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राहुल कब संभालेंगे नई जिम्मेदारी

तवलीन सिंह

Updated Sat, 27 Oct 2012 09:04 PM IST
when rahul handle new responsibilities
राजधानी दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कुछ दिनों से फिर अफवाहें गरम हैं राहुल गांधी के मंत्री बनने की। ऐसी अफवाहें कई बार सुनने को मिली हैं, 2009 के आम चुनाव के बाद से, इसलिए कि तकरीबन तय हो गया था उसी समय कि 2012 में राहुल अपनी राजनीतिक विरासत संभाल लेंगे, यानी प्रधानमंत्री बन जाएंगे या किसी महत्वपूर्ण मंत्रालय का जिम्मा संभालेंगे।
तबसे छोटे कार्यकर्ताओं से लेकर वरिष्ठ मंत्रियों तक कांग्रेस पार्टी का हर सदस्य अपना असली नेता राहुल गांधी को ही मानता आया है। जो जगह कभी उनकी माताजी की हुआ करती थी, वह सोनिया जी के बीमार हो जाने के बाद राहुल की हो गई है। मेरे कांग्रेसी दोस्त चुपके से यह भी स्वीकार करते हैं कि राहुल जी की अचानक गायब हो जाने की जो आदत है, वह उनको अच्छी नहीं लगती है। उत्तर प्रदेश का चुनाव हार जाने के बाद राहुल जी कहां रहे हैं, वह इतनी राज की बात है कि अटकलें लगती रहती हैं।

कभी अफवाह फैलती है कि वह सऊदी अरब में दिखे, तो कभी मालूम पड़ता है कि वह सिंगापुर में हैं या फिर नई अफवाह शुरू हो जाती है कि वह अपनी माताजी के साथ यूरोप चले गए हैं छुट्टियां मानने। वैसे तो हिसाब रहता है पूरा कि कौन-सा सांसद कहां जाता है और कब जाता है, लेकिन सोनिया और राहुल गांधी की बात अलग है। न कोई यह जानता है कि वह कब देश से बाहर जाते हैं और न ही यह जानता है कि कैसे जाते हैं। यह भी नहीं पता लगता कि वह एयर इंडिया से जाते हैं या किसी के प्राइवेट जहाज से। उनके वापस आ जाने के बाद ही किसी कांग्रेसी प्रवक्ता द्वारा यह खबर मिलती है कि वह वतन लौटकर आ गए हैं।

समस्या यह है कि राजनीति में नेतृत्व इस तरह की लुका-छिपी करके नहीं किया जा सकता। जितनी जरूरत चुनावों के दौरान होती है राजनेताओं में नेतृत्व दिखाने की, उतनी ही जरूरत होती है चुनावों के बाद, फिर चाहे चुनाव में जीत मिली हो या हार। लेकिन ऐसा लगता है कि यह बात राहुल जी को समझाई नहीं गई है, सो बिहार में चुनाव हार जाने के बाद वह कई महीनों तक गायब रहे, और उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद भी उन्होंने बिलकुल ऐसा ही किया। कभी लोकसभा में उनकी झलक दिख भी जाती है, तो अकसर वह चुप ही रहते हैं। पिछली बार उन्होंने भाषण तब दिया था, जब कोई एक वर्ष पहले लोकपाल पर बहस हुई थी।

उनकी चुप्पी, उनके गायब रहने के कारण कांग्रेस में जो मायूसी का माहौल पिछले दो वर्षों से बना हुआ है, वह गहराता गया है। भ्रष्टाचार के इलजाम लगे हैं पिछले दिनों उनके अपने बहनोई पर, लेकिन राहुल जी इन इलजामों के बारे में क्या सोचते हैं, कोई नहीं जानता। इलजाम लगे उसके बाद देश के कानून मंत्री पर, लेकिन राहुल जी इन आरोपों के बारे में क्या सोचते हैं, कोई नहीं जानता। प्रधानमंत्री ने आर्थिक सुधारों का एक नया दौर शुरू किया पिछले दिनों, लेकिन इन सुधारों के बारे में राहुल जी क्या सोचते हैं, कोई नहीं जानता। न ही उनकी तरफ से हमने कभी दो शब्द सुने हैं उनकी सरकार की विदेश नीतियों के बारे में, या अरब देशों में हुए महान राजनीतिक परिवर्तन के बारे में।

माना कि गांधी परिवार का दरजा अपने देश में एक शाही परिवार का है, लेकिन फिर भी अधिकार है हमें उनके विचार जानने का। इसका मतलब यह नहीं है कि वह विदेश यात्राओं पर जा ही नहीं सकते हैं। वह विदेश यात्राओं पर जरूर जाएं, लेकिन कम से कम इतना तो बताकर जाएं कि कहां जा रहे हैं और किस वास्ते जा रहे हैं।

सो अगर इस बार अफवाहें निकलती हैं और राहुल जी शामिल हो जाते हैं मंत्रिमंडल में, तो बहुत जरूरी है कि वह अपने तौर-तरीके बदलने की तकलीफ करें। जनता के प्रतिनिधियों पर जनता का पूरा अधिकार होता है, लेकिन राहुल जी जब दिल्ली में होते हैं, तब भी तो दूर रहते हैं जनता से इतना कि उनसे मिलना तकरीबन नामुमकिन होता है। कभी वह प्रकट हो जाते हैं दिल्ली की किसी शानदार महफिल में अपने दोस्तों के साथ, लेकिन आम आदमी से तो तभी मिलते हैं, जब वह चुनावों में प्रचार करने के लिए बाहर निकलते हैं। दिल्ली के तुगलक लेन स्थित उनके बंगले के आसपास अगर कोई आम आदमी भूलकर पहुंचता भी है, तो उसको फौरन भगा दिया जाता है सुरक्षा के बहाने।
     
लोकतंत्र में इस तरह के शाही अंदाज नहीं होते। मंत्री बनते हैं अगर राहुल गांधी, तो उनके लिए जनता से दूर रहना आसान नहीं होगा। मंत्री बनते ही उनका उत्तरदायित्व बढ़ जाएगा इतना कि कम से कम पत्रकारों से दूर रहना तो मुश्किल ही होगा उनके लिए। वरना युवराज साहब ही रहें, तो उनके लिए बेहतर होगा।
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