवस्था को नहीं देते हैं। लेकिन यह तो सचिन और राव साहब के निश्चय करने की बात है। इसे कबूल करने का, सचिन का निर्णय उतना ही गलत हुआ, जितना राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार करने का निश्चय।

भारत-रत्न का मतलब किसी के सचिन जैसा खिलाड़ी होने या लता मंगेशकर जैसी गायिका होने से पूरा होता है क्या? हम सबको इसका जवाब खोजना चाहिए। जब खेल के आधार पर आप सचिन को भारत रत्न बनाते हैं, तब स्वाभाविक है कि कोई ध्यानचंद का नाम उठाता है, कोई सुनील गावस्कर का और कोई विश्वनाथन आनंद का नाम लेता है। कैसे खारिज करेंगे आप इन नामों को? जब आप इंदिरा गांधी या राजीव गांधी को भारत रत्न देते हैं, तब स्वाभाविक है कि कोई अटल बिहारी वाजपेयी का या कोई गुरुजी गोलवलकर का नाम सामने करे। आपने तो कसौटी ही बहुत हल्की बना दी। आसमान तक पहुंचने के दो ही रास्ते हैं : आप आसमान तक उठें या आसमान को ही रसातल में पहुंचा दें। हम यह दूसरा काम करने में बहुत निपुण हैं।

किसी को नागरिक सम्मान देने का मतलब है कि देश यह स्वीकार करता है कि इस आदमी ने अपने क्षेत्र में वैसी विशिष्टता हासिल की है, जिससे एक समाज के रूप में हम समृद्ध हुए हैं। पद्म श्री से लेकर पद्म विभूषण तक के हमारे सम्मान इसी के प्रतीक हैं। यह राष्ट्र-जीवन के किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले को खोजने और सम्मानित करने का उपक्रम है।

यह 100 मीटर की दौड़ नहीं है, जिसमें आप धावक की समय से होड़ करवाते हैं और फिर उसके गले में एक मेडल टांग देते हैं। यह अपने-अपने क्षेत्र में की गई साधना का आकलन है, जिसके आधार पर हम यह फैसला करते हैं कि किसे, किस सम्मान से नवाजना उपयुक्त होगा। इसमें कहीं भी, किसी भी स्तर पर किसी को उपकृत करने का भाव नहीं होना चाहिए, उपकृत होने का गहरा एहसास होना चाहिए। पद्म श्री से पद्म विभूषण तक में हर सचिन, हर लता और हर राव की जगह है। किसी अंबेडकर की भी और किसी राहुल द्रविड़ या विश्वनाथन आनंद की भी। लेकिन जैसे ही आप भारत रत्न की बात करते हैं, सोचने का दायरा और आधार भी बदल जाता है; बदल जाना चाहिए।

भारत रत्न के बारे में सोचते हुए हम किसी व्यक्ति की व्यवसायगत उपलब्धियों का आधार नहीं लेंगे। हम यह देखेंगे कि क्या इस आदमी ने अपनी जीवन-साधना में ऐसा कुछ हासिल किया है, जो पूरे राष्ट्र की सोच, चिंतन, संस्कृति को आने वाले लंबे समय तक प्रभावित करता रहेगा? आखिर हम एक पूरे राष्ट्र का रत्न चुनने या पहचानने बैठे हैं, न कि सबसे अच्छा खिलाड़ी या विज्ञानी या कलाकार या साहित्यकार या उद्यमी। अगर भारत रत्न के संदर्भ में सोचते हुए भी ऐसी सारी कसौटियां हमारे मन में नहीं उमगती हैं, तब मानना होगा कि हम पद्म श्री और भारत रत्न का फर्क नहीं समझ पा रहे हैं।

अगर भौतिक उपलब्धियों की बात करें, तो सचिन तेंदुलकर से अधिक उपयुक्त पात्र भारत-रत्न के लिए खोजा ही नहीं जा सकता है। लेकिन अगर परिपूर्ण अर्थ में सोचें, तो कहना पड़ेगा कि केंद्र सरकार ने अगर यह बचकानी या चालाकी भरी हरकत नहीं की होती, तो यह देश के लिए और सचिन के लिए भी अच्छा होता।
Comments

स्पॉटलाइट

हर मर्द नाभि में लगाएं ये 4 चीजें, होंगे सभी तरह के फायदे

  • शनिवार, 21 अक्टूबर 2017
  • +

फेस्टिवल में बढ़ गया है वजन तो ट्राई करें ये टिप्स, जल्द घटेगा वेट

  • शनिवार, 21 अक्टूबर 2017
  • +

B'DAY SPL: शम्मी कपूर ने दूसरी शादी के लिए रखी थी ऐसी शर्त, डर गए थे घरवाले

  • शनिवार, 21 अक्टूबर 2017
  • +

इंटरव्यू के जरिए 10वीं पास के लिए CSIO में नौकरी, 40 हजार सैलरी

  • शनिवार, 21 अक्टूबर 2017
  • +

BIGG BOSS 11: ऐसी कीमत पर हो रही है इस 'स्टार' की एंट्री, नाम जानकर चौंक जाएंगे

  • शनिवार, 21 अक्टूबर 2017
  • +

Most Read

रूढ़ियों को तोड़ने वाला फैसला

supreme court new decision
  • रविवार, 15 अक्टूबर 2017
  • +

ग्रामीण विकास का नुस्खा

measure of Rural development
  • शनिवार, 21 अक्टूबर 2017
  • +

सरकारी संवेदनहीनता की गाथा

Saga of government anesthesia
  • मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017
  • +

ग्रामीण विकास से मिटेगी भूख

Wiped hunger by Rural Development
  • सोमवार, 16 अक्टूबर 2017
  • +

दीप की ध्वनि, दीप की छवि

sound and image of Lamp
  • बुधवार, 18 अक्टूबर 2017
  • +

दूसरों के चेहरे पर भी हो उजास

Light on the face of others
  • बुधवार, 18 अक्टूबर 2017
  • +
Top
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!