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मध्यावधि चुनाव कौन चाहता है

अरुण नेहरू

Updated Fri, 23 Nov 2012 10:57 PM IST
who wants midterm elections
राजनीतिक दुर्घटनाओं को कभी खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि गठबंधन की राजनीति में कई अस्थिर तत्व होते हैं, पर तृणमूल कांग्रेस एवं अन्नाद्रमुक को छोड़कर शायद ही कोई दल शीघ्र चुनाव चाहता है। आखिरकार अगले कुछ दिनों में यह सचाई स्पष्ट हो जाएगी।
कांग्रेस ने कैबिनेट में मध्यावधि फेरबदल के बाद 2014 के चुनाव की तैयारियों के लिए समितियों की घोषणा करके अपने भावी इरादे स्पष्ट कर दिए हैं, जबकि भाजपा नेतृत्व के मुद्दे पर जूझ रही है। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के प्रति संघ प्रमुख के झुकाव के बारे में कहीं कोई संदेह नहीं है। नेतृत्व के झगड़े से पार्टी को कितना नुकसान हुआ है, इसका पता तो बाद में चलेगा। जहां तक विधानसभा चुनावों का मामला है, तो हिमाचल में दोनों की संभावना बराबर लग रही है, जबकि गुजरात में नरेंद्र मोदी के स्पष्ट अंतर से जीतने की उम्मीद है।

शीघ्र चुनाव के इरादे से ही तृणमूल कांग्रेस संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहती थी, पर पर्याप्त संख्याबल के अभाव में उसे खारिज कर दिया गया। ममता बनर्जी को निकट भविष्य में पंचायत चुनाव का सामना करना है, जहां माकपा एवं कांग्रेस उसके वोट में सेंध लगाएगी। तो क्या अल्पसंख्यक वोट को दांव पर लगाकर, जो 20 फीसदी से ज्यादा हैं, वह भाजपा के साथ गठजोड़ करेंगी? वहां अगले छह महीने में स्थिति नाटकीय ढंग से बदल सकती है। संभव है कि वहां त्रिकोणीय मुकाबले में वाम मोरचे को फायदा हो जाए। दुखद है कि ममता बनर्जी ने ही खुद को हाशिये पर कर लिया है।

जहां तक जयललिता की बात है, तो गठबंधन की कुछ दिक्कतों के बावजूद तमिलनाडु में वह बेहतर स्थिति में है। लोकसभा चुनाव में वह 20 से 25 सीटें जीतना चाहेंगी, ताकि राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी भूमिका निभा सकें। चूंकि वह अनुभवी खिलाड़ी हैं, इसलिए जल्दबाजी में कदम नहीं उठाएंगी। उनके पास मौका भी है, क्योंकि द्रमुक अच्छी स्थिति में नहीं है। राजनीतिक आकलन में एक तथ्य का कोई उल्लेख नहीं कर रहा, वह यह कि विभिन्न दलों के 50 से 75 फीसदी सांसद अगले चुनाव में शायद ही वापसी कर सकें, क्योंकि पार्टियों की तुलना में व्यक्तिगत रूप से राजनेताओं के प्रति नकारात्मक रुझान ज्यादा दिख रहा है। खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे ज्यादातर सांसद इसीलिए मध्यावधि चुनाव नहीं चाहते।

देश में कानून-व्यवस्था एक गंभीर समस्या बन रही है। असम में आधुनिकतम हथियार भी जब्त किए गए हैं। लिहाजा हमें भविष्य के लिए अचूक सुरक्षा व्यवस्था बनाने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। निजी सुरक्षा आज कई लोगों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गई है। निजी सुरक्षा एजेंसियां कागजों पर तो ठीक हैं, लेकिन मेरा व्यक्तिगत अनुभव बताता है कि हाथ में हथियार पकड़ने से पहले व्यापक प्रशिक्षण की जरूरत पड़ती है, जिसमें वर्षों लग सकते हैं। यहां तक कि सुरक्षा बलों के लिए भी यह कठिन काम है।

कुछ ही दिनों पहले हमने महरौली में एक दुर्भाग्यपूर्ण वाकया देखा, जहां गोलीबारी में पोंटी चड्ढा और उनके भाई मारे गए। इस बारे में विस्तृत जानकारी तो जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन तथ्य बताते हैं कि उस परिसर में भारी मात्रा में हथियार उपलब्ध थे। निजी सुरक्षा गार्डों के अलावा वहां पंजाब पुलिस और उत्तराखंड के सुरक्षाकर्मी भी थे। राष्ट्रीय राजधानी में इस तरह की घटना स्तब्ध करने वाली है। पिछले कई वर्षों से मैंने उन समारोहों में जाना बंद कर दिया है, जहां अतिविशिष्ट एवं विशिष्ट लोग मौजूद रहते हैं। इसमें सार्वजनिक एवं निजी समारोह भी शामिल हैं, क्योंकि वहां लगभग सभी सुरक्षा से लैस होते हैं। यह किसी के लिए भी खतरनाक है।

करीब एक महीना पहले लोधी श्मशान गृह में मैंने देखा कि पंजाब के एक सांसद के साथ एक अकेला निजी सुरक्षाकर्मी था, जो न सिर्फ अयोग्य लग रहा था, बल्कि उसके पास जो कार्बाइन और पिस्तौल थी, वे गुजरे जमाने की थीं। मुझे डर लगा कि अगर वह गिर जाए, तो क्या होगा। जब इस तरह का कई हादसा होता है, तो खासकर सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा जांच बहुत सख्त हो जाती है, लेकिन बाद में वह शिथिल पड़ जाती है। मैं आश्वस्त हूं कि गृह मंत्री सुरक्षा के इन मुद्दों पर गौर करेंगे और कोई समाधान निकालेंगे, क्योंकि दूसरे राज्यों के सुरक्षाकर्मियों को साथ रखने से कई संवेदनशील मुद्दे जुड़े हैं।

इस बीच बाला साहब ठाकरे का निधन हो गया और मुंबई ने उन्हें भावभीनी विदाई दी। लेकिन उसके बाद जो घटनाएं हुईं, वे दुखद हैं। न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने फेसबुक पर टिप्पणी करने वाली लड़की के चाचा के क्लीनिक पर तोड़फोड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए दबाव डाला। उन दोनों लड़कियों और उनके परिजनों के चेहरे पर भय देखना दुखद था। वे सभी जो कानून तोड़ने, तोड़फोड़ करने और भय व नफरत फैलाने का काम करते हैं, लंबे समय तक जेल में रहने के अधिकारी हैं। शिवसेना एक राजनीतिक ताकत है और उसकी राजनीति पहले से ही स्पष्ट है। राजनीति में किसी भी स्तर पर खालीपन नहीं होता। शिवसेना में भावी लड़ाई पहले ही शुरू हो चुकी है। ऐसी घटनाएं, जाहिर है, शिवसेना को अपना खोया जनाधार हासिल करने में कोई मदद नहीं करेंगी।
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