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अब सीरिया में क्या करेंगे ओबामा

थॉमस एल फ्रीडमैन (जाने-माने स्तंभकार)

Updated Mon, 19 Nov 2012 04:06 PM IST
what will obama now in syria
अमेरिका में सेना और खुफिया सेवा के दो अधिकारियों का सेक्स स्केंडल में फंसना इससे बुरे वक्त में नहीं हो सकता, जब मध्य-पूर्व के हालात पहले से ज्यादा बिगड़ चुके हैं और वहां परस्पर टकराव विस्फोटक होता जा रहा है। वैसे देखा जाए, तो ड्वाइट आइनजहॉवर से लेकर अब तक जितने भी राष्ट्रपति हुए, उनके लिए पश्चिम एशियाई देश किसी संकट से कम नहीं रहे। आइजनहॉवर के दौर में लेबनान गृहयुद्ध से घिरा था और इस्राइल ने सिनाई पर हमला किया। लिंडन जॉनसन के समय 1967 में सात दिनों का युद्ध हुआ। निक्सन ने भी 1973 का युद्ध झेला।
कार्टर के लिए ईरानी क्रांति चुनौती बनी। रोनाल्ड रीगन के समय में लेबनान ने हालात बिगाड़े। जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने इराक से मुश्किलें झेलीं। बिल क्लिंटन के दौर में अल कायदा और अफगानिस्तान का मामला गरमाया। बराक ओबामा के भी पहले कार्यकाल में ईरान और अफगानिस्तान के हालात सुर्खियां बने। और अब, जबकि ओबामा के सिर एक बार फिर राष्ट्रपति का ताज सजा है, मुझे डर है कि कहीं पश्चिम एशिया के हालात उनके लिए कोई दुःस्वप्न न साबित हों।
 
आज पूरे पश्चिम एशिया में प्रतिरोध की ध्वनि तेज हुई है और गृहयुद्ध जैसे हालात बन रहे हैं। वहां राज्यों में बिखराव हो रहा है और लोग देश छोड़ रहे हैं। इन सबके केंद्र में सीरिया है, जहां की कुव्यवस्था पड़ोस को दुष्प्रभावित कर रही है। लेकिन दुर्भाग्य से ओबामा का जोर अर्थव्यवस्था पर है, जो चट्टान की तरह बढ़ रहे राजकोषीय घाटे से दब रहा है। जब सीरिया में विद्रोह शुरू हुआ, तो मैंने चिंता जाहिर की थी कि चूंकि लीबिया, मिस्र, यमन, बहरीन और ट्यूनीशिया में सत्ता-विरोधी प्रदर्शन तेज हो गए हैं, इसलिए अगर सीरिया में राजनीतिक गतिरोध नहीं तोड़ा गया, तो वहां के हालात विस्फोटक हो सकते हैं। अभी वही हो रहा है, जिसका मुझे अंदेशा था।

सीरिया आज इसलिए उबल रहा है, क्योंकि एक तो उसकी सीमाएं वास्तविक नहीं हैं, और दूसरा, वहां के सुन्नी, शिया, अलवाइट, कुर्द, ड्रूज और ईसाई जैसे समुदाय पड़ोसी देशों से संपर्क स्थापित कर अपने समुदाय से मदद लेने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि सीरिया और बहरीन (यहां अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े का बेस भी है) में सुन्नी बहुल सऊदी अरब शिया बहुल ईरान से छद्म युद्ध कर रहा है। इसी तरह, पिछले सप्ताह बहरीन में जब बम-विस्फोट हुए, तो उसका ठीकरा सुन्नी बहुल इस देश में 31 शिया राजनीतिक कार्यकर्ताओं के सिर फूटा और उनकी नागरिकता बर्खास्त कर दी गई।
 
ऐसे में अब क्या किया जा सकता है? मेरा मानना है कि इराक के हालात का अध्ययन कर बेहतर विकल्प तैयार किए जा सकते हैं, जहां सीरिया की तरह ही सुन्नी, शिया, ईसाई और कुर्दों जैसे समुदायों का मिश्रण रहता है। आखिर क्या वजह रही कि सद्दाम को जब सत्ता से बेदखल किया गया, तो इराक में सीरिया की तरह प्रदर्शन नहीं हुए? इसका जवाब है, अमेरिका, जिसने वहां भू-राजनीतिक समानता को तरजीह दी।

इराक में सद्दाम के अंत के बाद शिया और सुन्नियों में सत्ता-संघर्ष तेज हुए। उस संघर्ष में हजारों इराकी नागरिकों के साथ 4,700 से अधिक अमेरिकी सैनिक भी मारे गए। बावजूद इसके अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी वहां बनी रही और हिंसा को भौगोलिक सीमा से बाहर नहीं जाने दिया गया। और जब शिया और सुन्नियों का गृहयुद्ध खत्म हुआ, तो उसने ऐसे मध्यस्थता की भूमिका निभाई, जिसने इराकी शिया, सुन्नी और कुर्दों के बीच सत्ता का सरस बंटवारा किया। इसके बाद ही अमेरिका उस देश से विदा हुआ।
 
बहरहाल, अगर आप सीरिया में बहु-सांप्रदायिक शासन के तख्ता पलट की कोशिश कर रहे हैं, तो आपको निश्चय ही वैसी ही बाहरी ताकतों की जरूरत होगी, जो अंदरूनी संघर्ष को नियंत्रित और नई सरकार के लिए मध्यस्थता करे। सीरिया का गृहयुद्ध सुन्नी विद्रोहियों द्वारा शुरू किया गया था, जिसकी मंशा राष्ट्रपति बशर अल असद और उनकी अल्पमत अलवाइट-शिया सरकार को सत्ता से हटाना है। लेकिन चूंकि कोई भी बाहरी शक्ति सीरियाई हालात में शामिल नहीं होना चाहती, इसलिए वहां हिंसा अनियंत्रित हो रही है और शरणार्थियों की संख्या बढ़ रही है। हालात इतने बदतर हो रहे हैं कि सीरिया का शिया-सुन्नी विवाद इराक, बहरीन, लेबनान, सऊदी अरब, तुर्की और कुवैत जैसे देशों के शिया-सुन्नियों को भी उद्वेलित कर रहा है।

हालांकि इराक से एक और सबक लेने की जरूरत है, और वह यह कि वहां पूरे वर्ष शिया और सुन्नियों में मारकाट नहीं होती। बेशक, उनका संघर्ष सातवीं शताब्दी से ही चलता आ रहा है, लेकिन जब इराक में उनके बीच सत्ता-संघर्ष हुआ, तब भी उन्होंने आस्था पर हमला नहीं किया। हालांकि शांति कायम होने के बाद इराकी शियाओं और सुन्नियों की आपस में शादियां भी हुईं और एक-दूसरे के साथ काम करने की इच्छा भी उन्होंने जताई।

यहां तक कि उन्होंने 2009-10 के आम चुनाव में बहुजातीय पार्टी का संचालन भी किया। इसलिए सीरिया के हालात हाथ से नहीं निकले हैं। हालांकि अमेरिकी अधिकारी यदि पश्चिमी देशों के सहयोग से असद को सत्ता से हटाते हैं, तो वे ईरान की आलोचना ही झेलेंगे। और इससे संघर्ष खत्म होगा, इस पर संदेह है।

सीरिया में यह डर भी है कि यदि बिना किसी तटस्थ तीसरे पक्ष की मौजूदगी में असद को सत्ता से हटाने की पहल की जाती है, तो इससे न सिर्फ वहां स्थायी गृहयुद्ध की स्थिति बन जाएगी, बल्कि इसकी आग पूरे क्षेत्र में फैलेगी। लिहाजा भले ही यह लंबा रास्ता हो, हमें रूस के साथ बात करनी चाहिए, जो सीरिया का भरोसेमंद साथी है। सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया में उसकी मदद ली जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो सीरिया का शिया-सुन्नी संघर्ष क्षेत्र को विद्वेष की आग में तो झोंकेगा ही, पश्चिम एशिया के बिखराव का भी आधार तैयार करेगा।
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