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अपना काम करने में संकोच कैसा

पंकज चतुर्वेदी

Updated Mon, 12 Nov 2012 11:10 PM IST
what hesitate to own work
बीते दिनों मीडिया में दो खबरें एक ही दिन सुर्खियां बनीं। पहले में दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के एक जिले में सरकारी स्कूल के एक टीचर की लानत-मलानत की गई थी, क्योंकि उसने बच्चों से अपनी कक्षा की सफाई करवाई थी। और दूसरी खबर भी उत्तर प्रदेश से ही थी, जिसमें स्थानीय निकाय में सफाई कर्मचारी की खाली जगहों के लिए एम.ए. पास लोगों ने अरजी दी, जिनमें कई सामान्य और उच्च जातियों के थे।
निश्चय ही आज ऐसे लोगों की कमी नहीं होगी, जो बच्चों से कक्षा में झाड़ू लगवाने को बाल अधिकार, बाल श्रम या बच्चों के शोषण से जोड़कर देखते हों। और ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में होंगे, जो उच्च शिक्षा या ऊंची जाति के लोगों द्वारा सफाई कर्मी के लिए अरजी देने को देश में बढ़ती बेरोजगारी, दुर्गति और शिक्षा के अवमूल्यन से जोड़कर देख रहे होंगे। क्या कभी ऐसा सोचा गया कि आजादी के पैंसठ वर्ष बीत जाने के बाद भी आम हिंदुस्तानी ने न तो श्रम की कीमत समझी है, और न ही शिक्षा का उद्देश्य।

क्या अपने घर की सफाई करना दोयम दरजे का काम है? क्या शौचालय साफ करना गलत कार्य है? क्या एम.ए. की डिगरी पाकर खेत या खलिहान में काम करना सम्मान के विरुद्ध है? इन सभी संशयों/भ्रांतियों का जवाब महात्मा गांधी के दर्शन से मिल जाता है। एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित पुस्तक बहुरूप गांधी में इंग्लैंड से बैरिस्टर की डिगरी प्राप्त करने वाले गांधी को लेखक-प्रकाशक, सफाई कर्मी और न जाने किन-किन रूपों में बड़े ही सहज तरीके से बताया गया है।

गांधी जी की बुनियादी शिक्षा में ‘शिक्षण में समवाय’ की बात कही गई है। समवाय, यानी जिस तरह कपड़े बुनने की खड्डी में तागे को दायें-बायें, दोनों तरफ से लिया जाता है, उसी तरह पढ़ाई में पाठ्यक्रम और व्यावहारिक ज्ञान साथ-साथ बुनना चाहिए। अभी कुछ साल पहले तक ही स्कूलों में बागवानी, पाककला आदि अनिवार्य हुआ करते थे।

गांधी जी के समवाय में अपनी और अपने परिवेश की सफाई महत्वपूर्ण अंग रही है। सरकार बदलने के साथ पाठ्यक्रम बदलते रहे। इस बार की नई किताबों में तो बिजली का फ्यूज जोड़ने, शौचालय की सफाई जैसे विषयों पर पाठ हैं। विडंबना है कि जब ये बातें जीवन में अमली जामा पहनने लगती हैं, तो सरकार व समाज अजीब तरह की आपत्तियां दर्ज करने लगते हैं।

अब एयरपोर्ट व बड़े-बड़े मॉल्स में साफ-सफाई का ही काम देखें। वहां माहौल अच्छा है और वेतन भी ठीक-ठाक है, तो कई जाति-समाज के लोग वहां काम कर रहे हैं। इससे पहले जूते के काम के साथ भी यह हो चुका है। आज चमड़े के बड़े-बड़े कारखानों से लेकर कसबों में जूतों की दुकान तक पर कथित तौर पर उंची जाति के लोग आसानी से दिख जाएंगे।

लेदर डिजाइनिंग के बड़े-बड़े संस्थान बड़े-बड़े घर के लोगों को बड़ी-बड़ी फीस के साथ आकर्षित कर रहे हैं। जाहिर है कि जिस काम में धन आने लगता है, वही बाजार का चहेता बन जाता है, और फिर वहां कोई जाति-समाज का बंधन नहीं रहता है। वहां केवल एक ही विभाजन रहता है- गरीब और अमीर।

कुल मिलाकर, हाल की घटनाएं यह संदेश दे रही हैं कि हम अपने विकास की वैचारिक दिशा तय नहीं कर पा रहे हैं। कुछ मामलों को छोड़ दें,तो बाल-शोषण के नाम पर बच्चों की नैसर्गिक विकास के विरुद्ध काम हो रहा है। बचपन में इनसान की क्षमताएं अधिक होती हैं। वह उस दौर में बहुत कुछ सीख सकता है, जो उसके व देश के भविष्य के लिए सशक्त नींव हो सकता है।

यदि कोई बच्चा पढ़ने-लिखने के साथ-साथ स्कूल में ही चरखा चलाना सीख रहा है, बिजली की मोटर बांधने का प्रशिक्षण ले रहा है, तो इसमें क्या बुराई है? दो मत नहीं हैं कि बच्चे को खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने, घर-स्कूल में एक सहज व अच्छा माहौल मिलना चाहिए, लेकिन यदि इसके साथ अपने काम स्वयं करने की प्रेरणा भी हो, तो क्या बुराई है? किसी बच्चे के काम सीखने, उसकी काम करने की परिस्थितियां अनुकूल होने, उसका शोषण न होना सुनिश्चित करने में बहुत अंतर है। यदि कोई बच्चा खेल-खेल में जिंदगी को जीना सीख रहा है, तो उस पर ऐतराज नहीं होना चाहिए।
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