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उनकी आवाज क्यों नहीं सुनी जाती

गिरिराज किशोर

Updated Fri, 28 Dec 2012 12:34 AM IST
their voice is not heard
यह 1964 के आसपास की बात है। इलाहाबाद में दो लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ था। उन दिनों अमूमन ऐसी घटनाएं कम ही होती थीं। मैं तब इलाहाबाद में था। दिनभर कॉफी हाउस में गुजरता था। उस घटना पर मैंने एक कहानी रेप लिखी थी। कॉफी हाउस में उस घटना को हर वर्ग ने अपनी तरह से लिया था। लेखकों के एक वर्ग ने कहा, ‘शहर में एक इंटलैक्चुअल घटना घटी है। उसी पर इंटलैक्चुअल डिस्कशन हो रहा है।'
यह व्यंग्य एक विधायक के इस प्रस्ताव के नहले पर दहला था कि एसएसपी का फौरन तबादला कर दिया जाए। दरअसल उस एसएसपी ने उसकी अच्छी तरह ठुकाई करा दी थी। वह चाहता था कि शहर के बुद्धिजीवी उसके तबादले की मांग करें। क्या ऐसी घटनाएं महज इंटलैक्चुअल घटना कहकर टाली जा सकती हैं या किसी अधिकारी के विरुद्ध खुन्नस निकालने के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं।

समाज कई बार ऐसी घटनाओं को बतफरोशी के बतौर इस्तेमाल करता है। क्या ये छोटे-मोटे राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग में लाई जा सकती हैं? 48 वर्ष पहले भी इस तरह की घटनाएं चर्चाओं के लिए इस्तेमाल की जाती थीं। अब उनका इस्तेमाल नारेबाजी और राजनीति के लिए हो रहा है। ऐसी घटनाएं हमें शर्मसार कर देती हैं। शोर तो बहुत मचाया जाता है, समाधान की बात नहीं की जाती। बलात्कारियों और शासन के बीच ऐसे मामलों को लेकर सीज फायर की तरह की बेचैन चुप्पी क्यों है? यह सवाल न सरकारों से कोई पूछता है और न स्थानीय प्रशासन से।

बलात्कार की घटनाएं पागलपन की तरह बढ़ रही हैं। न तो बीमारी मानकर इसका इलाज किया जा रहा है और न ही उसे हत्या जैसे जुर्म की रदीफ में रखा जा रहा है। बलात्कार शारीरिक तौर पर हत्या भले न हो, लेकिन यह मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से पीड़ित को विकलांग जरूर कर देता है। दुर्भाग्य से समाज भी उन्हीं को दोषी समझकर उनकी उपेक्षा करता है और उनका खामोश बहिष्कार कर देता है।

वही समाज, जो आंदोलन करता है या मंचों पर अन्याय मानकर उसके खिलाफ आवाज उठाता है, उसके मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों में  न घुसकर लीपापोती करके चुप हो जाता है। सत्ता के अलंबरदार सदनों में शोर मचाकर, इसे रोकने के लिए अस्थायी उपाय घोषित करके सो जाते हैं। क्या लड़कियां और उनकी जान व इज्जत लालबत्ती लगी गाड़ियों में, अंगरक्षकों के संरक्षण में घूमने वाले सत्ताधरियों से कम है? महिला सांसद संसद में बलात्कारियों को फांसी देने की गुहार तो लगाती हैं, पर इस वीभत्सता को रोकने और स्थायी समाधान निकालने की मांग नहीं करतीं, क्यों? फांसी हल नहीं, दबाव में ली जाने वाली फौरी सोच है। जरूरत इस अपराध पर पूरी तरह अंकुश लगाने की है।
 
आज स्थितियां यह हो गई हैं कि जब बच्चियां घर से बाहर जाती हैं, तो औरतें मनौतियां मांगती रहती हैं कि वे सही-सलामत घर लौट आएं। सही मायने में कोई मां-बाप अपनी बेटियों को लेकर निशंक नहीं। कई बार लगता है कि राजस्थान में जन्म लेते ही बेटियों को मार देने की प्रथा कहीं ऐसी ही आशंकाओं की देन तो नहीं थी। उन दिनों आक्रमणकारी या सरहदों के पार से आने वाले आतंकी लड़कियों को उठाकर ले जाते थे। यह आशंका धीरे-धीरे नकारात्मक परंपरा बनती गई। तब शायद कमजोर के पास मुक्ति के ऐसे ही रास्ते बचते थे। सती होने के पीछे भी इसी तरह की आशंकाएं रही होंगी।

जब राजा लोग हार जाते थे, तो विजेता सबसे पहले रानियों का हरण करता था। स्त्रियां शक्ति, दबंगई, सत्ता का सबसे अधिक शिकार होती हैं। अब बलात्कार की ये घटनाएं हमारी बहू-बेटियों में कमोबोश उसी तरह की असुरक्षा की भावना भर रही हैं। अनेक बच्चियां छेड़छाड़ से तंग आकर आत्महत्या कर लेती हैं, उनका जिम्मेदार कौन है? आम जनता की बेबसी ऐसी है कि उनकी रपट तक पुलिस थानों में नहीं लिखी जातीं। आज लड़कियों के साथ जो कुछ हो रहा है, उससे कम दारुण और पीड़ाजनक कुछ भी नहीं।

16 दिसंबर की घटना के विरोध में दिल्ली में 20-22 दिसंबर को हुए भीषण प्रदर्शन के बाद मैं फेसबुक पर एक नोट देख रहा था कि उस आंदोलन में दो तत्व प्रमुख थे। एक आंदोलनकारियों को अपने-अपने झंडे के नीचे लाने के लिए लोग वहां पर भी प्रयत्नशील थे। इससे पता चलता है कि उद्देश्य से राजनतिक लिप्सा अधिक सक्रिय थी। दूसरी बात, लड़कियां तक मीडिया के लोगों से यह कहती हुई देखी गईं कि पानी की बौछार के समय मेरा फोटो खींचिए, देखो कैसे अखबार बिकते हैं। यह कई ऐसी बातों की ओर संकेत करते हैं, जो ऐसी घटनाओं की कारक भी हो सकती हैं।

बलात्कार से सिर्फ दिल्ली ही पीड़ित नहीं, बल्कि देश के छोटे-बड़े नगरों और गांवों में भी महिलाएं असुरक्षित हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भले ही दिल्ली में हुए बलात्कार की शिकार बच्ची के लिए पांच लाख रुपये देने की घोषणा की हो, पर प्रदेश में हर दो घंटे में बलात्कार की औसतन एक घटना होती है। उसे रोकने का कोई प्रयत्न कहीं नजर नहीं आता। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल प्रशासनिक सुधार या कानूनी परिवर्तन ही काफी नहीं होगा, बल्कि उसके लिए समाज को भी सक्रिय भूमिका अदा करनी होगी। राजनीतिक दलों को भी पहल करते हुए स्वयंसेवकों के दल बनाने की पहल करनी चाहिए, जो अपने आसपास ऐसी घटनाओं को रोक सकें।

यह समय राजनीति करने का नहीं है। सब दल मिलकर संसद में इसका तोड़ निकालें। लेकिन दुख इस बात का है कि देश में ऐसा कोई आदमी नहीं बचा, जो सबको बुलाकर कोई राह निकाले। जो ऐसा करेगा, वही रहबर कहलाएगा। वरना वोट की यह लड़ाई अंततः युवा शक्ति को आग का गोला बना देगी।

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