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साफ हवा के लिए संघर्ष

पत्रलेखा चटर्जी

Updated Wed, 15 Nov 2017 09:12 AM IST
Strugle for clean air

वायु प्रदूषण

मेरे घर की खिड़की से बाहर देखें, तो नजारा एकदम बदल गया लगता है। सामने स्थित पार्क में जहां अक्सर बच्चे खेलते दिख जाते थे, कोई नजर नहीं आता। अखबार की सुर्खियां दिल्ली का हाल बयान कर रही हैं कि दिल्लीवासियों को धुंध से कोई राहत मिलती नहीं दिख रही है। जैसा कि सबको पता है कि देश की राजधानी प्रदूषित हवा से बुरी तरह से घिर चुकी है। इस धुंध की कई वजहें हैं, जिन पर अखबारों और टेलीविजन के प्राइम टाइम शो पर काफी बहसें हो रही हैं। यह सिर्फ दिल्ली का हाल नहीं है, उत्तर भारत के अनेक शहर धुंध का शिकार हैं, आप चाहें, तो फरीदाबाद या गाजियाबाद के निवासियों से उनका हाल पूछ सकते हैं।
तो फिर बच्चे कहां खेलें? नुकसानदेह हवा के कारण बच्चों को बाहर खेलने से रोका गया, तो क्या होगा? आखिर कब तक बच्चे मास्क लगाए घूमेंगे? हमें इन सवालों के जवाब पता हैं, क्योंकि हमारे आसपास इसी बात की चर्चा हो रही है। बीती रात दिल्ली के एक समृद्ध इलाके में ब्यूटी सैलून में काम करने वाले एक युवा ने बताया कि प्रदूषित हवा से किस तरह उसका पूरा परिवार प्रभावित हो गया है। उसकी पांच साल की बेटी को सांस लेने में भयंकर तकलीफ हो रही है, जिसके कारण उसका घर से बाहर निकलना बंद हो गया है। उसकी पत्नी और एक साल के बेटे की हालत भी ऐसी ही है। पूरे परिवार को घर में कैद होकर रहना पड़ रहा है।

दिल्ली और उसके आसपास के शहरों की कमोबेश यही हालत है। धुंध और प्रदूषित हवा ने लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी है। हम इसका कारण जानते हैं और यह भी जानते हैं कि इससे निजात पाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। मगर इस पर राजनीतिक वर्ग की प्रतिक्रिया हैरान करने वाली है।

यदि आप अखबारों के पन्ने उलटें या खबरिया टीवी चैनल देखें, तो आपको एहसास होगा कि जीवन और मृत्यु से जुड़े इस मुद्दे से निपटने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कितनी कमी है। इस धुंध से सर्वाधिक प्रभावित राज्य दिल्ली, हरियाणा और पंजाब एक दूसरे पर और केंद्र सरकार पर दोषारोपण कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और राजस्थान भी इस समस्या से प्रभावित हैं, लेकिन ये राज्य अभी इस टकराव से अलग हैं। दिलचस्प यह है कि केंद्र की मोदी सरकार इस पर अभी चुप है और उसने दो विपक्षी मुख्यमंत्रियों-दिल्ली के अरविंद केजरीवाल और पंजाब के अमरिंदर सिंह को सार्वजनिक तौर पर भिड़ने का अवसर दे दिया है। यह माना जाता है कि दिल्ली और उसके आसपास आसमान में छाई काली धुंध के पीछे पराली जलाया जाना मुख्य कारण है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस अंतरराज्यीय विवाद में केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है? मोदी सरकार के एक मंत्री जोकि खुद एक डॉक्टर भी हैं, उन्होंने आधिकारिक रूप से कहा है कि वायु प्रदूषण नुकसानदेह तो है, लेकिन यह जानलेवा नहीं है। हकीकत इसके उलट है, क्योंकि इस बात के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं कि यह बहुत घातक है। आखिर उनके इस बयान के जरिये केंद्र सरकार क्या संदेश देना चाहती है? प्रदूषण एवं स्वास्थ्य से संबंधित लैंसेट कमीशन के मुताबिक, हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट कहती है कि 2015 में दुनिया की दस सर्वाधिक आबादी वाले शहरों में प्रदूषण जनित सर्वाधिक मौतें भारत और बांग्लादेश में दर्ज की गईं। लैंसेट जन स्वास्थ्य पर केंद्रित एक प्रमुख जर्नल है।

आधार और नकदविहीन अर्थव्यवस्था की तरह साफ हवा केंद्र सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल क्यों नहीं है? जहरीली हवा विभिन्न राजनीतिक दलों के समर्थकों में भेद नहीं करती। ऐसी घातक हवा सबको समान रूप से नुकसान पहुंचाती है। दिल्ली और इसके आसपास के क्षेत्रों में छाई धुंध की एक प्रमुख वजह पराली जलाया जाना है। हर साल इस मौसम में फसल कटने के बाद पराली जलाई जाती है। हम सबको पता है कि इसे जलाने से जो धुंआ और धुंध उठती है, वह नुकसानदेह है। हम सब यह भी जानते हैं कि इसका विकल्प क्या हो सकता है। इसी हफ्ते एक राष्ट्रीय दैनिक में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, वास्तव में इस मौसम में जहरीली हवा को कम किया जा सकता था, बशर्ते कि केंद्र और संबंधित राज्यों में हाल ही में अंतिम रूप दिए गए वित्तीय पैकेज को लेकर किसी ऐसे फॉर्मूले पर सहमति बन जाती, जिससे किसानों को पराली जलाने से रोका जाता और उसकी भरपाई की जाती।

इस वर्ष की शुरुआत में सीआईआई-नीति आयोग की साफ हवा की पहल के तहत गठित एक कार्यबल ने 3,000 करोड़ रुपये से भी अधिक के पैकेज की अनुशंसा की थी। सितंबर में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में कार्यबल ने कहा कि कृषि संबंधी कचरों के प्रबंधन के वैकल्पिक उपायों को अपनाने के लिए किसानों को वित्तीय मदद देने की जरूरत है। जो आसान विकल्प सुझाए गए थे, उनमें ईटों और मिट्टी के डोम के भीतर पराली जलाए जाने का विकल्प शामिल था। इसमें ऑक्सीजन की गैरमौजूदगी में जैविक कोयला या पराली कोयला तैयार होता, जोकि मिट्टी के लिए पोषक होता है और इसका वाणिज्यिक मूल्य भी है।

पर चूंकि वित्तीय भार वहन किए जाने को लेकर कोई समझौता नहीं हो सका, इसलिए धन का उपयोग भी नहीं हो सका। हमारे पास साफ-सुथरी हवा के इंतजाम के लिए धन नहीं है, जिससे लगता है कि हम अपने बच्चों का भविष्य गिरवी रखना चाहते हैं। बीजिंग जैसे शहर ने, जहां वायु प्रदूषण का ऐसा ही हाल है, साफ-सुथरी हवा के लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम तैयार किया है और उसके लिए धन भी जुटाया है। हम भी ऐसा कर सकते हैं, बशर्ते की यह हमारी राजनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल हो।
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