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पंचायतों की किसे है परवाह

जोगिंदर सिंह

Updated Sat, 06 Oct 2012 09:48 PM IST
who cares panchayats
कश्मीर आज अलगाववादियों, आतंकवादियों और कट्टरपंथियों का अड्डा बना हुआ है। सब कुछ सामान्य होने के सरकारी दावे के उलट पूरी घाटी में इन्हीं तत्वों की तूती बोल रही है। इन तत्वों ने 2011 में लोगों को पंचायत चुनाव में भाग न लेने की हिदायत दी थी। हालांकि 30 साल बाद हुए पंचायत चुनावों में 88 फीसदी मतदान हुआ और पूरे राज्य में 33,000 से ज्यादा सरपंच व पंच चुने गए।
राज्य सरकार ने तब नवनिर्वाचित पंचायत सदस्यों को सशक्तीकरण और स्थानीय शासन में अहम भूमिका दिए जाने का आश्वासन दिया था। लेकिन 2012 में तीन पंचायत सदस्यों की हत्या के बाद 800 से ज्यादा सरपंचों और पंचों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अब राज्य सरकार इन प्रतिनिधियों को सुरक्षा देने पर विचार करने की बात कह रही है। पर ऐसा कर पाना बहुत व्यावहारिक नहीं लग रहा है, क्योंकि इसके लिए उसे एक लाख से ज्यादा अतिरिक्त सुरक्षा बलों के अलावा भारी मात्रा में हथियार, परिवहन और आवासीय सुविधाओं की जरूरत होगी।

रही बात पंचायतों के सशक्तीकरण के मुद्दे की, तो इस पर वहां की गठबंधन सरकार यानी नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस में मतभेद है। इस तरह यह प्रक्रिया भी अधर में लटकी हुई है। दरअसल पंचायती राज प्रणाली खंड विकास परिषद और जिला स्तरीय निकायों के चुनाव के बगैर अधूरी है। और पंचायत चुनाव निपटने के एक साल बाद भी इस दिशा में कदम आगे नहीं बढ़ सके हैं। कश्मीर से संबंध रखने वाले एक केंद्रीय मंत्री का कहना है कि पंचायती इकाइयों के सशक्तीकरण और पंचायती राज प्रणाली के लिए संस्थागत ढांचे के निर्माण के बगैर पंचायत चुनावों का महत्व खत्म हो जाएगा।

दूसरी तरफ, 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के मुताबिक पंचायतों को सशक्त करने के बजाय राज्य के मुख्यमंत्री का कहना है कि उन्हें ऐसे किसी संशोधन की जरूरत नहीं है। वह कश्मीर में सब कुछ ठीक-ठाक होने का लगातार दावा करते रहे हैं। यही नहीं, वह घाटी से अशांत क्षेत्र अधिनियम को हटाने और वहां केंद्रीय सुरक्षा बलों की उपस्थिति को कम करने की भी वकालत करते आ रहे हैं। अब सरपंचों और पंचों की हत्या के बाद मुख्यमंत्री का कहना है कि पंचायती राज के कामकाज को भटकाने के लिए हुर्रियत कांफ्रेंस और आतंकवादी ऐसी हरकतों को अंजाम दे रहे हैं। पंचायती राज संस्था के सदस्यों पर हमला फिर दर्शाता है कि आतंकवादी राज्य को संपन्नता और विकास से दूर रखना चाहते हैं।

वैसे आतंकवादी घटनाओं के इजाफे पर वहां के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार को दोषी ठहराते हुए कहते हैं कि अगर कुछ लोग यह कहते हैं कि इस साल घाटी में आतंकवाद में बढ़ोतरी हुई है और वहां सुरक्षा बलों की उपस्थिति को बढ़ाए जाने की जरूरत है, तो उन्हें सबसे पहले मेरे एक सवाल का जवाब देना चाहिए। सवाल यह है कि आतंकवादी घुसपैठ करने में कैसे कामयाब हो जाते हैं। सुरक्षा बल अगर पाकिस्तान से उनकी घुसपैठ रोकने में नाकाम हैं, तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि आखिर वे क्या कर रहे हैं?

देश के बाकी हिस्सों की तरह जम्मू-कश्मीर में भी सत्ता में बैठे लोग सख्त और जरूरी कदम उठाने के बजाय केवल सरकार चलाना चाहते हैं। खुद जरूरी कामकाज करने के बजाय राज्य के मुख्यमंत्री फतवा जारी करने के लिए धार्मिक मौलवियों की ओर देख रहे हैं। कहते हैं कि हाल ही में उन्होंने श्रीनगर के एक दैनिक समाचार पत्र  को बताया, 'घाटी में बिजली की कमी  के लिए मीरवाइज ने सरकार को दोषी ठहराया है। हम उम्मीद करते हैं कि अगले शुक्रवार की नमाज के बाद मीरवाइज बिजली चोरी करने वालों के खिलाफ फतवा जारी करेंगे!'

मुख्यमंत्री मानते हैं कि बिजली चोरी की वजह से राज्य को सालाना 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। कश्मीर घाटी को आजादी के बाद से विशेष तरजीह दी जा रही है। इसे पहले भी भारी केंद्रीय सहायता मिलती थी, अब भी मिलती है। वर्ष 1984-89 की योजना अवधि के दौरान केंद्रीय सहायता के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में प्रति व्यक्ति विकास गतिविधियों पर खर्च 962 रुपये था, जबकि गुजरात में यह 490 और बिहार में महज 270 रुपये ही था। उसका 2010-11 और 2011-12 का बजट क्रमश: 28,733 और 31,212 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 90 फीसदी आर्थिक मदद और 10 फीसदी ऋण शामिल हैं। जबकि देश के अन्य राज्यों को 30 फीसदी आर्थिक मदद और 70 फीसदी ऋण के रूप में मिलता है।

कश्मीर घाटी के लोगों को पिछले चार दशक से सबसिडी पर सस्ता भोजन, जलाने योग्य लकड़ी, नमक, बागानों के कीटनाशक जैसी अनेक सुविधाएं मिलती हैं। जब पूरा देश कश्मीर में अमन और खुशहाली के लिए खर्च कर रहा है, तब वहां की सरकार को आतंकवादियों पर रहम कतई नहीं करना चाहिए।
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