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एक न्याय और इतने अड़ंगे

तवलीन सिंह

Updated Fri, 07 Sep 2012 10:19 AM IST
single justice many obstacles
यह इत्तफाक था या देवलोक से इशारा कि सर्वोच्च न्यायालय ने गए सप्ताह अजमल कसाब को फांसी की सजा उसी दिन सुनाई, जिस दिन गुजरात में विशेष अदालत ने 2002 के दंगों में एक पूर्व मंत्री को हत्या के जुर्म में दोषी ठहराया। मुझे यह इत्तफाक महत्वपूर्ण इसलिए लगा, क्योंकि मेरा मानना है कि अगर हम भारत की न्याय प्रणाली को मजबूत और आधुनिक बनाने में कामयाब हो जाएं, तो मुमकिन है कि हमारी गंभीर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समस्याएं ऐसे गायब हो जाएंगी, जैसे रूई की बत्तियां तेज हवा में गायब होती हैं।
मैं यह भी मानती हूं कि किसी भी दूसरे लोकतांत्रिक देश में कसाब जैसे हत्यारे को मौत की सजा सुनाने में चार साल न लगते। न ही गुजरात के दंगा पीड़ितों को 10 वर्ष इंतजार करना पड़ता न्याय के लिए।

कसाब रंगे हाथ पकड़ा गया था। सुबूत इकट्ठा करने की भी जरूरत नहीं थी, लेकिन फिर क्यों लगे चार साल यहां तक पहुंचने में? अब भी तय नहीं है कि उसको जल्दी फांसी होगी। वह अब राष्ट्रपति से माफी मांगेगा और इस माफीनामे पर फैसला आते लग सकते हैं कई वर्ष, जिनके दौरान मुमकिन है कि पाकिस्तान में बैठे उसके जेहादी दोस्त एक ऐसी साजिश रचें कि भारत सरकार को कसाब को रिहा करना पड़ जाए। क्या ऐसा ही नहीं किया था हमने आईसी-184 के अगवा होने के बाद? मौलाना अजहर मसूद जैसे कट्टर आतंकवादी को हमने रिहा नहीं किया था, आईसी 184 के यात्रियों के बदले?

अजहर मसूद पांच वर्षों तक कैद रहा भारतीय जेलों में, क्योंकि न्याय की रफ्तार हमारे देश में इतनी धीमी है कि आतंकवादियों को भी सजा देने में दशक लग सकते हैं। यही मुख्य कारण है कि न्याय की उम्मीद छोड़कर हमारे जंगलों में फिरते हैं ऐसे नौजवान, जो समझते हैं कि न्याय लेने का एक ही रास्ता है, और वह है बंदूक का रास्ता।

यही मुख्य कारण है कि हमारे राजनेता और अधिकारी निडर होकर जनता का धन अपनी जेबों में भरते हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि अगर पकड़े भी गए, तो मुकदमा इतना लंबा चलेगा कि सजा होने तक लोग भूल भी जाएंगे कि उनका जुर्म क्या था। यही मुख्य कारण है कि हमारे देहाती इलाकों में महिलाओं और दलितों पर दिन-ब-दिन बढ़ रही है अत्याचार की घटनाएं और साथ-साथ बढ़ रही है सामाजिक अराजकता।

लोकतंत्र का आधार है कानून-व्यवस्था का स्वस्थ होना। अपने इस भारत महान में हम जानते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले वर्षों से ही कानून-व्यवस्था बीमार चल रही है। हमसे अच्छा इस बात को हमारे आला न्यायाधीश जानते होंगे, जो इन दिनों सरकारी फैसलों और नीतियों में दखल देते लगते हैं।

कभी पर्यावरण को बचाने के प्रयास में कर्नाटक की सारी खानें बंद कर दी जाती हैं, तो कभी बाघों को बचाने के बहाने पर्यटकों को जंगलों में जाने से रोक देते हैं। ऊपर से हर दूसरे दिन फटकार लगती है राजनेताओं को किसी न्यायाधीश से किसी ऐसे सरकारी फैसले को लेकर, जिसको न्यायाधीश महोदय गलत मानते हैं।

बुरी बात न होती यह अगर साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्याय प्रणाली पर भी गौर करते। ज्यादा गौर से देखने की भी जरूरत नहीं है, नजर पड़ते ही दिख जाएंगी उनको पुराने मुकदमों की वे धूल भरी फाइलें,जिनमें भरी पड़ी हैं अन्याय की दर्द भरी कहानियां।

उन पुरानी फाइलों को अगर खोलने की तकलीफ करते हैं जज साहब, तो शायद हमको बता सकेंगे कि 1984 के दंगा पीड़ितों सिखों को आज तक क्यों नहीं न्याय मिला है? शायद ऐसा करने से यह भी जान जाएंगे जज साहब कि अगर उस समय हत्यारों को दंडित किया गया होता, तो गुजरात में 2002 में जो हिंसा हुई, वह असंभव होती।

क्या वजह है कि न्याय को होते इतनी देर हो जाती है अपने देश में? बेशक मैं इस मामले की विशेषज्ञ नहीं हूं, लेकिन अन्य देशों की अदालतों की कार्यवाहियों के आधार पर मैं इतना यकीन से कह सकती हूं कि उनमें विलंब कम होता है, क्योंकि उन देशों में न्यायपालिकाओं की कार्यवाही के तरीके अब बेहद आधुनिक हो गए हैं।

कंप्यूटरों, वीडियो कैमरों और अन्य ऐसे साधनों से गवाहों के बयान और सुबूतों को इकट्ठा करने में इतना समय नहीं लगता जितना हमारे देश में लगता है। और न ही अदालतों में ऐसे मुकदमे दर्ज हो सकते हैं, जो बेमतलब हों?

याद कीजिए कि अपने इस भारत महान में एक ऐसे व्यक्ति का भी मुकदमा दर्ज होने दिया, दिल्ली की एक अदालत ने जिसने दावा किया था कि प्रियंका गांधी उनकी धर्मपत्नी हैं। औरों के कामकाज में दखल देने से पहले अपने गिरेबां में झांकने से ही बहुत फर्क पड़ सकता है।
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