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स्कूलों की बदहाली बदले तो कैसे

वेदविलास उनियाल

Updated Fri, 05 Oct 2012 09:53 PM IST
so instead of the misery of schools
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को अगले छह महीने के अंदर देश के सभी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। क्या इससे सचमुच स्थिति बदलेगी? इस मुद्दे पर शिक्षाविद् डॉ. अनिल सद्गोपाल से वेदविलास उनियाल ने बातचीत की।  

आजादी के छह दशक के बाद भी शीर्ष अदालत को केंद्र और राज्य सरकारों को स्कूलों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश देना पड़ रहा है। इसे आप किस रूप में देखते हैं?

संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 की अवधारणा यही है कि सब एक समान हैं। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा। शिक्षा में तो बिलकुल नहीं। राजनेताओं, नौकरशाहों, उद्यमियों और उच्च मध्यवर्ग के बच्चों के लिए अलग स्कूल हैं, आम बच्चों के लिए अलग स्कूल। शिक्षा के लिए बजट पारित करने वाले सांसद-विधायकों के बच्चे इन स्कूलों में नहीं पढ़ते। देश के बारह लाख सरकारी स्कूलों में ऊंचे लोगों के बच्चे नहीं जाते। इन स्कूलों में पढ़ने वालों के बारे में कभी कुछ नहीं सोचा जाता। 1966 में कोठारी आयोग और राजीव गांधी के शासन के समय बनी शिक्षा नीति में भी समान स्कूल, समान शिक्षा पर जोर दिया गया। लेकिन इन्हें नजर अंदाज कर दिया गया। जब स्कूलों के लिए पर्याप्त बजट नहीं होगा, देखरेख की गंभीर जिम्मेदारी नहीं होगी, तो यही हाल होगा।

सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्देश के बाद क्या स्कूलों में कोई ढांचागत बदलाव हो पाएगा?
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी निर्देश दिया था। देखा जाए, तो उस निर्देश की अवमानना के कारण संबंधित जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी। शीर्ष अदालत से उम्मीद तो यही थी कि वह मुख्य सचिव, शिक्षा सचिव आदि के खिलाफ कदम उठाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इतना जरूर है कि अक्तूबर, 2011 के निर्देश के विपरीत इस बार निजी स्कूलों को भी इसमें शामिल किया गया है। इसके बावजूद कोई बदलाव आएगा, इसकी उम्मीद नहीं है, क्योंकि इस पर अमल तो कार्यपालिका को करना है। अगर वह कोई कदम नहीं उठाती, तो उसे जवाबदेह बनाने का कोई तंत्र नहीं है।

स्कूलों की दशा में सुधार कैसे होगा?  
साफ बात है कि सरकारी स्कूलों को पैसा चाहिए। केंद्र और राज्य, दोनों स्तर पर बजट बढ़ना चाहिए। समान शिक्षा नीति जरूरी है। जी-8 और घोर पूंजीवादी देशों ने भी समान शिक्षा व्यवस्था को अपनाया है। जबकि हमारे यहां उलटा हो रहा है। सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। कुछ राज्यों में तो सरकारी स्कूलों को निजी हाथों में देने की योजना बन रही है। बुनियादी सुविधाएं तो तब बढ़ेंगी, जब उनके लिए हम कुछ करना चाहते हों।

ज्यादा संख्या में सस्ते निजी स्कूल खुलने पर क्या बदलाव हो सकता है?
ऐसे स्कूलों की फीस भी कम नहीं होती। केवल बड़े स्तर के स्कूलों में सुविधाएं मिलती है। ऐसे स्कूलों से भी आम शिकायतें मिलती हैं। स्कूलों के लिए एक निश्चित मापदंड होना ही चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे पास शिक्षा व्यवस्था के सुधार के लचर कानून रहे हैं।  सब कुछ बंधे-बधाएं ढर्रे पर चल रहा है।

क्या यह विडंबना नहीं कि शीर्ष अदालत के निर्देश के बाद भी फर्क नहीं पड़ने वाला?
​दरअसल सुप्रीम कोर्ट केवल कह ही सकता है, निर्देशों के अनुपालन के लिए उसके पास कोई तरीका नहीं है। अगर निर्देश के साथ निगरानी के लिए आयुक्त बिठाया जाता, उसके पास कोई सांविधानिक ताकत होती, उसके तहत हर पहलू पर आंकड़े जुटाकर सुप्रीम कोर्ट को सौंपा जाता, तो इसका अपना डर होता। यहां तो केवल एक याचिका का निपटारा किया गया। बदहाल शिक्षा की जटिल गुत्थी इससे नहीं सुलझेगी।
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