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बेचारी विधाएं

रवींद्र त्रिपाठी

Updated Thu, 25 Oct 2012 11:12 AM IST
poor genres
नाटक की स्थिति तो पहले से दर्दनाक है ही, निबंध जैसी विधा, जो किसी भी साहित्य या भाषा की बौद्धिकता और कसाव के लिए अनिवार्य है, वो भी बेहद चिंताजनक हालत में है। संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा, रेखाचित्र, यात्रा-लेखन वगैरह का भी बुरा हाल है। हालांकि ऐसा नहीं है कि इन विधाओं में लेखन नहीं हो रहा है। कुछ लोग थोक के भाव लिखे जा रहे हैं। लेकिन जिसे गुणवत्ता वाला लेखन कहते हैं, वो नहीं आ रहा है।
आकस्मिक नहीं कि अगर नामवर सिंह, राजेंद्र यादव या अशोक वाजपेयी जैसे किसी नामी-गिरामी लेखक से पूछें कि हिंदी के समकालीन दस अच्छे निबंधकारों के नाम बताइए तो उन्हें भी बहुत समस्या होगी। जैसे-जैसे हिंदी में पत्र-पत्रिकाओं की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे अलग-अलग विधाओं में अच्छे लेखकों की संख्या कम हो रही है। अजब विरोधाभास है।

बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में हिंदी में जो बड़े लेखक सक्रिय हुए वे कई विधाओं में लिखते थे। रामचंद्र शुक्ल ने आलोचना के अलावा श्रेष्ठ निबंध लिखे। हजारी प्रसाद द्विवेदी अज्ञेय, निर्मल वर्मा जैसे लेखकों ने कई विधाओं में लिखा। पर आज का कवि अकसर सिर्फ कवि होता है। कहानीकार सिर्फ कहानीकार और उपन्यासकार सिर्फ उपन्यासकार। राजेंद्र्र यादव या मोहन राकेश तक की पीढ़ी के कथाकार कहानी पर आलोचनाएं लिखा करते हैं। लेकिन आज तो आलोचक भी सही ढंग की आलोचनाएं नहीं लिख पा रहे हैं। बाकी विधाओं में क्या लिखेंगे? आजकल अज्ञेय की जन्मशती बड़ी धूमधाम से मनाई जा रही है। लेकिन शायद ही कोई अज्ञेय भक्त ऐसा है, जो अपने आराध्य की तरह कई विधाओं में लिखता हो और अच्छा लिखता हो।

विधाओं की विविधता भाषिक सर्जनात्मकता के विविध रूपों के अनुसंधान की तरफ ले जाती हैं। नाटक के वाक्यों की वही भूमिका नहीं होती, जो किसी उपन्यास के वाक्यों की हो सकती हैं। कविता में शब्दों का प्रयोग और प्रभाव आलोचना की शब्द योजना से अलग होता है। हालांकि सिर्फ साहित्यकारों की इच्छा से ही विविध विधाओं में सक्रियता नहीं बढ़ती है। इसकी और भी वजहें हैं। जैसे पत्र-पत्रिकाएं। आज भी अंग्रेजी के बड़े विदेशी अखबारों में यात्रा लेखन को प्रमुख स्थान मिलता है। लेकिन हिंदी के अखबार-पत्रिकाएं वगैरह भी अपनी सोच और सक्रियता में सीमित होते जा रहे हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में भी निबंधों के लिए कोई जगह ही नहीं बची।

शायद निबंध पढ़ने वाले भी नहीं बचे। वैसे ये एक दुष्चक्र है। अगर पढ़नेवाले कम हैं, तो लिखनेवाले भी कम ही होंगे। और जब लिखनेवाले कम हैं, तो पाठक भी कम ही होंगे। ऐसे दौर में जब साइबर लेखन काफी फल फूल रहा है, ब्लॉग लेखन में काफी तेजी आई है, हिंदी में विधात्मक विविधता के लिए भी संभावनाएं बढ़ी हैं। दिक्कत है कि ज्यादातर ब्लॉगर आत्म प्रशंसा या परनिंदा में लगे हैं। दूसरी मुश्किल यह भी कि बड़े यानी उम्रदराज लेखक ‘कंप्यूटर छुआ नहीं माउस गही नहीं हाथ’ वाली स्थिति में हैं। ये दीगर बात है कि अगर इनको कहा जाए कि आइए जरा ‘ब्लाग और साहित्य’ विषय पर भाषण दीजिए, तो फट से तैयार हो जाते हैं।

भाषण दे भी आते हैं कि ऐसा होना चाहिए और वैसा होना चाहिए। लेकिन खुद कुछ करने के लिए तैयार नहीं होते। यही कारण है कि हिंदी में आजकल प्रवचनकार बढ़ रहे हैं। यही हाल रहा, तो हिंदी में एक दिन साहित्यिक बाबा इफरात में पाए जाएंगे। ‘नाटक कैसा होना चाहिए’ या ‘श्रेष्ठ निबंध कैसे लिखे जाएं’ जैसे विषयों पर प्रवचन देने के लिए सैकड़ों लोग तैयार मिलेंगे। लेकिन अच्छे नाटक लिखनेवाले इक्का-दुक्का लोग ही हैं।
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