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यूपीए के अंतर्विरोधों की कहानी

परंजय गुहाठाकुरता

Updated Fri, 30 Nov 2012 12:12 AM IST
story conflict of upa
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के दूसरे कार्यकाल को जिन खास वजहों से याद किया जाएगा, आर्थिक नीतियों को लेकर उसका अंतर्विरोध उनमें से एक है। यह सरकार एक तरफ यह स्वीकार करती है कि बढ़ती कीमतों के चलते लोगों का जीना दूभर हो रहा है, तो दूसरी तरफ डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी जैसे कदम भी उठाती है।
इस बढ़ोतरी का सीधा असर माल ढुलाई पर पड़ा और उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाली ज्यादातर वस्तुओं की कीमत बढ़ गई। यही नहीं, सरकार ने एक परिवार के लिए साल में सबसिडी वाले रसोई गैस सिलेंडरों की सीमा छह तय कर दी। अब जबकि इस फैसले पर विरोध बढ़ गया है, तो सरकार इस सीमा को बढ़ाकर नौ सिलेंडरों तक करने पर विचार कर रही है। हैरानी की बात है कि ये फैसले ऐसे समय हुए, जब महंगाई दर करीब नौ फीसदी के आसपास है। इन फैसलों से साफ है कि मौजूदा सरकार पहले चार कदम आगे चलती है, फिर दो कदम पीछे हट जाती है।

वास्तव में यही 'नीतिगत अपंगता' है। और इसी दाग को धोने के लिए उसने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देने जैसे फैसले को आगे बढ़ाया। सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी कंपनियां आएंगी, जो किसानों को उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य देंगी और उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर रोजमर्रा की वस्तुएं जैसे चावल, दाल, चीनी वगैरह उपलब्ध हो सकेंगी।

पर, विपक्षी पार्टियों की तो बात छोड़िए, सरकार के सहयोगी दल भी इस तर्क से सहमत नहीं दिखते। लोगों में आशंका है कि वॉलमार्ट जैसी बड़ी खुदरा कंपनियां शुरुआत में तो सस्ती दरों में वस्तुएं उपलब्ध कराएंगी, पर एक बार जब देश के करोड़ों किराना व्यापारी प्रतिस्पर्द्धा से बाहर होने के कारण दुकानें समेट लेंगे, तो इन कंपनियों की मनमानी शुरू हो जाएगी और फिर वस्तुओं की कीमतें आसमान छूएंगी।

हैरानी इस बात को लेकर भी है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से गरीबों को जेनेरिक दवाएं मुफ्त में उपलब्ध कराने जैसी कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में भी बाधा आ रही है। यही हाल भूमि अधिग्रहण विधेयक का भी है। सरकार खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने की बात कह रही है, पर कमजोर सार्वजनिक वितरण प्रणाली इसकी सफलता में सबसे बड़ी बाधा बन सकती है। जबकि सरकार में इसे दुरुस्त करने की इच्छाशक्ति नहीं दिख रही है।

यह अलग बात है कि तमिलनाडु, केरल, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त किया है और वहां केवल गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को ही नहीं, बल्कि सभी लोगों को सस्ते दर पर खाद्यान्न मुहैया कराया जा रहा है। लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इन राज्यों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अलग-अलग दलों का शासन रहा है। जैसे केरल में वाम गठबंधन व कांग्रेस गठबंधन, तमिलनाडु में द्रमुक और अन्नाद्रमुक, छत्तीसगढ़ में भाजपा और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस व भाजपा। इसलिए केंद्र सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए इन राज्यों के तौर-तरीकों से काफी कुछ सीखने की जरूरत है।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने नकद सबसिडी देने की योजना को अगले साल से शुरू करने का ऐलान किया है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के लिए यह एक महत्वाकांक्षी योजना है, लेकिन इसमें कुछ नया नहीं है। सिवाय इसके कि ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग प्रणाली की उपलब्धता बढ़ेगी। इसके तहत मोबाइल एटीएम जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, जो एक अच्छा प्रयास है। पर, नकद सबसिडी वोट दिलाने में मददगार साबित होगी, यह बात फिलहाल काल्पनिक लगती है।

वैसे खाद्यान्न पर दी जाने वाली सबसिडी को इससे बाहर रखा गया है। पर भविष्य में यदि इसे भी इस योजना के दायरे में लाया जाता है, तो लोगों के बैंक खाते में जाने वाली रकम के दुरुपयोग के आसार काफी बढ़ जाएंगे, क्योंकि तब यह कैसे तय होगा कि इससे लाभान्वित लोग पैसे से चावल या चीनी खरीद रहे हैं, या शराब।
 
सरकार के इन दो फैसलों के अलावा पिछले दिनों वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच भी मतभेद उभर कर सामने आए हैं। असल में, वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक की नीतियां इन दिनों अलग-अलग दिशाओं का रुख कर चुकी हैं। मसलन, वित्त मंत्रालय का ध्यान सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर को बढ़ाने और निवेश में इजाफे पर है। जबकि रिजर्व बैंक महंगाई पर अंकुश लगाने की दिशा में काम कर रहा है।

विकास दर की गति तेज करने के उद्देश्य से वित्त मंत्रालय की इच्छा है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती करे, जबकि बैंक का मानना है कि महंगाई दर पहले से ही काफी ज्यादा है और यदि ब्याज दर में कमी की गई, तो आम आदमी का जीना और भी दूभर हो जाएगा। वैसे भी ब्याज दरों में कटौती का फायदा उद्योगपतियों को ही मिलने वाला है. जिनके ऊपर इस महंगाई का खास असर नहीं पड़ रहा है।

इस तरह वित्त मंत्रालय भारतीय रिजर्व बैंक से नाखुश है, क्योंकि वह अपने तरीके से काम कर रहा है, जिसका उसको हक है। सरकार सांविधानिक संस्थाओं से भी लगातार टकराव मोल रही है। कैग पिछले कुछ दिनों से सरकार के निशाने पर है। दरअसल, 2 जी और कोयला घोटाले के चलते सरकारी खजाने के नुकसान का आकलन कैग ने ही किया है, जिसके चलते सरकार की काफी फजीहत हो चुकी है।

सरकार का तर्क है कि कैग को नीतिगत मामलों पर अपनी राय रखने का हक नहीं है, पर प्रश्न यह है कि अगर सरकार की नीतियों के चलते सरकारी खजाने का नुकसान होता है, तो ऐसी नीतियों पर कैग को सवाल क्यों नहीं उठाने चाहिए?
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