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सचाई सामने आनी चाहिए

प्रमोद जोशी

Updated Thu, 22 Nov 2012 11:13 PM IST
truth should be open
मिस्टर सीएजी, कहां हैं एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ रुपये? सूचना-प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी के इस सवाल के पीछे सरकार की हताशा छिपी है। सरकार की समझ है कि सीएजी ने ही 2जी का झमेला खड़ा किया है। यानी 2 जी नीलामी में हुई फजीहत के जिम्मेदार सीएजी हैं। दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल को लगता है कि ट्राई ने नीलामी के लिए जो रिजर्व कीमत रखी, वह ज्यादा थी। उनके अनुसार नीतिगत मामलों में सरकार को फैसले लेने की आजादी होनी चाहिए।
कपिल सिब्बल की बात जायज है। पर सीएजी सांविधानिक संस्था है। उसकी आपत्ति केवल राजस्व तक सीमित नहीं थी। अब नीलामी में तकरीबन उतनी ही रकम मिलेगी, जितनी ए राजा ने हासिल की थी। इतने से क्या राजा सही साबित हो जाते हैं? सवाल दूसरे हैं, जिनसे मुंह मोड़ने का मतलब है, राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करना। वर्ष 2007 या 2008 में नीलामी हुई होती, तो क्या उतनी ही कीमत मिलती, जितनी अब मिल रही है? यह भी कि सीएजी 1.76 लाख करोड़ के फैसले पर कैसे पहुंचे? यह सवाल भी है कि प्राकृतिक संपदा का व्यावसायिक दोहन सरकार और उपभोक्ता के हित में किस तरीके से किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पहले भी कहा है कि नीलामी अनिवार्य नहीं है। दूसरे तरीकों का इस्तेमाल भी होना चाहिए।

देश में पहली जेनरेशन के मोबाइल फोन की शुरुआत करते समय सरकार को यह सुनिश्चित करना था कि उसे लोकप्रिय बनाने के लिए सस्ता भी रखना होगा। ऐसा न होता, तो भारत में टेलीफोन क्रांति न हो पाती, जो अंततः गरीबों की मददगार साबित हुई। सामान्य नागरिक को मोबाइल फोन तो समझ में आता है, पर स्पेक्ट्रम, उसकी नीलामी और 2 जी, 3 जी शब्द भ्रम पैदा करते हैं। सरकारी तौर पर यह समझाने की व्यवस्था भी नहीं है। स्पेक्ट्रम शब्द ऐसी वस्तु या प्रक्रिया को बताता है, जिसमें विविधता हो। संचार की भाषा में इसका मतलब है वेवलेंग्थ या फ्रीक्वेंसी।

फ्रीक्वेंसी आवंटन माने अलग-अलग वेवलेंग्थ पर संकेत प्रसारित करने की अनुमति। 2 जी और 3 जी वगैरह तकनीकों के नाम हैं। वर्ष 1979 में जब टोक्यो में पहली बार मोबाइल फोन कॉल की गई, तो वह तकनीक पहली जेनेरेशन की तकनीक थी। भारत में 1995 में शुरू किए गए पहले मोबाइल फोन इसी 1जी तकनीक पर आधारित थे, बावजूद इसके कि 1991 में फिनलैंड में 2 जी तकनीक का जन्म हो चुका था। 1 जी एनालॉग रेडियो सिग्नल पर आधारित होते हैं और 2 जी डिजिटल सिग्नल पर। तकनीक के डिजिटल होने पर ध्वनि के साथ कई प्रकार के प्रयोग हो सकते हैं। साथ ही, इसमें फोटोग्राफ, वीडियो, संगीत वगैरह का आदान-प्रदान तेज गति से संभव है।

2 जी से 3 जी, 4 जी और 5 जी की ओर तकनीक बढ़ रही है। इससे एक ओर फोन का आकार छोटा हो रहा है, दूसरी ओर उसमें हाई स्पीड इंटरनेट प्राण फूंक रहा है। कई प्रकार के मनोरंजन के साधन भी उसमें जमा हो गए हैं, जो अमीरों की मौज के लिए हैं। पर अंततः यह तकनीक शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार-संवाद, लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक सेवाओं और काम-काज के तरीकों में बुनियादी बदलाव लाएगी।

हाल में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आकाश टैबलेट का विकसित वर्जन जारी किया है। इन उपकरणों का इस्तेमाल करने के लिए हमें सस्ती दरों पर हाई स्पीड ब्रॉडबैंड की जरूरत भी होगी। यह संयोग नहीं है कि स्कैंडिनेविया के स्वीडन और नॉर्वे जैसे देश अपने नागरिकों को इतनी सस्ती और इतनी हाई स्पीड ब्रॉडबैंड सेवा उपलब्ध कराते हैं कि हम उसकी कल्पना नहीं कर सकते। इस लिहाज से स्पेक्ट्रम की नीलामी को केवल व्यावसायिक कर्म नहीं माना जा सकता।

पेट्रोलियम सबसिडी की तरह यह सुविधा भी सामाजिक लिहाज से उपयोगी है। इसीलिए हम बच्चों को सस्ते टैबलेट देना चाहते हैं। इसमें व्यवसाय भी है, इसलिए हर सरकार के सामने होम करते हाथ जलने का खतरा है। यह तकनीक लगातार विकसित होती जाएगी। कोलकाता और बेंगलुरु में 4 जी तकनीक लांच होने के साथ भारत दुनिया के चुनींदा देशों में शामिल हो गया है। हमारे चारों ओर साइबर क्रांति हो रही है, जिसे रोका नहीं जा सकता, और गरीबी से जूझते भारत की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। इस काम में इस तकनीक की मदद तो ली जा सकती है।

मोबाइल फोन सेवाओं के आने वाले व्यावसायिक आवंटन नीलामी से हो रहे हैं। धीरे-धीरे नई सेवाएं देश भर में फैल रही हैं। मोबाइल टेलीफोन के समानांतर फाइबर ऑप्टिक तकनीक से घरों को जोड़ने का काम भी होना है। ये काम व्यावसायिक हैं और उसके झमेले हैं। पर 2 जी नीलामी के पेचो-खम को समझना चाहिए। वर्ष 2008 में ए राजा ने 122 लाइसेंस 920 करोड़ रुपये में जारी किए थे, जबकि इस बार 22 लाइसेंसों में उससे ज्यादा रकम हासिल हो गई। इस वक्त हमारी अर्थव्यवस्था की जो स्थिति है, उसके मुकाबले 2008 के जनवरी में स्थितियां कहीं बेहतर थीं।

इस बार 14,000 करोड़ रुपये का जो बेस प्राइस रखा गया, उसमें दिल्ली, मुंबई और कर्नाटक की कीमत करीब 48 फीसदी थी। इन तीन सर्किलों में ही बिड नहीं हुईं। लगता है, इन तीन सर्किलों की कीमत ज्यादा रखी गई थी। और यह भी कि देश के टेलीफोन उद्योग ने कार्टेल बनाकर इसे विफल किया है। सीएजी ने नुकसान का जो अनुमान लगाया था, वह चार प्रकार का था, 57 करोड़, 67 करोड़, 69 करोड़ और 1.76 लाख करोड़। यह भी सच है कि ए राजा ने जो राजस्व एकत्र किया, उससे करीब डेढ़ गुना सिर्फ एक कंपनी एस-टेल उस वक्त देने को तैयार थी। एक नीलामी के फेल हो जाने मात्र से यह नहीं मान लेना चाहिए कि 2 जी घोटाला था ही नहीं। उसे सामने आने दीजिए।
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