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विवेकानंद के अविवेकी उपासक

मृणाल पांडे

Updated Sat, 10 Nov 2012 10:19 PM IST
vivekananda unreasonable worshipers
स्वामी विवेकानंद और माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम का बुद्धिमाप (आई क्यू) एक-सा होने की बात कह कर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी जी इधर पर्याप्त अपयश बटोर चुके हैं। मजे की बात यह है कि ‘आई क्यू’ परीक्षण का विचार और उसे नापने का विश्वसनीय वैज्ञानिक पैमाना, ये दोनों विदेशी हैं और  स्वामी विवेकानंद के निधन वर्ष (1902) के बहुत बाद, 1939 में ईजाद किए गए।
पर ‘परमाणु बम और हवाई जहाज वगैरह तो हमारे आर्य पुरखों ने त्रेतायुग में ही बना लिए थे', मानने वाले गडकरी जी सरीखे भाजपा के अनेक त्रिकालदर्शी नेता अपना अलग विशुद्ध भारतीय इतिहास बोध और आई क्यू माप रखते हैं। उस देसी परंपरा के चिरंतन और तीन लोक से न्यारी होने का उनको इतना भरोसा है कि विगत, आगत और अनागत में भेद भी वह अकसर नहीं किया करते। गडकरी जी के विपरीत विवेकानंद ने मानव जाति के इतिहास और भारतीयता बोध को सिर्फ भारत के ही संदर्भ में नहीं, विश्व संदर्भ में परखा, समझा और समझाया है।

स्वामी विवेकानंद का समय भी ठीक आज की ही तरह पुराने और नए भारत का संधिकाल था। 1857 की क्रांति के दमन के बाद उनका गृह प्रदेश बंगाल का, जो अंगरेजों की पहली बस्ती था, कोलकाता शहर भाप से चलने वाले इंजन और कल कारखानों की मार्फत पश्चिम के नए विज्ञान और उत्पादन क्षमता को भारत में पहले-पहल लाया। इसी के साथ नए विज्ञान की शिक्षा भी वहां शुरू हुई।

मेधावी विवेकानंद ने इसका मोल तुरंत पहचाना और देसी परंपरा में जो कुछ पुराना और व्यर्थ सिद्ध हो गया है, उसे त्याग कर भारतीय आध्यात्मिक मूल्यों को पश्चिमी विज्ञान के सकारात्मक तत्वों से मिलाकर एक आधुनिक भारत बनाने पर लगातार सोचा, बोला और लिखा। आज, जबकि युवा भारत फिर विश्व के ज्ञान विज्ञान की थाती से लगातार जुड़ और बदल रहा है, विवेकानंद के चित्रों पर तमाम माल्यार्पण के बाद भी गडकरी और उनकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस नएपन या पश्चिम के प्रति उनकी जैसी उदार दृष्टि का परिचय नहीं दे रहे।

विवेकानंद के समय के नवजागरणकाल के दौरान हर संप्रदाय अपने सदियों पुराने कूपमंडूकपने को त्याग कर नए ज्ञान के सहारे बदलते युग में पूरी दुनिया के साथ कदमताल करने को पहली बार सिर उठा रहा था। उस समय के एक बड़े नेता सर सैयद अहमद खां, जो ईस्ट इंडिया कंपनी में ऊंचे पद पर थे, और 1857 के बाद ब्रिटिश सरकार में शामिल हुए, सदियों बाद मुसलिम समुदाय में भी नए विज्ञान और शिक्षा पद्धति को ले गए।

सर सैयद उर्दू शायरी को नई राह देने वाले प्रसिद्ध शायर असदुल्लाह खान ‘गालिब’ के भी समकालीन थे। जब उन्होंने मुसलमानों के प्राचीन गौरव पर लिखी अपनी एक किताब की भूमिका मिर्जा गालिब से लिखवानी चाही, तो गालिब ने उनसे कहा, सैयद साहिब, आप क्यों गुजरे जमाने में ही जीना चाहते हैं, इस सबसे मुसलमानों की तरक्की नहीं होगी।

जरा कलकत्ता जाइए और नई तालीम को समझिए (अंगरेजों से अपनी रुकी पेंशन निकलवाने के सिलसिले में गालिब खुद दो बरस नवजागरण से जगमगा रही उस ज्ञान नगरी में रह आए थे)। सैयद साहिब कवि की बात को शिरोधार्य कर कलकत्ता गए और वापस अलीगढ़ आकर उन्होंने विज्ञान की बेहतरीन तालीम के लिए मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज खोला, जो आज अलीगढ़ विवि कहलाता है।

यह दुखद है कि संघ परिवार और भाजपा के कुछ अति महत्वाकांक्षी नेता विवेकानंद के संपूर्ण दर्शन को समझने के बजाय उनको महज एक भगवाधारी हिंदू संन्यासी और धर्म प्रचारक के रूप में ही देखने पर आमादा हैं। एक उदारचेता और स्पष्टवादी सामाजिक और राजनीतिक चिंतक विवेकानंद न तो कोरे भौतिकतावादी थे, न ही आत्मा की साधना में लीन रहनेवाले साधक। यह सही है कि वह भारतीय अध्यात्म को सर्वश्रेष्ठ मानते थे, लेकिन उनका यह भी मानना था कि सबसे पहले समाज में हर तरह की सामाजिक आर्थिक विषमता मिटनी चाहिए, क्योंकि भूखे मनुष्य के लिए किसी धर्म का कोई मतलब नहीं होता। उनकी लड़ाई ईसाई धर्म से भी नहीं थी, बल्कि साम्राज्यवादी लूट के लिए किए जा रहे उस धर्म की गलत व्याख्या और दुरुपयोग से थी।

विवेकानंद देख सकते थे कि हिंदुओं की अजर-अमर संस्कृति की दुनिया की भी सीमाएं हैं। गालिब की ही तरह वह भी ज्ञानचक्षुओं से देख पा रहे थे कि नए भारत के निर्माण के लिए पश्चिमी ज्ञान के इस्पात का इस्तेमाल भी कितना जरूरी है। इसलिए उनकी भी सलाह थी कि अतीतगामी परंपरा में ही कैद रहने के बजाय नई शिक्षा से जुड़ना जड़हीन बनना नहीं, एक सामयिक, स्वस्थ और व्यावहारिक कदम होगा।

भारत की दुर्दशा की वजहों पर विवेकानंद की दो टूक राय थी कि पहले तो निष्क्रिय रहकर हम पुराने गौरव के घमंड में कैद रह गए, फिर विदेशी आक्रांता से हार खाकर हीन भावना से आक्रांत हुए और अंतत: शेष दुनिया से खुद को काटकर घोंघा बसंत बन बैठे। क्या समझदार (यानी जो नियमित रूप से अखबार पढ़ते और मित्रों के साथ उदार सहचिंतन करते हों) लोगों को गडकरी और उनकी मातृ संस्था का नजरिया 1857 के आसपास के हिंदुत्ववादियों से बहुत भिन्न नजर आता है?

गडकरी जी और संघ सांस्कृतिक हिंदुत्व की पुरानी खोहों और भाजपा की निरंतर बैकसीट ड्राइविंग करने की जिद से उबर कर यदि सचमुच बाहरी विश्व को देख पाते, तो उनको लगता कि इतिहास ने कांग्रेस की दुर्बलता के क्षणों में उनको सत्ता में एक मजबूत नया दक्षिणपंथी विकल्प बनने के मौके जाने कितनी बार दिए, जो उन्होंने लगातार फिल्मी गाने गाते, चुटकुले सुनाते गंवा दिए।

सारा हिंदू धर्म झोंककर भी तो वह उत्तर प्रदेश में नहीं जीत सके, न ही संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित कराकर जनता के बीच एक सकारात्मक और गंभीर विपक्ष की पहचान कायम करा पाए। और अब शर्मनाक अपवादों  के लंबे-चौड़े खाते में विवेकानंद बनाम दाऊद वाले कथन की एंट्री कहां की जाए?

वह दाऊद की गहरी कुबुद्धि की चर्चा करें, तो भी और विवेकानंद की सुबुद्धि की चर्चा करें, तो भी लोग दामन में मुंह देकर हंसते जाएंगे, और एक नेता के करियर के लिए राजनीति में भ्रष्टाचारी या एकाधिकारवादी कहलाना तब भी उतना सांघातिक नहीं साबित होता, जितना कि एक भदेस लतीफा बन जाना। पश्चिम के जाने-माने विदूषक ग्राउचो मार्क्स ने एक बार कहा भी था कि अगर कोई क्लब मुझ सरीखे व्यक्ति को सदस्य बना सकता है, तो निश्चय ही वह क्लब सदस्यता के लिए आवेदन करने लायक नहीं!
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