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जब म‌िलेंगे मोदी और ट्रंप

सुरेंद्र कुमार

Updated Tue, 20 Jun 2017 07:59 PM IST
When Modi and Trump will meet

सुरेंद्र कुमार

एक दशक तक अमेरिकी वीजा पर प्रतिबंध के बाद सितंबर, 2014 में नरेंद्र मोदी वाशिंगटन पहुंचे थे, तो रॉक स्टार प्रधानमंत्री के रूप में उनका स्वागत किया गया था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के साथ खाना खाए बिना ही उन्होंने गर्मजोशी का परिचय दिया था, नवरात्रि के व्रत के कारण ह्वाइट हाउस में उनके सम्मान में दिए गए भोज में मोदी ने सिर्फ शहद के साथ गुनगुना पानी पिया था! ह्वाइट हाउस में ऐसा कुछ कभी नहीं देखा गया था। तब से लेकर अब तक हडसन नदी में काफी पानी बह चुका है।
हालांकि मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय प्रधानमंत्री मोदी से तीन बार फोन पर बातचीत की है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप नरेंद्र मोदी के लिए अब भी एक अज्ञात व्यक्तित्व हैं। ट्रंप ने अमेरिका और चिंतित विदेशों में भी अपने दोस्तों और दुश्मनों के बीच विघटनकारी और विभाजनकारी नेता की अविश्वसनीय प्रतिष्ठा अर्जित की है, और अमेरिका के सहयोगी देशों के साथ भी अपरंपरागत असंवेदनशीलता का परिचय दिया है, जैसा कि जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल जी-7शिखर सम्मेलन में उनकी झिड़की को याद करती हैं और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री फोन पर उनकी बातचीत को। लेकिन जो लोग ट्रंप और मोदी की पहली बैठक को लेकर अनावश्यक रूप से चिंतित हैं, वे भारतीय प्रधानमंत्री की आक्रामक विरोधियों के साथ भी व्यक्तिगत रिश्ते बनाने की सहज क्षमता को कमतर आंकते हैं।

आखिर इस पूर्व चाय वाले और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक ने जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के साथ रचनात्मक, कलात्मक, गर्मजोशी और प्रेरक तरीके से रिश्ते बनाए ही। यह अलग बात है कि चीन के साथ गंभीर मतभेद बने हुए हैं। 

मुझे इसका कोई कारण नहीं दिखता कि जलवायु परिवर्तन, भारतीय आईटी कंपनियों और एच1बी वीजा जैसे मुद्दों पर भारत के बारे में ट्रंप के हालिया बयान पर मोदी को प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। बेशक मोदी एक 'चतुर बनिया' नहीं हैं, लेकिन वह निश्चित रूप से एक 'चतुर कूटनीतिक' हैं। वह ट्रंप को भारत के साथ अमेरिकी रिश्ते के सुनहले पक्ष को दिखाने में सक्षम हैं, जो उन्हें इससे पहले किसी ने नहीं दिखाया है। 

भारतीय आईटी कंपनियों ने अमेरिका में कितना निवेश किया है, कितना अरब डॉलर उन्होंने टैक्स के रूप में अमेरिका को दिया है और कितने रोजगार इन कंपनियों ने पैदा की हैं, इस पर जोर देने के लिए नैस्कॉम ने कोई तर्क या आंकड़ा पेश नहीं किया है। ये आंकड़े वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ किसी भी नाराजगी को खत्म कर सकते हैं। वह इन मुद्दों पर अब भी कठिन रुख अपनाए हुए हैं, क्योंकि यह उन्हें अपने समर्थकों को खुश करना है।

इसके अलावा इन्फोसिस, विप्रो और टीसीएस की इन त्वरित घोषणाओं से, कि वे आने वाले वर्षों में हजारों अमेरिकियों को नौकरी देंगे, ट्रंप को यह मानने के लिए पर्याप्त असलहा मिलता है कि उनकी कठोरता काम करती है। मोदी को ट्रंप को समझाना चाहिए कि चूंकि अमेरिका नवाचारों का दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र है, भारत का आईटी क्षेत्र, जो अदम्य क्षेत्रों में नए, ज्यादा जटिल और अत्याधुनिक सेवाओं की पेशकश के लिए ऊंचा उठने की आकांक्षा रखता है, अमेरिकी कंपनियों को उन क्षेत्रों का पता लगाने के लिए व्यापक अवसर देता है। भारत के आईटी क्षेत्र में अमेरिकी निवेश से अमेरिका के लिए व्यवसाय के साथ रोजगार भी पैदा होंगे। 

सामान्य धारणा के विपरीत, ट्रंप की 'अमेरिका प्रथम' की नीति और मोदी के 'मेक इन इंडिया' के बीच कोई मौलिक संघर्ष नहीं है। ट्रंप का पूरा जोर है कि अमेरिकी कंपनियों को अमेरिका में निवेश करना चाहिए, ताकि नौकरियां विदेशों में न जाए। अमेरिकी राष्ट्रपति की यह प्राथमिकता भारत के लिए एक अवसर हो सकती है।

मोदी ट्रंप को समझा सकते हैं कि भले ही चीन मेक इन इंडिया परियोजना में बड़े पैमाने पर निवेश करके उत्पादन की अप्रयुक्त अधिक्षमता और बड़ी छंटनी की समस्याओं का सामना कर रहा है, लेकिन अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में निवेश करके अमेरिका में हजारों नौकरियां वापस ला सकती हैं और ब्रांडेड वस्तुओं का निर्माण कर सकती हैं, जिसे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भेजा जा सकता है। मेक इन इंडिया भी भारत और दुनिया के लिए निर्माण को लेकर है। यह उससे अलग खेल है,जिसमें जापानी ऑटोमोबाइल कंपनियां मैक्सिको में अपने प्लांट स्थापित करती हैं और अमेरिका की सीमा से बाहर कारों को भेजती हैं!

पिछले पांच वर्षों में 15 अरब डॉलर के अमेरिकी रक्षा निर्यात ने अमेरिका में काफी रोजगार पैदा किया है। अगर अमेरिका भारत में रक्षा उत्पादों का उत्पादन शुरू करता है, रोजगार सृजन कई गुना बढ़ेगा। एफ-16 लड़ाकू विमान के निर्माण के लिए लॉकहीड-टाटा समझौता अच्छा है।  सड़क, बंदरगाह, हवाई अड्डा, रेलवे, स्मार्ट सिटी, जल प्रबंधन, सीवेज सिस्टम जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों के लिए काफी संभावनाएं हैं, अगर वे कुशलता से काम करें। अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कार्बन उत्सर्जन कम करने और नवीनीकृत ऊर्जा पैदा करने के लिए उच्च प्रौद्योगिकी प्रदान करनी चाहिए। 
भारतीय कंपनियों ने अमेरिका समेत विभिन्न देशों में अरबों डॉलर का निवेश किया है।

अगर अमेरिकी सरकार उनके लिए आकर्षक नीति बनाए, तो अमेरिका में उनके निवेश की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। हालांकि व्यवसायी राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों के विस्तार की अच्छी संभावनाएं नजर आती हैं, लेकिन संबंधों का रणनीतिक पहलू कई वैश्विक/क्षेत्रीय मामलों में उनके आवेगी, अप्रत्याशित और असंवेदनशील प्रतिक्रिया के चलते धुंधला दिखता है। पिछले चार महीनों में उन्होंने जितने यू टर्न लिए हैं, उससे पता चलता है कि अगर प्रचलित परिस्थितियां इतनी जरूरी होती हैं, तो सुधार करने में वे पीछे नहीं रहते हैं। इसकी पुष्टि इस उदाहरण से होती है कि चीन के बारे में अपने चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने क्या कहा था और कैसे उन्होंने चीनी राष्ट्रपति की मेजबानी के बाद चीन के साथ एक उपयोगी रिश्ता बनाया। 

चीन और सऊदी अरब के बहावी शासन के साथ उनके हाथ मिलाने,  ईरान को धमकाने और छोटे से कतर को अलग-थलग करने का समर्थन करने जैसी घटनाओं ने हमारे लिए जटिलताएं पैदा की हैं, जैसा कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर उनका रुख हमारे लिए खतरनाक है। ओबामा के दूसरे कार्यकाल के विपरीत  ट्रंप के नेतृत्व में इस्राइल के साथ अमेरिका के रिश्तों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इस्राइल के साथ हमारा भी बेहतर रिश्ता है, जो मोदी के दौरे को दौरान और भी गहरा होगा। इस्राइल के साथ हमारी बढ़ती गर्मजोशी न केवल द्विपक्षीय रिश्तों का विस्तार कर सकती है, बल्कि ट्रंप के साथ बेहतर रिश्ते बनाने में भी मदद कर सकती है। मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति के वरिष्ठ सलाहकार कुशनेर और ट्रंप की बेटी इवान्का के प्रति अपनी दिलचस्पी का भी इस्तेमाल करना चाहिए।
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