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राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई

अरुण नेहरू (वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)

Updated Fri, 02 Nov 2012 11:11 PM IST
political survival battle
आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर कांग्रेस ने सरकार और पार्टी में फेरबदल शुरू कर दिया है। अगले एक वर्ष में दस राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में स्थिति अस्थिर है। इसलिए मनमोहन सिंह की 'नई' टीम को तत्काल चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और इसकी शुरुआत हिमाचल प्रदेश एवं गुजरात से हो गई है। इस फेरबदल का सही आकलन तभी हो सकता है, जब इसे पार्टी में फेरबदल के साथ जोड़कर देखा जाए। एक बार जब संगठन में बदलाव की घोषणा हो जाएगी, तो सही तसवीर स्पष्ट हो जाएगी।
मेरे आकलन के मुताबिक, आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एवं भाजपा, दोनों को 150-150 सीटें मिलेंगी और क्षेत्रीय दल 250 से 260 के बीच सीटें हासिल करेंगे। आंध्र एवं कर्नाटक की स्थितियों के मद्देनजर क्षेत्रीय ताकतों का पलड़ा भारी हो सकता है। जबकि कांग्रेस एवं भाजपा को 150 का आंकड़ा छूने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।

हालांकि क्षेत्रीय दलों में भी बदलाव हो सकता है, क्योंकि हमने देखा ही है कि उत्तर प्रदेश में बसपा सपा को और पश्चिम बंगाल में वाम दल तृणमूल कांग्रेस को चुनौती दे रहे हैं। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के गठबंधन में भी बदलाव हुआ है। नतीजतन क्षेत्रीय ताकतों में पुनर्गठजोड़ हो सकता है। हमने देखा ही है कि सभी राज्यों में नई क्षेत्रीय पार्टियां बन रही हैं। इन बदलावों से आंकड़ों में बहुत अंतर नहीं पड़ने वाला, क्योंकि कई राज्यों में एक क्षेत्रीय दल दूसरे क्षेत्रीय दल की कीमत पर ही लाभ की स्थिति में होगा।

कांग्रेस ने तो सरकार की सर्जरी कर ली है और कुछ दिन में वह संगठन में भी बदलाव करेगी। उसके बाद भाजपा की बारी है। लेकिन मौजूदा हालात में परिवर्तन आसान नहीं है। दोनों को मतभेदों को रोकने के लिए कुशलता की जरूरत होगी, क्योंकि हर कोई पार्टी हित से पहले अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की कोशिश कर रहा है और चुनावों के नजदीक होने की स्थिति में यह सामान्य बात है।

भाजपा में शीर्ष स्तर पर मतभेद है। इनका या तो अब समाधान हो जाना चाहिए या भविष्य के लिए स्थगित कर देना चाहिए। लेकिन शीर्ष स्तर पर 'खालीपन' अंदरूनी झगड़ों को बढ़ा सकता है। दुखद है कि भाजपा अध्यक्ष संकट में हैं और पार्टी को उनसे जुड़ा मसला दिसंबर में उनके मौजूदा कार्यकाल के अंत तक सुलझाना होगा। इस पर ही उनका दूसरा कार्यकाल टिका है। इसका एकमात्र समाधान यही है कि सभी केंद्रीय नेता 2014 के प्रधानमंत्री पद की अपनी दावेदारी को खत्म कर दें। नितिन गडकरी को लेकर भाजपा हाई कमान के व्यवहार से मैं हैरान हूं। कई फरजी पते वाली कंपनियों के बाद उनके पास पद पर बने रहने का कोई नैतिक आधार नहीं है। क्या रसोइया, ड्राइवर, डबल रोटी बनाने वाला और पंसारी करोड़ों रुपये के निवेश कर सकता है?

उधर, टीवी चैनल और प्रिंट मीडिया सार्वजनिक निगरानी के दायरे में आ गए हैं। मेरा मानना है कि चूंकि वे राजनीतिक क्षेत्र में आ गए हैं और उनमें से कुछ राजनीति कर रहे हैं, तो सभी टीवी चैनलों के लिए जरूरी है कि वे अपने शेयरों और कॉरपोरेट घरानों से मिले कर्जों की घोषणा करें। इसमें कुछ भी रहस्य नहीं है कि कई टीवी चैनल घाटा दिखाते हैं, लेकिन यह उनके मालिकों या खास एक्जीक्यूटिव की संपत्ति से परिलक्षित नहीं होता है।

ऐसे हालात में किसी के प्रति झुकाव स्वाभाविक है। जिंदल स्टील एवं जी टीवी से जुड़ा मुद्दा इसी का उदाहरण है, जो कुछ समय से सार्वजनिक क्षेत्र में है। हमने देखा ही कि सलमान खुर्शीद ने इंडिया टीवी को लीगल नोटिस जारी किया। भविष्य में स्टिंग ऑपरेशन और भ्रष्टाचार से संबंधित रिपोर्टों के प्रसारण को लेकर मीडिया के भीतर ही गहन पड़ताल की जरूरत होगी। इससे मीडिया की विश्वसनीयता ही बढ़ेगी।

इसमें कुछ भी छिपा नहीं है कि कॉरपोरेट युद्ध कई स्तरों पर लड़ा जाता है और मीडिया इससे अलग नहीं है। अफवाहों के आधार पर जब किसी कॉरपोरेट हाउस के खिलाफ निराधार आरोप लगाए जाते हैं, तो हम मान लेते हैं कि संबंधित मीडिया हाउस विरोधी या विरोधियों के विचारों का प्रतिनिधित्व करता है। आज प्रतिस्पर्द्धी दबाव के कारण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने अस्तित्व के लिए 'अनूठी खबर' और 'विस्तार' की तलाश में रहते हैं, इसमें पारदर्शिता की भारी जरूरत है।

गुजरात एवं हिमाचल के चुनावों को लेकर एक सर्वेक्षण आया है। उसमें जहां नरेंद्र मोदी की स्पष्ट जीत दर्शाई गई है, वहीं आश्चर्य नहीं कि हिमाचल में कांग्रेस एवं भाजपा के बीच कांटे की टक्कर के संकेत हैं। जाहिर है, आने वाले दिनों में वहां राजनीतिक खरीद-फरोख्त होगी और एक अकेला निर्दलीय विधायक भी बाजी पलट सकता है।
 
हम सोशल मीडिया के जमाने में जी रहे हैं, जहां कुछ भी गुप्त नहीं है और तकनीकी काफी उन्नत हो गई है। कुछ लोग तथ्यों के उजागर होने के इंतजार में रहते हैं और हर कोई अंधाधुंध निशाना साधने लगता है। वे जिन्हें फैसला लेना है, उनके लिए चुप रहना और कोई कदम उठाने से पहले सोचना जरूरी है। परेशानी की बात यह है कि सिरजने से ज्यादा हम बरबाद कर रहे हैं और अराजकताओं को आमंत्रित कर रहे हैं।
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