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इन बच्चियों को कौन बचाए

क्षमा शर्मा

Updated Tue, 20 Jun 2017 07:52 PM IST
Who save these girls

क्षमा शर्मा

अदालत में बच्ची को क्रयोंस दिए गए और कागज। जब बच्ची ने चित्र बनाया, तो काले और उदास रंगों से बने चित्र में पेड़ था, पहाड़ था, सूरज था। बच्ची के हाथ में गुब्बारे की डोरी थी। आसमान में लहराते गुब्बारे भी थे। लेकिन बच्ची की फ्राक नीचे फर्श पर पड़ी हुई थी। आठ साल की बच्ची ने अपने जीवन में हुई सबसे दर्दनाक घटना दुष्कर्म को इस चित्र के माध्यम से इस तरह से बयान किया।
मां की मृत्यु के बाद पिता ने इस बच्ची को बेसहारा छोड़ दिया। वह कोलकाता से दिल्ली आ गई। यहां अपने अंकल-आंटी के साथ रहने लगी। अंकल ने बच्ची के अनाथ होने का फायदा उठाया और उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया। अदालत ने बच्ची के चित्र को उसके साथ हुए हादसे का पुख्ता प्रमाण माना और दोषी को पांच साल की सजा सुनाई। हालांकि उसके अंकल ने कहा कि उसने कुछ नहीं किया है, उसे फंसाया गया है, लेकिन अदालत ने उसकी किसी बात को नहीं माना।

दूसरी घटना में बच्ची सिर्फ पांच साल की थी। यह बच्ची अपने भाई के साथ स्कूल जा रही थी। तभी एक लड़के ने आकर उसके भाई को दस रुपए देकर कुछ लाने को भेज दिया और बच्ची को एकांत में ले गया। बाद में बच्ची बिना स्कर्ट के एक महिला को रोती मिली।महिला उसके घर वालों का पता लगाकर उसे वहां ले गई। घर वाले भी बच्ची के इस तरह गायब हो जाने से परेशान थे।  

बच्ची के साथ हुई इस मर्मातंक घटना पर अदालत में बहस चल रही थी। उसे व्यस्त रखने के लिए अदालत में एक बार्बी गुड़िया दी गई। बच्ची गुड़िया से खेलने लगी। फिर उसने गुड़िया के प्राइवेट पार्ट्स को जिस तरह से छुआ, उससे अदालत में लोग चौकन्ने हुए। बच्ची ने जिस तरह से गुड़िया के अंगों को छुआ था, तो उसे देखकर न्यायाधीश ने पूछा कि क्या उसके साथ भी ऐसा हुआ है और बच्ची ने हां कहा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने बच्ची की बात पर पूरी तरह से यकीन किया। इससे पहले इस नन्ही बच्ची से बचाव पक्ष के वकील ने जिस तरह से बेहद घटिया और एक प्रकार से ऐसे बर्बर सवाल पूछे, जिनका अर्थ भी शायद यह बच्ची न समझती हो। उन सवालों को सुनकर उसने असहज भी महसूस किया। कम से कम वकीलों को बच्चियों के साथ इस तरह के अमानवीय व्यवहार से बाज आना चाहिए। 

यह अच्छी बात है कि उसकी इस मासूमियत और अबोध होने को अदालत ने अच्छी तरह से समझा। आज इस बच्ची की हालत यह है कि यह अपने पिता के साथ भी अकेली नहीं रहना चाहती। सोचिए कि इस बच्ची को जीवन भर के लिए किस मुसीबत में धकेल दिया गया। पुरुष मात्र उसे सिर्फ अपराधी ही लग सकता है।   

इन दोनों बच्चियों की हालत देख अफसोस होता है। क्या इसी संस्कृति पर हम इतराते हैं कि एक नन्ही बच्ची यौन अपराधियों का सहज शिकार बन सकती है। दया, ममता और करुणा की भावनाएं कहां लोप हो गईं।  

निर्भया के मसले पर जब बहसें हो रही थीं और बार-बार कठोर कानून बनाने की वकालत की जा रही थी। तब नए दुष्कर्म कानून को एक तरह से जैसे मीडिया में छाई बहसों के आधार पर ही बनाया गया था। मगर जिस तरह से आजकल दुष्कर्म की खबरें छाई रहती हैं , उससे यह लगता तो नहीं कि किसी कठोर कानून के बन जाने भर से कोई सबक लेता है।  

इन खबरों को पढ़-सुनकर ऐसा भी महसूस होता है कि बड़ी संख्या में छोटी बच्चियां इस तरह के अपराधों का शिकार बन रही हैं। कभी घर में, कभी स्कूल में, कभी पार्क में तो कभी स्कूल बस में तो कभी किसी समारोह में उन्हें इस तरह का शिकार बनाया जाता है। एक तरफ बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ जैसे अभियान, बेटियों को देवी मानने की परंपरा दूसरी ओर उनके प्रति किए जाने वाले जघन्यतम अपराध, आखिर इन अपराधों से कैसे मुक्ति मिले।
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