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रामलीला मैदान से नई रणनीति

विनीत नारायण

Updated Thu, 06 Sep 2012 06:40 PM IST
ram lila grounds of the new strategy
बाबा रामदेव का धरना मीडिया की निगाह में सफल भले ही न हो, पर इस बार बाबा अन्ना की टोली पर भारी पडे़। जिस दौर में टीम अन्ना विफल होकर जंतर-मंतर से उठी, उस दौर में बाबा रामदेव ने अपनी शैली बदलकर राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया। न तो उन्होंने टीम अन्ना की तरह सियासी दलों को गाली दी और न ही मांगों पर अड़ने का बचपना दिखाया। इस तरह बाबा रामदेव ने राजनीतिक सागर की गहराई को सतह पर से मापने की कोशिश की।
साधन संपन्न बाबा लंबी पारी खेलने के लिए तैयार हैं, इसलिए उन्होंने धीरता का यह नया रूप दिखाया। प्रश्न है कि बाबा की शैली में अचानक यह बदलाव कैसे आया? क्या बाबा ने मंझे हुए राजनीतिक सलाहकारों की मदद ली या फिर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के थिंक टैंक ने उनकी यह नई रणनीति तैयार की? जो भी हो, यदि वह इसी परिपक्वता का परिचय भविष्य में भी देते हैं, तो निश्चय ही राजनीति के एक छोटे-से हिस्से को ही सही, प्रभावित कर पाएंगे। अगर वह फिर पहले जैसा व्यवहार करते हैं, तो हाशिये पर खड़े कर दिए जाएंगे।

वैसे बाबा रामदेव के धरने की शुरुआत एक विवादास्पद पोस्टर के कारण अच्छी नहीं रही। सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को राष्ट्र के सम्मानित नेताओं और शहीदों के साथ खड़ा करके बाबा ने नाहक मीडिया और देशवासियों की आलोचना झेली। आचार्य बालकृष्ण के योगदान को महिमामंडित करने के अनेक अवसर आए हैं और आएंगे, पर इस तरह का विचार बाबा के सलाहकारों के मानसिक दिवालियेपन का परिचय देता है।

टीम अन्ना ने बाबा की पूर्व घोषित तारीख से पहले अपना धरना शुरू कर बाबा को विफल करने की पूरी साजिश रची। यह बात दूसरी है कि टीम अन्ना अपनी उम्मीद के विपरीत बुरी तरह विफल रही, पर वह जाते-जाते बाबा के धरने की धार भी कुंद कर गई। धरना शुरू करने से पहले बाबा का मुख्य मुद्दा था, काला धन। पर टीम अन्ना की छाया में उन्हें लोकपाल, किसान, मजदूर व अन्य विषयों से जुड़े मुद्दे भी उठाने पड़े। इससे उनका मूल मुद्दा पीछे छूट गया।

मीडिया तो पहले की तरह ही बाबा के धरना स्थल पर मौजूद था। पर बाबा के भाषण में और मंच से जो कुछ बोला जा रहा था, वह इस लायक नहीं था कि मीडिया उस पर ध्यान देता। शुरू में बाबा रामदेव के आंदोलन में समर्थन का जो अभाव दिख रहा था, वह तीसरे दिन कम हुआ, जब विभिन्न दलों के कुछ नेता मंच पर नजर आए।

पांचवे दिन नितिन गडकरी और शरद यादव जैसे नेताओं की भी मौजूदगी रही। जहां तक स्थानीय नेतृत्व को मंच प्रदान करने का प्रश्न है, तो प्रचार के महत्वाकांक्षी कई लोग इस तरह के आंदोलनों में सक्रिय हो जाते हैं और मंच को मछली बाजार बना देते हैं, पर इनके बिना राजनीतिक ताकत का पूरा प्रदर्शन भी नहीं होता। इस दिशा में बाबा की एक सीमा यह भी है कि उनके आंदोलनों में शामिल होने वाले लोग उनके अनुयायी या वेतनभोक्ता कर्मचारी हैं, स्वयंसेवी आंदोलित जनता नहीं। इसलिए उनसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

जनांदोलनों से जुड़े अनुभवी लोगों का मानना है कि जब बाबा ने अपने तेवर इतने ठंडे और लोचशील कर ही लिए, तो उन्हें इस धरने की जगह तीन दिन का राष्ट्रीय चिंतन शिविर रखना चाहिए था। जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के अनुभवी लोगों को बुलाकर, लोकतांत्रिक तरीके से देश के सवालों पर मुक्त चिंतन किया जाता। इससे लोग भी जुटते और बाबा की साख और शक्ति, दोनों बढ़ती। ऐसा बाबा निकट भविष्य में भी कर सकते हैं।

कुल मिलाकर बाबा का धरना जहां सनसनीखेज खबरों का मसाला नहीं बन पाया, वहीं इसने बाबा के व्यक्तित्व में अचानक आए बदलाव का प्रदर्शन किया। यह बदलाव बाबा के लिए उपयोगी है या नहीं, यह तो भविष्य बताएगा। हां, इस धरने का सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा। बाबा युवा हैं, बालकृष्ण जेल में बंद हैं, मीडिया मुद्दों को उठाने के लिए तैयार है और 2014 का संसदीय चुनाव सिर पर है। ऐसे में बाबा का एक सही-गलत कदम उन्हें फिर से उनकी खोई प्रतिष्ठा लौटा सकता है या मौजूदा बची प्रतिष्ठा को भी गंवा सकता है।
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