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अंधेरे में हिंसा की बिजली

Ashok Kumar

Ashok Kumar

Updated Sat, 24 Nov 2012 10:57 PM IST
violence in darkness
साल लगभग समाप्ति पर है। लेकिन सूचना क्रांति की मदद से अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में उठी नई आवाजों पर मन उत्साहित नहीं। वजह यह, कि वह राष्ट्र स्तरीय ऊर्जा अभी कहीं नजर नहीं आती, जो इस दमदार अभिव्यक्ति क्षमता को देश के गुमनाम और खामोश मर्म से जोड़कर अंधेरे को शक्ल और वाणी दे दे।
सतह की चौकसी करते मीडियाकारों में से कोई इससे इनकार नहीं कर सकता कि देश इन दिनों घनीभूत निराशा के अंधेरों से भरसक जूझ रहा है। पर सिर्फ तभी कुछ क्षणों के लिए हमको भारतीय लोकतंत्र के भीतर छिपे वे कई खौफनाक, बीहड़ गुफाएं और खतरनाक ज्वालामुखी अचानक नजर आती हैं, जब कहीं हिंसा की बिजली कड़क कर गिर जाती है।

दिल्ली के एक फार्म हाउस में गए सप्ताह जब यकायक ताबड़तोड़ गोलियां चलीं और सुरक्षाकर्मियों से घिरे दो बेहद ताकतवर लोग रहस्यमय तरीके से एक साथ मारे गए। हिंसा की उस क्षणिक कौंध में तमाम देश ने देखा कि तथाकथित संयुक्त परिवारों की एकजुटता के पीछे कितना राग द्वेष भी छिपा हो सकता है।

यह भी, कि शिखर संपन्नता और हथियारबंद सुरक्षा से लैस लोगों की तादाद इधर शायद इतनी ज्यादा हो चली है कि उनको परस्पर मुठभेड़ों में मारे जाने से बचाने में सरकारी सशस्त्र बल ही नहीं, उनके अपने सुरक्षा गार्ड भी विफल हो गए हैं।

देश के अलग-अलग राज्यों में सत्ता संभाले विभिन्न दलों की सरकारों, उनके प्रशासकीय कर्मचारियों तथा उनकी पुलिस को एकाधिक कोणों से बड़े उद्यमियों से जुड़े हिंसामूलक भ्रष्टाचार और गैरकानूनी गतिविधियों की रपटों को हिकारत से अनदेखा करते रहने का अभ्यस्त होना भी इस घटना के ब्योरों ने लगातार हमको दिखाया है। अब सर्वोच्च न्यायालय भी पूछ रहा है कि आखिर इतने सशस्त्र सुरक्षाकर्मी आवंटित किस आधार पर किए जा रहे हैं।

अखबारों के अनुसार, जिस फार्म हाउस में यह वारदात हुई, वहां जबरिया घुसपैठ के प्रयास के दौरान पड़ोसियों द्वारा हिंसा की आशंका की पुलिस को खबर दे दी गई थी। फिर भी पुलिस की गश्ती जिप्सी बस एक दस्तूरी चक्कर काटकर लौट गई और कहा गया कि स्थिति ठीक-ठाक है। मामला बड़े लोगों और उनके सुरक्षा दस्तों का जो था।

इसके बाद वही हुआ, जिसका डर था। दो पक्षों के बीच पहले कहासुनी हुई, फिर जमकर गोलियां चलीं और दो लाशें गिर गईं। पहले बताया गया कि प्राथमिकी दर्ज कराने वाले सज्जन गैरहाजिर हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्राथमिकी में नाम आने के बाद उत्तराखंड की पूर्ववर्ती सरकार द्वारा उनको ससम्मान दिए गए अल्पसंख्यक आयोग के मुखिया के पद से न सिर्फ मुक्त कर दिया गया है, बल्कि उनकी गिरफ्तारी भी हुई है।

उजागर हुआ कि इतने संवेदनशील पद पर आरूढ़ व्यक्ति पर पहले से खुली पुलिस डॉसियर में एक नहीं, छह मामले दर्ज थे। हैरतअंगेज़ बातों का सिलसिला नहीं थमता। यह भी सत्यापित हुआ कि मारे जाने वाले दोनों व्यक्तियों के साथ न सिर्फ उच्चपदस्थ सरकारी जन घटनास्थल पर उपस्थित थे, बल्कि उनके साथ चल रहे दस्ते में सरकारी स्रोतों से उनको निजी सुरक्षा के लिए मुहैया करवाए गए एकाधिक सशस्त्र सुरक्षाकर्मी भी शामिल थे।

वारदात में इस्तेमाल हथियारों को लेकर उजागर ब्योरे भी चौंकाते हैं। मृतकों के शरीर से निकली गोलियां दिखा रही हैं कि मारामारी में एके 47 के अलावा चार अन्य तरह के आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल किया गया था। अब तक बरामद हथियारों के लाइसेंस एकाधिक राज्यों से जारी हुए थे। मृतकों में से एक हथियार इस्तेमाल करने में अक्षम होने के बावजूद लाइसेंसी हथियारों के मालिक बताए जाते हैं, जबकि कानूनन डॉक्टरी जांच में सक्षम न पाए गए व्यक्ति को पिस्तौल का लाइसेंस नहीं दिया जाना चाहिए।

इन खबरों के जारी होने के बाद अब ऐसे लोगों की बाढ़ आ गई है, जो कह रहे हैं कि दोष अमुक या तमुक का था। सचाई यह है कि दोष किसी एक का नहीं। जैसा अभी हाल में कम से कम आधा दर्जन खुलासों से सत्यापित हो चुका है कि दोष असल में यह है कि आबकारी महकमे से लेकर भूमि खुदाई या सार्वजनिक निर्माण या बाल पोषाहार बांटने तक का सरकारी काम कागजों पर एक तरह से निष्पादित किया जाता है और जमीन पर दूसरी तरह से।

योजनाकार वर्षों तक शोध कर ईमानदारी से तथ्य जुटाते हैं, जनहित योजनाएं बनती हैं और राज्यों को भेजी जाती हैं। यहां तक काम कागजों पर होता है। पर जहां उनका भीतरी भारत में लागू किया जाना शुरू होता है, उस बिंदु से पटकथा में ठेकेदारों और दलालों का प्रवेश होने लगता है, जो भारतीय लोकतंत्र के मर्म को कैद कर उसके एकमात्र अधिकृत किराना मर्चेंट बन गए हैं। एक बार अंधेरों में खुद जाकर ठोकर खाने के अनिच्छुक सरकारी महकमों तथा अंधेरे के ठेकेदारों ने समझ लिया कि मामला क्या है, तो क्षेत्रीय सरकार से कहकर नक्शे में केंद्र को अज्ञानी बताकर स्थानीय जरूरतों के बहाने सुविधानुसार इतने फेरबदल किए जाने लगते हैं कि योजना का मूल स्वरूप और लाभार्थियों की शक्ल ही मिट जाती है।

लाभार्थी इस बात के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि वे नाम-पता लेकर बैठे रहते हैं, और जब माल-मत्ता आया, तो सीधे ठेकेदारों से संपर्क कर उनकी शर्तों के अनुसार एकदम न पाने के बजाय कुछ ही पा जाने में कोई बुराई नहीं देखते। इस तरह अंधेरी दुनिया का एक स्याह समांतर प्रशासन बन जाता है, जिसका अपना आबकारी निरीक्षकों का दस्ता, अपना खुदाई मजूरों का मस्टर रोल और अपना सुरक्षा तंत्र होता है। उसके अपने कार्यनिर्वहन और सरकारी कम्प्लीशन सर्टिफिकेट पाने के कायदे होते हैं। इस तंत्र से पग-पग पर पर सरकारी तंत्र के छोटे-बड़े नुमाइंदे भी बिना मेहनत लाभान्वित होते जाते हैं।

अंधेरी दुनिया के बाशिंदों की गहरी एकजुटता इस तंत्र के स्थायित्व की गारंटी बन गई है। इस परिदृश्य पर इतिहास के नियमों के तहत भस्मासुर पैदा हों, तब बिजली गिरती है और एक सरकारी सुरक्षा प्राप्त सुरक्षा चक्र दूसरे उतने ही ताकतवर तथा खुर्राट सुरक्षा चक्र से टकराने लगता है। फिर भूकंप आता है और पूरे भूखंड की शक्ल बदल देता है। जब तक सतह और भीतरी दुनिया के बीच अंधकार के साये नहीं मिटते, चुनाव में केजरीवाल उतरें या बाबा रामदेव, दशा नहीं बदलनेवाली। अच्छा है कि कम से कम हमारी न्यायपालिका वह सवाल पूछ रही है, जिसे विधायिका या कार्यपालिका को पूछते रहना चाहिए था।
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