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तेहरान से खाली हाथ

पुष्पेश पंत

Updated Fri, 07 Sep 2012 10:18 AM IST
return from tehran empty handed
एक और गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में भाग लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लौट आए हैं। इस बार भी खाली हाथ, पर शायद इस सलामती का शुक्रिया सभी देशवासियों को अदा करना चाहिए कि शर्म अल शेख जैसी भद नहीं पिटी। जिन हालात में मनमोहन सिंह ने ईरान का रुख किया था, उनको ध्यान में रखें, तो उनके लिए इस अंतरराष्ट्रीय जमावड़े की सबसे बडी उपयोगिता विपक्ष के करारे हमले से मुंह छिपाते राहत के चंद लमहे जुटाने के लिए अन्यत्र जाने की सुविधा की ही थी। यह याद दिलाने की जरूरत नहीं कि इस सरकार के कई तेजस्वी मंत्री यह बारंबार दोहरा चुके हैं कि भारतीय विदेश नीति के संदर्भ में गुटनिरपेक्ष आंदोलन आज सार्थक या संगत नहीं रह गया है।
एक और महत्वपूर्ण बात है, जिसे रेखांकित करना परमावश्यक है। यह सम्मेलन ईरान की मेजबानी में आयोजित था, जो अगले तीन वर्षों तक इसका मुखिया रहेगा। हाल के दिनों में अमेरिकी आका को नाराज न करने की चिंता में हमारी सरकार ईरान के साथ अपने पारंपरिक रिश्ते को तनावग्रस्त बनाती रही है। इस बार भी मनमोहन सिंह पर दबाव रहा होगा कि वह इस शिखर सम्मेलन में हाजिरी लगाने को उतावले न रहें। पर किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन की विरासत को ठुकराना सहज नहीं।

आखिर भारत इसके संस्थापकों में है! भारत को अमेरिका का बगलबच्चा बनाने के हिमायती होने के आक्षेप से आहत प्रधानमंत्री के लिए अपनी तथा हिंदुस्तान की प्रभुसत्ता के प्रदर्शन का इससे बढ़िया मौका क्या हो सकता था? विडंबना ईरान के साथ जुड़े अंतर्विरोधों तक ही सीमित नहीं। सीरिया में गृहयुद्ध जैसी स्थिति के बारे में भी भारत ढुलमुल ही रहा है। अब तक जैसे-तैसे उसने अमेरिका को पूर्ण समर्थन नहीं दिया है। उस देश में सामाजिक मीडिया के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की जो रणनीति अपनाई गई, उसका बेहिचक समर्थन भारत के लिए आत्मघाती ही सिद्ध हो सकता है। बहरहाल, हमारे प्रधानमंत्री ने मंझे हुए कलाबाज-नट की तरह तनी रस्सी पर संतुलन बनाए रखने की नुमाइश तेहरान में की। इसका कोई लाभ हमें होगा, यह देखना बाकी है।

मिस्र, लीबिया आदि जगहों में अरब वसंत के आगमन का जश्न पश्चिमी देशों के साथ मनाने का लालच हमें त्यागना पड़ा है। दिक्कत यह है कि अरब जगत में हमारी नीति घरेलू राजनीति में मुसलिम अल्पसंख्यक वोट बैंक के तुष्टीकरण के साथ बुरी तरह गुंथी हुई है। अमेरिका को इसलामी बिरादरी अपना बैरी समझती है, इसलिए अमेरिका के सामरिक सहयोगी वाली पहचान भारत के लिए नुकसानदेह ही हो सकती है। प्रधानमंत्री के समर्थक-प्रशंसक यह कहते रहे हैं कि तेहरान जाकर मनमोहन सिंह यह दर्शाना चाहते थे कि भारत ईरान के साथ रिश्ते बेहतर बनाना चाहता है, उभयपक्षीय व्यापार बढ़ाना चाहता है तथा चारबहार बंदरगाह के विकास के लिए सहायता की पेशकश कर अफगानिस्तान तक पहुंचने का एक और ऐसा मार्ग खोलना चाहता है, जो पाकिस्तान के संबंधों के उतार-चढ़ाव से प्रभावित न हो। इन सभी विषयों में निराशा ही हाथ लगी है।

ईरान के शासक इतने नादान नहीं कि परमाणु शक्ति के उनके महत्वाकांक्षी अभियान के विपक्ष में अमेरिकी इशारे पर मतदान करने वाले हिंदुस्तान को इस आचरण की एवज में पुरस्कृत करें! रही बात चारबहार बंदरगाह की, तो इसकी स्थिति पाकिस्तान के तालिबान उपद्रवी ग्रस्त प्रांत से संलग्न है। यह सोचना बचपना है कि पाकिस्तान वहां भारत के प्रवेश को आसानी से स्वीकार कर लेगा। खासकर तब, जब इसका प्रभाव अफगान घटनाक्रम पर पड़ना लाजिमी है। यह भी न भूलें कि पाकिस्तान ईरान की ही तरह एक इसलामी धर्मराज्य है, और भले ही ईरान शिया संप्रदाय का प्रतिनिधित्व-नेतृत्व करता हो, पाकिस्तान के साथ उसके मजहबी भाईचारे की अनदेखी नहीं की जा सकती।

ये अटकलें भी लगाई जा रही थीं कि कहीं गलियारों में भारतीय प्रधानमंत्री की मुलाकात पाकिस्तान के सदर से ‘अकस्मात’ हो जाएगी और परस्पर भरोसा बढ़ाने वाला अवरुद्ध संवाद फिर से शुरू हो सकेगा। मुलाकात भी हुई, और बात भी, पर बात कुछ बन नहीं सकी। इसी तरह रस्म अदायगी के तौर पर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री से भी बात नहीं बढ़ी। बढ़ती भी कैसे, तीस्ता जल विवाद हो या जमीन का झगड़ा, ममता पर मनमोहन का वश नहीं। जिस तरह तमिलनाडु के द्रविड़ राजनीतिक दलों ने श्रीलंका विषयक भारतीय राजनय को बंधक बना रखा है, वैसा ही कुछ बांग्लादेश के मामले में तृणमूल की सर्वेसर्वा करती नजर आ रही हैं।

कुछ खिसियाए अंदाज में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के स्वरूप-संगठनात्मक ढांचे में सुधार की मांग प्रधानमंत्री ने दोहराई जरूर, पर यह दावा करना नादानी है कि सिर्फ उन्होंने ही 21वीं सदी की उभरती चुनौतियों का जिक्र किया। दिल को बहलाने के कई दूसरे खयाल भी अच्छे रहे। कुल जमा 120 देशों के नेता में सिर्फ मनमोहन सिंह के सम्मान में शाही भोज का आयोजन किया गया! यह बात साफ है कि तेहरान को भारतीय विदेश नीति के संदर्भ में मील का पत्थर नहीं स्थापित किया जा सकता। पुरानी कहावत के अनुसार सुबह का भूला जब शाम को घर लौट आए, तो भूला नहीं कहलाता। मगर उस मुसाफिर को क्या कहिए, जो जाने किस गफलत में ‘जाना था जापान पहुंच गए तेहरान’ वाली मुद्रा में घर की आग की अनदेखी कर विदेश में कुआं खोदने को निकल पड़ा हो?
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