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वसंत की पतंगों से सतरंगी हो रही सभ्यता

योगेश नारायण दीक्षित

Updated Mon, 03 Feb 2014 05:22 PM IST
Sindh festival
उम्मीदों की पतंग पर सवार होकर वसंत इस बार ऐसे आया है कि करीब पांच हजार साल पुरानी उस सिंधु घाटी सभ्यता में भी रंग भर उठे हैं, जिसके गौरव को हम जाने-अनजाने भुला बैठे हैं। इसीलिए पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में सियासत की जो नई जमात तरुणाई से निकलकर सत्ता की दहलीज पर कदम रख रही है, वह वसंत उत्सव जैसी परंपराओं को फिर से तहजीब का अहम हिस्सा बनाकर कट्टरता से पीछा छुड़ाने की जुगत में लग गई है। इसका ताजा नमूना है, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के युवा चेहरे बिलावल भुट्टो जरदारी की ओर से आयोजित सिंध फेस्टिवल, जिसमें वसंत उत्सव के लिए खासतौर से दो दिन रखे गए हैं। यहां उड़ीं पतंगें न सिर्फ पाकिस्तान, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में शांति की नई बयार का संदेश पहुंचाएं, इसलिए जाने-माने पंजाबी गायक मीका और भंगड़ा किंग सुखबीर सिंह को उन्होंने खासतौर पर धमाल मचाने के लिए आमंत्रित किया।
आसमान में लहराती पतंगों से खुशहाली का संदेश देता गुजरात का काइट फेस्टिवल (उत्तरायण) हो या जयपुर का पतंग उत्सव, अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक फलक पर भारतीय परंपरा के ये शानदार नमूने हैं। पंजाब में वसंत पर आसमान पीली पतंगों से पट-सा जाता है। कुछ साल पहले तक माघ मास की पांचवी तिथि, यानी वसंत पंचमी के दिन भारत में अमृतसर और पाक के लाहौर में आसमान पर उड़ती सतरंगी पतंगें एहसास कराती थीं कि सीमा भले बंटी हो, तहजीब ने दिल का रिश्ता बरकरार रखा है। शालामार बाग में वसंत पर होने वाले ऐतिहासिक पतंगबाजी उत्सव में एक-दूसरे के पेच काटने को युवा खूब दांव लगाते थे। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब में वसंत उत्सव पर जमात उल दावा जैसे कट्टरपंथी संगठनों ने ग्रहण लगा दिया। यह उत्सव कभी वहां की संस्कृति के प्रतीक माने जाते थे। इन संगठनों ने सुहाने मौसम पर खुशी के इजहार (वसंत उत्सव) को हिंदू धर्म का संस्कार बताते हुए इस पर पाबंदी लगा दी। पहले तो लोगों ने उनकी चेतावनी को दरकिनार किया, पर बाद में वहां की सरकार भी इनके दबाव में वसंतोत्सव के आयोजन से हाथ खींचने लगी।

ऐसे मौके पर इंटरनेशनल सिंध फेस्टिवल के दौरान वसंतोत्सव आयोजित करके पाकिस्तान की सियासत में तेजी से आगे बढ़ रही नई पीढ़ी भारतीय उपमहाद्वीप की मस्ती वापस ला रही है। यह सियासी जमात कला और संस्कृति के इस प्रतीक के जरिये सद्भाव के नए रंग भरने का काम कर रही है। कट्टरपंथियों को करारा जवाब देते हुए वसंत पर पतंग उत्सव का आयोजन करने का बीड़ा उठाने वाले बिलावल भुट्टो जरदारी पाकिस्तान की पतंगबाजी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की कोशिश में हैं। इसीलिए उनके प्रयास से पहली बार आयोजित हो रहे सिंध फेस्टिवल की शुरुआत वसंत के पहले दिन पांच हजार साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता के मुख्य शहर मोहनजोदड़ो से की गई। वह दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि भले ही उनकी मां को कट्टरपंथियों ने मार दिया हो, पर वह वसंत उत्सव और पतंगबाजी जैसी पहचान को पंजाब से निकालकर सिंध के समुद्री तटों तक पहुंचाएंगे। सिंध में पतंग उड़े और पंजाब देखता रहे, ये तो सियासी दांव में चित होने जैसा हो गया। बस फिर क्या था, पाकिस्तान की सियासत में भुट्टो परिवार के विरोधी माने जाने वाले पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ के बेटे ने भी कट्टरपंथियों को जवाब देते हुए पंजाब के यूथ फेस्टिवल में पतंगबाजी का आयोजन करने और सरकार की ओर से साढ़े तीन करोड़ रुपये दिलाने का ऐलान कर दिया।

देखने को तो वसंत पर पतंगबाजी उत्सव का आयोजन पड़ोसी मुल्क में दो ताकतवर राजनीतिक परिवारों के उभरते युवा नेतृत्व के बीच उदार दिखने की जंग है, पर इसने हालात बदलने के संकेत तो दे ही दिए हैं। इन युवा नेताओं को भरोसा है कि जितनी लंबी खिंचेगी पतंग की डोर, उतनी दूर तक जाएगा उनका संदेश। वसंत के साथ आसमान में उड़ती मस्त पतंग पाक में कुछ बदलाव तो लाएगी, ऐसी एक कवि की कल्पना भी है...डोर की शह मिली तो पतंगें उड़ीं/और सीमाएं अपनी बढ़ाने लगीं।
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