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ऐसे तो गन्ना किसान खत्म हो जाएंगे

घनेंद्र सिंह सरोहा

Updated Fri, 09 Nov 2012 09:29 PM IST
sugarcane farmers will go over
देश के गन्ना किसानों की लड़ाई में अब पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह भी कूद गए हैं। उन्होंने राष्ट्रीय मजदूर किसान संगठन के समन्वयक के साथ मिलकर प्रधानमंत्री को चुनौती दी है कि वह या तो आगामी चार दिसंबर तक रंगराजन समिति की रिपोर्ट को खारिज कर दें, नहीं तो संसद के घेराव के लिए तैयार रहें। उत्तर भारत से गन्ना किसान की नस्ल को ही खत्म करने के लिए केंद्र सरकार ने बीते महीने दो महत्वपूर्ण फैसले लिए। उनमें से एक एफडीआई पर तो उसने कदम भी उठा लिया है। दूसरे, चीनी और गन्ने पर से उसने अपना नियंत्रण हटाने का मन बना लिया है।
सरकार ने गन्ने और चीनी से सरकारी नियंत्रण हटाने के संकेत विगत 20 जुलाई को ही दे दिए थे, जब उसने इस गन्ना सीजन के लिए 170 रुपये प्रति क्विंटल गन्ने का खरीद मूल्य फेयर एवं रेम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) घोषित किया। 25 रुपये क्विंटल की बढ़ोतरी गन्ना किसानों के इतिहास में केंद्र सरकार की ओर से पहले कभी नहीं हुई थी। सरकार ने नियंत्रण हटाने का दूसरा संकेत हाल ही में तब दिया, जब वह राशन की चीनी के दाम 13.5 रुपये से बढ़ाकर 24 रुपये प्रति किलो करने जा रही थी। मीडिया और सहयोगियों का दबाव बढ़ा, तो सरकार ने यह फैसला दिसंबर तक के लिए टाल दिया।

चीनी और गन्ने पर से सरकारी नियंत्रण हटा लेने का सीधा मतलब है कि उत्तर-प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार, मध्य-प्रदेश आदि राज्यों के किसान अब सीधे चीनी मिलों के भरोसे होंगे। मिलें जो रेट तय करेंगी, उतने में उन्हें गन्ना बेचना होगा। रंगराजन समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जो मौजूदा व्यवस्था चीनी मिल, गन्ना किसान, राज्य और केंद्र सरकारों के बीच चल रही है, इससे चीनी और गन्ना उद्योग को काफी नुकसान हो रहा है। आज की तारीख में यह देश भर में 80 हजार करोड़ रुपये का कारोबार है। अगर इससे सरकारी नियंत्रण हट जाए, तो यह बढ़कर दोगुना हो जाएगा। इसके लिए चाहिए यह कि चीनी मिलों के लिए गन्ना आरक्षित क्षेत्र के नियम को खत्म करने के साथ चीनी मिलों और गन्ना किसानों के बीच तय होने वाले आरक्षित गन्ना मूल्य की प्रक्रिया को भी समाप्त कर दिया जाए।

समिति ने एक सिफारिश और की कि देश में गन्ना क्षेत्र की अर्थव्यवस्था जब तक बाजार के नियम मांग और आपूर्ति के हिसाब से नहीं चलती, तब तक चीनी मिलें गन्ना किसानों को केंद्र सरकार की एफआरपी की हर साल घोषित होने वाली दर देने के लिए बाध्य होंगी। बीते सीजन में एफआरपी 145 रुपये क्विंटल और उत्तर प्रदेश का राज्य सलाहकारी मूल्य (एसएपी) 240 रुपये क्विंटल था। यानी रंगराजन समिति की सिफारिशें मानने पर केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के उन सभी राज्यों के गन्ना किसानों से कहेगी कि उन्हें अब एसएपी नहीं मिलेगा, गन्ने की खेती करनी है, तो एफआरपी से काम चलाना पड़ेगा।

समिति ने गन्ना किसानों के जख्म पर नमक छिड़कते हुए यह भी कहा कि उन्हें चीनी और उसके सह-उत्पाद शीरा, खोई और मैली से चीनी मिल को होने वाली आमदनी में से भी 75 फीसदी हिस्सा मिलेगा। जो चीनी मिलें सुप्रीम कोर्ट के कहने के बावजूद गन्ना किसानों का हक देने से इनकार करती आई हों, वे क्या किसानों को बताएंगी कि उनके यहां कितने का शीरा, खोई और मैली बिका है? चीनी मिलें किसानों को उनके उत्पाद की बिक्री में 50 फीसदी मुनाफा दें, ऐसा आदेश भार्गव आयोग ने 1974 में दिया था। आज चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का पांच हजार 495 करोड़ रुपये बकाया है, जिसमें से उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के तीन हजार 303 करोड़ रुपये बकाया हैं।

दरअसल, सरकार गन्ने को बाजार के नजरिये से देख रही है। उसे इस नई व्यवस्था में राशन की चीनी के तीन हजार करोड़ रुपये बचते हुए दिख रहे हैं। उसे दिख रहा है कि अभी चीनी के निर्यात में भारत की मात्र चार फीसदी की हिस्सेदारी है, जिसे ब्राजील की तरह 43 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। लेकिन वह भूल रही है कि गन्ने की खेती उसके लिए एक उद्योग हो सकती है, लेकिन देश के 25 करोड़ गन्ना किसानों के लिए तो यह एक जीवन-शैली है।
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