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वैकल्पिक राजनीति के अनिश्चित मोड़

मृणाल पाण्डे

Updated Thu, 06 Sep 2012 06:05 PM IST
unsure of alternative political twist
अन्ना और रामदेव तथा उनके समर्थकों के कूच कर जाने के बाद भी राजधानी में स्वतंत्रता दिवस पर देश में वर्तमान सरकार की क्षमता और मनोबल को लेकर गहरी छातीपीट निराशा के दर्शन हो रहे हैं। अधिकतर समीक्षक मान बैठे हैं कि अगले आम चुनाव तक मौजूदा कांग्रेस नीत सरकार का जनाधार संकीर्ण होता जाएगा और 2014 में संप्रग की सत्ता में वापसी नामुमकिन है। पर वे यह सचाई भी समझ रहे हैं कि जनता की नाराजगी के बावजूद नाना वजहों से कांग्रेस के बरक्स कोई बड़ा दल राष्ट्रीय राजनीति में वैकल्पिक धुरी बनकर नहीं उभर पा रहा है।
भारत की राजनीति में तीन वैचारिक ध्रुव रहे हैं : वाम, दक्षिण और मध्यमार्गी। आम मतदाता को वाम दल सत्ता पाने की लंबी बाधा रेस के लिए बेदम नजर आता है। उसके जनाधार तो पहले ही केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल तक सिमट चुके थे, आज वहां से भी लगभग बेदखल होकर वह कोई मजबूत राष्ट्रीय विकल्प नहीं बना सकता।

दूसरा विकल्प दक्षिणपंथ का है। लेकिन अभी तक तो राष्ट्रीय फलक पर वामपंथियों से काफी आगे होने पर भी भाजपा एक सर्वस्वीकार्य नेतृत्व और राजग के सहयोगी दलों के समर्थन को 2014 तक अक्षुण्ण रख सकने की कठोर कसौटियों पर खरी नहीं उतर पा रही है। लिहाजा मतदाता कांग्रेस से नाराजगी के बावजूद आज सिर्फ विपक्ष की बड़बोली सफाई घोषणाओं, उनकी नाना बी टीमों के सद्भावना उपवासों या संघ परिवार के मंचों पर सहयोगी दलों की मौजूदगी भर से आश्वस्त नहीं होता। उसकी असहजता तब और बढ़ जाती है, जब कोई गैरकांग्रेसी मोरचा मंच पर उभरता दिखे, पर उसके गैरभाजपा समर्थक क्षेत्रीय नेता अपनी राजधानी पहुंचते ही ‘बाइट’ दे दें कि उनकी मैत्री के ताजा इजहार को भाजपा के दलीय दर्शन के शर्तहीन समर्थन की घोषणा कतई न समझा जाए।

इस बिंदु पर सोचना रोचक रहेगा कि भारत में गैरकांग्रेसी विकल्प जब कभी उपजे हैं, तो किन परिस्थितियों में? उसके बाद किस मोड़ पर कौन तत्व नई सरकार के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद वैकल्पिक सरकार की जड़ों में मट्ठा डालने लगते हैं। और कांग्रेस की वापसी की राह प्रशस्त हो जाती है?

इतिहास गवाह है कि जब-जब भारतीय राजनीति में कांग्रेस या कांग्रेस नीत गठजोड़ में कांग्रेसी धुरी की ग्लानि हुई और सत्ता के मद में चूर नेताओं की तादाद बढ़ी, तो दलगत राजनीति से बाहर कुछ सफेद बालों वाले गंभीर सर्वस्व त्यागी महात्मा तथा दलगत राजनीति से कुछ अपेक्षया कम सफेद बालों वाले अगंभीर किरदार बाहर निकल कर गैरकांग्रेसवाद को हवा देने लगते हैं। पहले चरण में गंभीर और करुणामय सफेद बालों वाले महात्माई नेता अवसाद और आक्रोश से भरे आम लोगों के बीच गांधीवादी क्रांति का नारा बुलंद कर राष्ट्रीय मर्म को छूते हैं, और रामलीला मैदान व जंतर-मंतर देखते-देखते परिवर्तनकामी भीड़ से भरने लगते हैं। गैरकांग्रेसवाद और नेता जी की लोकप्रियता साबित हो गई, तो दूसरा चरण आता है। इस दौरान वृद्ध नेता की निजी दधीचि छवि का पूरा फायदा उठाया जाता है। उनके नाम पर विपक्षी राजनेता तथा कुछ राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाले नए लोग अटपटे किंतु आकर्षक प्रतीकों के सहारे नए गुट की ब्रांडिंग कर वैकल्पिक सरकार के नाम पर मतदाताओं का समर्थन जुटाने में सफल होते हैं।

तीसरा चरण चुनाव में जननायक के हाड़ों से गढ़े गए वज्र से दुष्टात्मा कांग्रेस का सफलता से सदलबल हनन कर उसका प्रांतवार सूपड़ा साफ करने की उत्सवधर्मी घड़ी लाता है, जिसके बाद विजयी दल अकसर बापू की समाधि पर जाकर उत्साह से पगलाए लोगों के सामने जनम-जनम साथ रहने का सुखद ऐलान करते हैं। इस घड़ी कांग्रेस को लंबे वनवास पर भेजने के लिए गैरकांग्रेसियों की वैचारिक एकजुटता दिखाना भी बड़ा जरूरी बनता है। इसलिए लोहिया जी से अटल जी के वक्त तक शपथ खाते ही राजनीति के अहि मयूर मृग बाघ सबने रातोंरात भले बच्चे बनकर एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाते हुए कहा है कि तपोपूत नेता जी अब इस गठजोड़ का नैतिक मार्गदर्शन करेंगे। लेकिन हा हंत! ’67 में, ’87 में या ’97 में इस बिंदु पर आकर यह सुविधावादी दर्शन देश को सच्चा वैकल्पिक नेतृत्व देने और राजनीति का स्थायी कायाकल्प करने के बजाय सरकार के लिए फूटपरस्त क्षय पैदा करने वाला ही साबित हुआ है। और अंतत: कुछेक साल पहले दुत्कारी गई कांग्रेस ही सत्ता में वापस आ जाती रही है। क्या इससे हम निष्कर्ष निकालें कि भारतीय जनता का मनपंछी घूम-फिरकर मध्यमार्गी राजनीति के ही जहाज पर वापस आना पसंद करता है। और उसका कांग्रेसियत के खिलाफ गुस्सा हिंदी फिल्मों के मां और बेटे की अस्थायी अनबन ही साबित होता है।

इस फिल्म का अंत बदलना हो, तो गंभीर विरोधी दलों तथा मतदाताओं को बाहरखाने एक अदद महात्मा की आदर्शवादी कसमें खाने के बावजूद ठोस राजनीतिक जमीन पर संकीर्ण क्षेत्रीय/जातीय हितों पर केंद्रित रहने वाले दोमुंहेपन और सतत चुनावी लहरापेक्षी, संस्थाविमुख और अड़ियल बने रहने की आदत से मुक्ति पानी होगी।

दूसरे, उनको मानना होगा कि आज आबादी में विभिन्न संप्रदायों की आबादी का जो अनुपात है, उसके मद्देनजर देश में देशभक्ति की सच्ची बुनियाद के रूप में किसी दक्षिणपंथी धुरी वाले गठजोड़ की टिकाऊ राष्ट्रीय स्वीकार्यता नहीं बनाई जा सकेगी। यह भले अस्पष्ट हो कि गैरहिंदू धार्मिकता किन शर्तों पर राष्ट्रवादी धारा का हिस्सा बनने को राजी होगी, पर यह तय है कि उस तरह का कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद गैरहिंदू आबादी को स्वीकार नहीं होगा, जिसके दर्शन रामदेव के भाषणों में हुए और जिन्हें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के दावे को लेकर राजग की तरफ से मिले नरो वा कुंजरो वा वाले बयानों ने और उलझा दिया है।

कांग्रेस को भी बड़े कायाकल्प की ज़रूरत है। शायद यह बात उसके हर अक्लमंद नेता को पता है कि सिर्फ हाईकमान का गरिमामय व्यवहार उसके अनेक नेताओं के स्याह किए-धरे को 2014 में मतदाता के आगे उजला नहीं बना सकता। और न ही सरकार का भावहीन चेहरा लीलाओं और जोशीले फिल्मी डायलॉग पर लोट होने वाली मनोरंजन पसंद युवा जनता को उसके प्रचार मंच तक खींच पायेगा। पर सौ टके का सवाल यह कि क्या वे आत्मशुद्धि की किसी नई पहल पर सोच रहे हैं?
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