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रिश्तों को लेकर बहस गरम

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पुष्पेश पंत

Updated Fri, 14 Sep 2012 11:59 AM IST
Relationships debate
मिस्र में मुसलिम बिरादरी के उम्मीदवार के राष्ट्रपति पद पर कब्जे के बाद एक बार फिर इसलाम के जनतंत्र तथा दहशतगर्दी के बीच रिश्तों को लेकर बहस गरम हो गई है। काहिरा में आगे क्या होगा, इस बारे में अटकलें लगाने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह मुद्दा है।
‘अरब वसंत’ नाम से जिस घटनाक्रम को तरह-तरह के चश्मे चढ़ाकर परखा जा रहा है, उसकी असलियत स्वतः स्फूर्त जनतांत्रिक सैलाब से अलग है। तहरीर चौक में जो कुछ देखने को मिला, उसका साम्य लीबिया, सीरिया, बहरीन, कुबैत या यमन की हलचल से नहीं नजर आता।

सच है कि इन सभी जगह आम आदमी भ्रष्ट कुनबापरस्त शाही तानाशाही से आजिज आ चुका है, पर इसका यह मतलब नहीं कि आंदोलन सामाजिक या राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव चाहता है, जो जनतंत्र का बीजारोपण करने वाला हो। दशकों पहले ईरान में यह बात साफ हो चुकी है कि उत्पीड़क शाही परिवार के निष्कासन के लिए जो तबका सबसे कारगर साबित हुआ, वह जनतांत्रिक नहीं, कट्टरपंथी इसलामी विचारधारा का अनुयायी था।

विडंबना यह है कि पाकिस्तान में भी जनरल जिया उल हक के कार्यकाल में जिस इसलामी निजाम की नींव रखी गई, उसका असर फौजी तानाशाही पर अंकुश लगाने वाला साबित हुआ है। शुरू में भले ही सेना ने अपने तथा अमेरिकी स्वार्थ साधने के लिए तालिबान की फसल बोई, मगर क्रमशः पाकिस्तानी राजनीति तथा समाज में असहिष्णुता को बढ़ाने में इन तत्वों का योगदान रहा है।

यह बात समझने की जरूरत है कि जिन इसलामी देशों के बारे में पश्चिम इतना सिरदर्द पालता है, वे दुनिया की कुल मुसलमान आबादी का छोटा-सा हिस्सा हैं- नगण्य अल्पसंख्यक। उनको इतना तूल दिया जाता है, तो सिर्फ तेल कुओं पर उनके स्वामित्व के कारण ही। अरब जगत, खासकर सऊदी अरब में इसलाम का जो अवतार या संस्करण देखने को मिलता है, उसे भी बहुसंख्यक मुसलमानों की आस्था का प्रतिनिधि नहीं समझा जा सकता।

पेट्रो डॉलरों की घूस से गरीब मुल्कों के मुसलमान बिरादरों को आक्रामक वहाबी बनाने की कोशिश वर्षों से चल रही है। सऊदी अरब शीतयुद्ध के युग से मध्यपूर्व में अमेरिका का प्रमुख संधि मित्र रहा है, इसी कारण उसकी सांप्रदायिक धूर्तता वह अनदेखी करता रहा है। बल्कि सच तो यह है कि अफगानिस्तान से सोवियत सैनिकों को खदेड़ने के लिए उसने स्वयं जेहादी मानसिकता को प्रोत्साहित किया। साम्यवादी तानाशाही के उन्मूलन के लिए जो कांटा खोजा गया, वही आज अमेरिका के गले की फांस बन चुका है।

सार संक्षेप यह है कि यदि वास्तव में जनतंत्र का बिरवा रोपना हो, तो यह काम किसी भी देश-समाज के लोगों को खुद करना होगा- अमेरिका या कोई और इसका निर्यात या कृत्रिम आरोपण नहीं कर सकता। यह बात कुबूल करना सभी के हित में है कि अरब जगत के संस्कार बुनियादी तौर पर जनतांत्रिक नहीं, सामंती, दकियानूस, हिंसक-आक्रामक हैं।

जरा ठंडे दिमाग से सोचिए, विश्व में सबसे अधिक मुसलमान इंडोनेशिया में रहते हैं। वह देश आज भी अपनी हिंदू-बौद्ध सांस्कृतिक विरासत पर नाज करता है। बाली के एक नाइट क्लब में कुछ वर्ष पहले इसलामी दहशतगर्दों ने जो खून-खराबा किया, उसकी पुनरावृत्ति इंडोनेशिया ने नहीं होने दी। इंडोनेशिया भी तेल उत्पादक है, पर अरब बिरादरी से इतर उसकी अस्मिता है। जिस उदारमना इसलाम से हमारा साक्षात्कार इंडोनेशिया में होता है, वह वहाबी संकीर्णता से बहुत अलग है। इसके बाद चलिए बांग्लादेश की ओर, वहां भी इसलाम पारंपरिक रूप से सर्वग्राही, उदार, लचीला, मानवीय तथा सूफी मानसिकता से ओत-प्रोत रहा है।

गरीबी के कारण नई पीढ़ी सऊदी अरब की तरफ आकर्षित होने लगी है, कुछ-कुछ मलयेशिया या थाईलैंड की तरह। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सभी जगहों में जनतंत्र की स्थापना में रत्ती भर परेशानी पेश नहीं आई है। सशस्त्र स्वाधीनता संग्राम के बाद सुकार्णो ने अपना एकाधिपत्य स्थापित करने की चेष्टा की, पर बहुलवादी विविधता से भरे समाज में जनतंत्र की वापसी हुई। बांग्लादेश का राजनीतिक जीवन उथल-पुथल से भरा तथा बारंबार अस्थिरता से जूझता रहा है, पर वहां भी पलड़ा जनतंत्र का ही भारी रहा है।

अब बारी आती है भारत की, जो मुसलिम आबादी के संदर्भ में तीसरे नंबर पर है। जनतांत्रिक जीवन में कुल आबादी के 20 प्रतिशत हिस्से की भागीदारी के बारे में सवालिया निशान लगाने वाले नादान या मक्कार ही कहे जा सकते हैं। याद रहे कि पाकिस्तान का जिक्र हम यहां नहीं कर रहे। वहां भी छह दशकों के बाधित राजनीतिक विकास के बावजूद जनतंत्र की सुगबुगाहट बलवती होती जा रही है! मजेदार बात यह है कि इतने बड़े भूभाग तथा इतनी बड़ी जनसंख्या की अनदेखी कर अमेरिका तथा पश्चिम के दूसरे देशों का ध्यान मिस्र, सीरिया, यमन में ही अटका है।

दरअसल जनतंत्र का कोई सर्वसम्मत आदर्श रूप आज तक प्रकट नहीं हुआ है। फरीद जकरिया जैसे विद्वानों का मानना है कि अफ्रीका और एशिया के देशों के लिए कुछ नहीं से जनतंत्र का विकृत रूप ही बेहतर है। हमारी राय में यह भी वैसी ही साजिश है, जैसी वहाबी इसलाम को समस्त इसलाम का पर्याय मानने वाली। अरबों को छोड़िए, बाकी इसलामी जगत में जनतंत्र सेहतमंद है, भले ही हमारे गौरांग महाप्रभुओं को उसे पहचानने में कष्ट होता हो।

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