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खुदरा में एफडीआई कौन चाहता है

सीताराम येचुरी

Updated Fri, 30 Nov 2012 09:46 PM IST
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मौजूदा शीत सत्र में शुरुआती हंगामे के बाद सरकार आखिरकार एफडीआई पर नियम 184 के तहत बहस पर राजी हो गई है। इससे पहले पिछले मानसून सत्र में भी एफडीआई पर सरकार के रुख पर विपक्षी पार्टियों ने व्यापक विरोध जताया था।
उससे भी पहले बजट सत्र के दौरान एक मौके पर पूर्व वित्त मंत्री और अब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संसद को आश्वासन दिया था कि सरकार सभी पार्टियों की सर्वानुमति बनाने की कोशिश के बाद ही इस निर्णय पर अमल करेगी। लेकिन संसद में अपने ही दिए आश्वासन को धता बताकर सरकार एकतरफा तरीके से एफडीआई लागू करने के बारे में सोच रही थी।

ऐसी ही परिस्थितियों में माकपा ने दोनों सदनों में इस मुद्दे पर ऐसे नियमों के तहत चर्चा के लिए नोटिस दिए, जिनमें अंत में मतदान होता है। हालांकि शुरुआती ना-नुकुर के बाद सहयोगी दलों के बूते मजबूत स्थिति में आने के बाद ही सरकार नियम 184 के तहत बहस पर राजी हुई है, फिर भी इस पूरे प्रसंग से उसकी असलियत का पता तो चलता ही है।

माकपा की रणनीति के विरुद्ध यूपीए से अब छिटक गई सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का विचार हवा में छोड़ा था, और उसके खारिज होने के बाद वह विपक्षी दलों पर ही हमले कर रही है। अब अविश्वास प्रस्ताव किसी खास मुद्दे पर तो होता नहीं है।

आम तौर पर ऐसा प्रस्ताव तभी लाया जाता है, जब लोकसभा के पर्याप्त सदस्य, जिनमें विभिन्न विपक्षी पार्टियों के सदस्य शामिल होंगे, ऐसे प्रस्ताव के पक्ष में एकजुट हों तथा इसके पारित होने के आसार हों। इसके विपरीत अविश्वास प्रस्ताव अगर लोकसभा में गिर जाता है, तो इससे न सिर्फ सरकार को और जीवन मिल जाता है, बल्कि उसे अपने पक्ष में इस मतदान को संसद के बहुमत के अनुमोदन के रूप में पेश करने का मौका मिल जाता है।

एफडीआई पर चौतरफा विरोध के बीच कांग्रेस ने पूरी कोशिश की कि उस नियम के तहत संसद में बहस न हो, जिसमें मतदान का प्रावधान है। बल्कि केंद्रीय वाणिज्य मंत्री ने यह दावा भी कर दिया था कि कार्यपालिका के रूप में सरकार के निर्णयों पर उन नियमों के तहत कभी बहस नहीं होती, जिनमें मतदान का प्रावधान है।

जब यह बताया गया कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल के दौरान एक मार्च, 2001 को माकपा सांसद रूपचंद पाल द्वारा पेश किए गए भारत एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड (बाल्को) के प्रस्तावित विनिवेश को खारिज करने से संबंधित प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था, और उस पर एक ऐसे ही नियम के तहत चर्चा हुई थी, जिसमें मतदान का प्रावधान है, तो संसदीय कार्य मंत्री ने यह कहते हुए उसे नकारने की कोशिश की कि बाल्को विनिवेश 'अपनी तरह का अकेला’ मुद्दा था, केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा तय की गई कोई नीति नहीं।

यह बहुत ही अजीब तर्क था। नहीं भूलना चाहिए कि रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, और शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही रिजर्व बैंक ने बहु ब्रांड खुदरा व्यापार में एफडीआई की इजाजत देते हुए नियमों में संशोधन करके अधिसूचना जारी की थी। न्यायालय ने आगे कहा था कि इस डर की कोई वजह नहीं कि सरकार इन संशोधनों को संसद में नहीं रखेगी। उसकी राय थी कि चूंकि संसद का सत्र शुरू होने जा रहा है, इसलिए इस अपील को संसद के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

वर्ष 2001 में बाल्को प्रकरण में कांग्रेस के प्रतिनिधि की हैसियत से प्रियरंजन दासमुंशी ने कहा था, मुझे लगता है कि संसद को अपनी परंपरागत नैतिकता दिखानी चाहिए और यह प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए कि हम इस सौदे को खारिज करते हैं और एक जेपीसी की मांग करते हैं। यह कांग्रेस और राजग के बीच की और माकपा तथा राजग के बीच की राजनीति का मामला नहीं है। यह राजग के घटक दलों को नीचा दिखाने का मामला भी नहीं है। यह देश के समक्ष संसद की अपनी मेधा का मामला है। एफडीआई पर बहस के वक्त कांग्रेस को अपने ही नेता की यह टिप्पणी याद रखनी चाहिए।
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