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टेढ़ी गतियों को पकड़ने की कोशिश

हरि मृदुल

Updated Thu, 06 Sep 2012 06:35 PM IST
Try to catch crooked motions
जीवन के दैनंदिन अनुभवों से निकली कविताओं की जैसी तासीर होती है, वैसी ही सुपरिचित कवि प्रमोद कुमार की रचनाओं में है। उनकी कविताएं दूर की कौड़ी लाने की कोई कोशिश नहीं करती हैं, बल्कि वे अपने आसपास की विषम स्थितियों और उनके कारक तत्वों को बड़ी बारीकी से इंगित करती हैं। यही प्रमोद की कविताओं की ताकत भी है। चूंकि उन्होंने एक खाद कारखाने में सामान्य कर्मचारी की तरह ही काम किया है, इसलिए उनके पास बाजार के षडयंत्र और निम्नवर्ग के संघर्ष की प्रामाणिक तस्वीरें हैं। एक तरफ वे अपनी कविताओं में छंटनीग्रस्त मजदूर का आर्तनाद दर्ज करते हैं, तो दूसरी तरफ सांप्रदायिक स्थितियों पर प्रहार भी करते हैं। वे दुख से घबराते नहीं, बल्कि ताकत लेते दिखते हैं। उनकी ज्यादातर कविताएं जिंदगी की महिमा का बखान करती हैं और आने वाले कल के सुंदर होने का भरोसा रखती हैं —
यह धरती देती है
तुम्हारे लिए फूल
हम इसे दरकने नहीं देंगे
संसार होगा कल और हरा भरा
कल तुम होगी मेरे और करीब
जीवन के प्रति ऐसी आस्था तभी होती है, जब निराशावादी सोच के लिए कोई जगह न हो। लेकिन तमाम विषम परिस्थितियों के बीच निराशा को झटकना आसान नहीं है, इसके लिए एक चेतना की जरूरत होती है। इसमें दो राय नहीं कि यह चेतना कवि में कूट कूट कर भरी है। इस ढलान पर शीर्षक कविता में वे कहते हैं—
आओ एक स्वर में गाएं
जीवन के गीत
जोड़ लें सभी नावें एक साथ
छोटी कर दें ढलान को

सामुदायिकता की भावना का ऐसा बखान आज के नितांत व्यक्तिवादी दौर में दुर्लभ है। गौर करने वाली बात यह भी है कि प्रमोद कुमार ने सिर्फ जीवन की जटिलताओं को ही अभिव्यक्ति नहीं दी है, उनके पास प्रेम और प्रकृति की बहुरंगी छटाओं की भी कई कविताएं हैं। तुमसे देखा, करवाचौथ, सिल लोढ़े पर और किताब में फूल जैसी कविताएं प्रेम में पगी हैं, तो बसंत की ऊर्जा में, नदी का नाम, छिटक छिटक पहुंची बूंदें और उगाना नहीं छोड़ेगी वर्षा -में प्रकृति से कवि का तादात्म्य दिखता है। छंटनीग्रस्त मजदूर का बयान, हां, हां, हाथी, चेहरे से दंगा और उम्मीदवार संग्रह की बेहतरीन कविताएं हैं। हालांकि शिल्प के स्तर पर कवि की कुछ सीमाएं भी हैं। उनकी कई कविताओं की सीमा यह है कि वे मितभाषी नहीं हैं। ज्यादा कहने के चक्कर में बहुत सी काव्यपंक्तियां आपस में ही उलझ जाती हैं। हां, उनकी कहने की सादगी प्रभावित करती है। हमारे समय के बड़े कवि राजेश जोशी ने उनकी कविताओं के बारे में ठीक ही लिखा है— ये अपने कथन से ज्यादा अभिप्रायों में बोलने वाली कविताएं हैं। इन्हें सावधानी से पढ़ने की जरूरत है, क्योंकि ये हमारे समय की टेढ़ी गतियों को पढ़ने की कोशिश कर रही हैं।
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