आपका शहर Close

आधुनिक समय में गुलामी

बैजयंत जय पांडा

Updated Wed, 21 Aug 2013 01:31 AM IST
Slavery in modern time
हर साल देश में तकरीबन 33 करोड़ लोग आंतरिक रूप से एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रवासन करते हैं। यह एक सरकारी अनुमान है। ऐसे अन्य कई सामयिक प्रवासी भी हैं, जिनकी कभी गिनती नहीं की गई। प्रवासन के बहुत से कारण हो सकते हैं, पर निर्णायक वजह अकसर आर्थिक ही होती है।
असमान विकास एवं क्षेत्रीय असंतुलन के कारण प्रवासन से बचना नामुमकिन हो गया है। पिछले दो दशक में विकास की पद्धति ने ग्रामीण तथा शहरी इलाकों के बीच के अंतर को अधिक गहरा कर दिया है। अवसर कुछ चुनिंदा राज्यों के कुछ चुनिंदा इलाकों तक ही सीमित रह गए हैं। इस बात में कोई शक नहीं कि प्रवासन से जीवन स्तर में सुधार होता है और सांस्कृतिक रूप से भिन्न समुदायों के बीच मेलमिलाप को बढ़ावा मिलता है, लेकिन यही प्रवासन श्रमिक वर्ग के लिए मुसीबतों के पहाड़ के समान भी है। प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए अनेक कानून हैं। मसलन, अंतरराज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम आदि।

दुखद यह है कि ये कानून श्रमिकों के अधिकारों के बचाव में निष्प्रभावी रहे हैं। काम की अनौपचारिक प्रकृति और ठेकेदारों तथा अफसरों में सांठगांठ के कारण सरकार को कानूनी व्यवस्था स्थापित करने में कठिनाइयां आती हैं। इसके अलावा, चूंकि ये प्रवासी श्रमिक किसी भी एक स्थान पर लंबे समय तक नहीं रहते, लिहाजा राजनीतिक रूप से इनके लिए सहायता प्राप्त करना भी कठिन हो जाता है। सरकार भी जैसे-तैसे अपना दायित्व पूरा करने की कोशिश करती रहती है।

ओडिशा के बोलांगीर, कोरापुट तथा कालाहांडी जैसे जिलों से हजारों परिवार सूखे मौसम में कृषि छोड़कर रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों की ओर प्रस्थान करते हैं। अग्रिम भुगतान के लोभ में ये लोग शोषक ठेकेदारों के कहने पर आंध्र प्रदेश के रंगारेड्डी, मेडक और नालगोंडा जिलों में ईंट के भट्ठों पर मजदूरी करना स्वीकार कर लेते हैं। अप्रैल में रंगारेड्डी जिले के माहेश्वरम मंडल में इन श्रमिकों के साथ बातचीत में मुझे पता चला कि इन्हें प्रति व्यक्ति 12 से 15 हजार रुपये अग्रिम दिए जाते हैं। फिर इन्हें रोजाना 12 घंटे से ज्यादा काम करने को मजबूर किया जाता है। यह मजदूरी आंध्र प्रदेश में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम द्वारा तय राशि से बहुत कम है। उदाहरण के लिए, एक श्रमिक को मिट्टी के मिश्रण तथा 1,000 ईंटों को ढालने के लिए 367 रुपये का भुगतान दिया जाना कानूनी तौर पर अनिवार्य है। फिर भी, यहां अग्रिम सहित वास्तविक मजदूरी केवल 180-250 रुपये ही बनती है।

दरअसल, यहां कई श्रमिकों की हालत बंधुआ मजदूरों जैसी ही है। अग्रिम लौटाने की स्थिति न होने के कारण श्रमिक किसी भी हालत में काम करने के लिए मजबूर होते हैं। यही नहीं, इन मजदूरों को अक्सर धमकी और शारीरिक यातना भी झेलनी पड़ती है। प्रवासन का सबसे बड़ा शिकार बच्चे हैं। स्थानीय भाषा और बोली अलग होने के कारण, इनकी शिक्षा प्रभावित होती है। स्कूलों में दाखिले और उपयुक्त पुस्तकों व शिक्षकों की व्यवस्था करना प्रशासन के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

अंतरराज्यीय समन्वय की कमी के कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली, समेकित बाल विकास सेवा जैसे सरकारी कार्यक्रमों में प्रवासी श्रमिकों का नामांकन कठिन हो जाता है। हालांकि रंगारेड्डी जिले के प्रशासन के प्रयासों से ओडिया श्रमिकों को कल्याणकारी कार्यक्रमों को कुछ लाभ मिला है, लेकिन मुख्य समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। जब तक शोषण करने वाले मालिकों और ठेकेदारों को सजा नहीं मिलती, हालात में सुधार की उम्मीद बेमानी है।
वैसे, श्रमिकों की स्थिति में वास्तविक सुधार का सबसे प्रभावी तरीका उन्हें अपने राज्य में ही बेहतर अवसर प्रदान कराना है। उदाहरण के लिए, ओडिशा में एक रुपये प्रति किलो चावल देने के अलावा राज्य कोष से प्रवासन ग्रस्त जिलों में मनरेगा के तहत 100 दिनों से अधिक की नौकरी देने का फैसला लिया गया है। दूसरे राज्य भी अगर इसी प्रकार के कदम उठाएं, तो आर्थिक मजबूरी की वजह से किये जाने वाले प्रवासन पर कुछ हद तक रोक लगाई जा सकती है।

कई अविकसित राज्यों की अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार आया है लेकिन वहां के श्रमिकों की हालत अब भी बदतर है। ये लोग आपातकालीन चिकित्सा, विवाह जैसी जरूरतों के लिए ठेकेदारों से अग्रिम धनराशि ले लेते हैं। ऐसे में जब तक इन राज्यों में ऐसे लोगों के जीवन स्तर में ठीक ढंग से सुधार नहीं आता, इन्हें शोषण से बचाना कठिन है।

फिलहाल मौजूदा स्थितियों में राज्य सरकारों को चाहिए कि वे अपने यहां आने वाले सभी प्रवासी परिवारों की जानकारी रखें और एक-दूसरे राज्यों को सहयोग दें। साझेदारी से जानकारी तथा संसाधनों को सही समय पर श्रमिकों तक पहुंचाया जा सकता है। यदि श्रमिक भेजने वाला राज्य योजनाओं के विस्तार से संबंधित खर्च उठाने को तैयार हो जाए, तो योजनाओं का दायरा आसानी से बढ़ाया जा सकता है। इतना ही नहीं, सरकार तथा सिविल सोसाइटी को श्रमिकों को उनके अधिकारों के बारे में भी शिक्षित करना चाहिए। साथ ही उन्हें उनके अधिकारों को हासिल करने का स्पष्ट रास्ता दिखाना चाहिए। इस दिशा में, मीडिया अभियान के साथ-साथ, सरकार टेलीफोन हेल्पलाइन स्थापित कर श्रमिकों को अपनी शिकायतें दर्ज करने और उन तक समाधान पहुंचाने का माध्यम दे सकती है।
Comments

स्पॉटलाइट

दिवाली पर पटाखे छोड़ने के बाद हाथों को धोना न भूलें, हो सकते हैं गंभीर रोग

  • गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017
  • +

इस एक्ट्रेस के प्यार को ठुकरा दिया सनी देओल ने, लंदन में छुपाकर रखी पत्नी

  • गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017
  • +

...जब बर्थडे पर फटेहाल दिखे थे बॉबी देओल तो सनी ने जबरन कटवाया था केक

  • गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017
  • +

'ये हाथ नहीं हथौड़ा है': सनी देओल के दमदार डायलॉग्स, जो आज भी हैं जुबां पर

  • गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017
  • +

मां लक्ष्मी को करना है प्रसन्न तो आज रात इन 5 जगहों पर जरूर जलाएंं दीपक

  • गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017
  • +

Most Read

रूढ़ियों को तोड़ने वाला फैसला

supreme court new decision
  • रविवार, 15 अक्टूबर 2017
  • +

सरकारी संवेदनहीनता की गाथा

Saga of government anesthesia
  • मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017
  • +

दीप की ध्वनि, दीप की छवि

sound and image of Lamp
  • बुधवार, 18 अक्टूबर 2017
  • +

ग्रामीण विकास से मिटेगी भूख

Wiped hunger by Rural Development
  • सोमवार, 16 अक्टूबर 2017
  • +

नवाज के बाद मरियम पर शिकंजा

Screw on Mary after Nawaz
  • शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017
  • +

दूसरों के चेहरे पर भी हो उजास

Light on the face of others
  • बुधवार, 18 अक्टूबर 2017
  • +
Top
  • Downloads

Follow Us

Read the latest and breaking Hindi news on amarujala.com. Get live Hindi news about India and the World from politics, sports, bollywood, business, cities, lifestyle, astrology, spirituality, jobs and much more. Register with amarujala.com to get all the latest Hindi news updates as they happen.

E-Paper
Your Story has been saved!