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जब सरकार ही बेबस हो

बी रमन

Updated Tue, 25 Dec 2012 09:00 PM IST
when government is helpless
नई दिल्ली में पिछले दिनों एक 23 वर्षीय युवती के साथ चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद देश भर के लोगों, खासकर युवाओं का आक्रोश फूट पड़ा। इस जनाक्रोश से उपजे हालात से निपटने में केंद्र की डॉ मनमोहन सिंह की अगुआई वाली सरकार और सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस लगातार विफल रही है। उनके रुख से ऐसा लगा कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि ऐसे हालात से कैसे निपटा जाए।
इस सामूहिक जनाक्रोश की कई वजहें हैं। सबसे पहला तो यही कि महिलाओं के खिलाफ अपराध तेजी से बढ़े हैं, पर बार-बार होने वाले ऐसे अपराधों को रोकने में पुलिस विफल रही है। सामूहिक बलात्कार की इस घटना के खिलाफ नई दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे युवाओं की भीड़ से निपटने में भी दिल्ली पुलिस ने आश्चर्यजनक तरीके से अनाड़ीपन एवं बर्बरता का परिचय दिया।

इसके अलावा दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार मौजूदा स्थिति की गंभीरता और लोगों के गुस्से की प्रचंडता को ठीक से समझ नहीं पाई। दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर के जरिये दिल्ली पुलिस पर नियंत्रण करने वाले केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा दिल्ली सरकार के बीच कार्रवाई को लेकर मतैक्य का भी अभाव दिखा। दिल्ली में कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण की जिम्मेदारी लेफ्टिनेंट गवर्नर पर होती है, जबकि मुख्यमंत्री शासन के बाकी कामकाज के लिए जिम्मेदार है।

इस मामले में पुलिस के कामकाज पर नियंत्रण का भी घोर अभाव दिखा। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी प्रदर्शनकारियों से नम्रतापूर्वक बातचीत एवं मंत्रालय के प्रबंधन में अक्षमता दिखाकर संवेदनहीनता का ही परिचय दिया। प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ऐसे हैं, जो न तो अपने बूते सरकार चला रहे हैं और न ही किसी पर वास्तव में उनका नियंत्रण है। संसद में और संसद से बाहर भी आम लोगों से संवाद बनाने में वह कोई उत्साह नहीं दिखाते हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बिना देश के लोगों, खासकर युवाओं की भावनाओं और संवेदनाओं को ठीक से समझे ही व्यापक अधिकार का उपयोग करती हैं। एक तरह से केंद्र सरकार के पास कोई योग्य राजनीतिक सलाहकार नहीं है, जो राजनीतिक नेतृत्व की कमियों को दूर सके और आंतरिक संकट की स्थिति से निपटने के लिए प्रधानमंत्री को जरूरी सलाह मुहैया करा सके।

राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमेटी, सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी, सचिव स्तरीय समिति, संयुक्त खुफिया समिति, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड जैसी संस्थाएं, जिनका गठन वर्षों पहले प्रधानमंत्री एवं उनके कैबिनेट को आपदा-प्रबंधन, रणनीतिक विचार-विमर्श एवं नीति-निर्माण में मदद करने के लिए किया गया था, उस तरह काम नहीं कर रही हैं, जैसे पहले के प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में इस्तेमाल की जाती थीं।

कानूनी तौर पर सत्ता और नीति-निर्माण का काम प्रधानमंत्री के पास होता है, पर फिलहाल प्रधानमंत्री कार्यालय में इसका अभाव दिखता है। वास्तविक रूप में केंद्र की सत्ता कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द ही केंद्रित है, जिसके चलते सरकारी कामकाज में भ्रम की स्थिति बढ़ती है।

पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके कुछ पूर्व नौकरशाहों के बीच मौजूदा हालात पर बातचीत हो रही थी, तो उस दौरान कुछ लोगों ने सवाल किया कि सरकारी कामकाज के बारे में मुख्य रूप से फैसला कौन लेता है? सरकारी कामकाज से संबंधित फैसले आखिर कहां लिए जाते हैं, कांग्रेस मुख्यालय में या प्रधानमंत्री कार्यालय में? सरकारी कामकाज में स्पष्टता और जनसंपर्क व जनसंवाद को सुनिश्चित करने के लिए मुख्य रूप से कौन जिम्मेदार है? घटनाक्रमों पर कौन नजर रखता है और कौन प्रधानमंत्री को उचित कदम उठाने एवं नीतिगत विकल्प के बारे में सलाह देता है? इन सवालों के जवाब वहां उपलब्ध नहीं थे।
 
दरअसल केंद्र की मौजूदा सरकार नीतिगत अपंगता की शिकार है। जब तक इसका उपचार नहीं किया जाएगा, तब तक हालात में सुधार की संभावना नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार और कांग्रेस जनता के इस व्यापक गुस्से और सरकारी अपंगता को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि विपक्ष कोई वैकल्पिक नीतिगत ढांचा लेकर सामने आने में असमर्थ है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा स्वयं कुछ हद तक सांगठनिक पक्षाघात की शिकार है। बेशक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी शासन की एक अलग शैली के साथ सामने आए हैं, पर उनकी पार्टी और उसका मौजूदा नेतृत्व अखिल भारतीय स्तर पर ऐसा वैकल्पिक शासन दे पाने में अक्षम है।

देश के मौजूदा हालात का उपचार लोकसभा चुनाव नहीं है, चाहे वह अभी हो या 2014 में। देश एक लंबे समय से कुशासन से जूझ रहा है और प्रशासनिक अपंगता तब तक रहेगी, जब तक कांग्रेस एवं देश भर में वंशवाद के शासन की बुराइयों  के बारे में अनुभूति नहीं होगी और इसकी गिरफ्त से बाहर निकलने की जरूरत महसूस नहीं की जाएगी। दुनिया के सभी लोकतंत्रों में लोगों को सार्वजनिक जगहों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन उन्हें यह हक नहीं है कि जब चाहे जहां चाहे प्रदर्शन करें। पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ प्रतिबंध लगाने ही पड़ते हैं।

वाशिंगटन में ह्वाइट हाउस, उपराष्ट्रपति के निवास स्थान और रक्षा विभाग पेंटागन आदि के आसपास प्रदर्शन प्रतिबंधित है। इसी तरह लंदन में भी 10, डाउनिंग स्ट्रीट और बकिंघम पैलेस के आसपास प्रदर्शन नहीं किए जा सकते। दिल्ली पुलिस ने उचित ही राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री निवास, संसद तथा साउथ और नार्थ ब्लॉक के आसपास निषेधाज्ञा जारी की। मगर, ऐसा लगता है कि शीर्ष पदों पर बैठे लोग ही स्थिति को ठीक से समझ नहीं पाए।
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