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इस निवेश की राजनीतिक कीमत

नीरजा चौधरी

Updated Tue, 25 Sep 2012 08:45 PM IST
political cost of investment
सरकार ने नीतिगत जड़ता से उबरकर तेज सुधारों की तरफ कदम बढ़ाया है। उसने कुछ घोषणाएं की हैं और कुछ और करने की तैयारी में है। ऐसा लगता है कि सरकार चुनौतियों से सीधे मुठभेड़ करना चाहती है। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश में बताया कि क्यों उनकी सरकार ने डीजल की कीमत में वृद्धि की, और मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) उसी नए समाधान का हिस्सा था।
सरकार के इन कदमों की अच्छाई और बुराई को छोड़ दें, तो यूपीए-दो सरकार में यह पहला मौका है, जब डॉ मनमोहन सिंह ने आक्रामक रुख अपनाया है। इस तरह से उन्होंने सरकार के खोए हुए अधिकार को बहाल किया है। इसने लोगों का ध्यान कोलगेट मुद्दे से हटाया है, जिसने मानसून सत्र में संसद के कामकाज को ठप कर ही दिया था, सरकार की छवि भी खराब की थी।

अब तक यूपीए-दो सरकार इस रूप में जानी जाती थी, जिसने खुद ही समस्याओं को आमंत्रित किया था। पिछले कुछ वर्षों में वह एक कदम आगे और दो कदम पीछे हटती रही। खैर, ममता बनर्जी के समर्थन वापस लेने और सपा एवं बसपा जैसे अविश्वसनीय सहयोगियों पर निर्भर होने के बावजूद सरकार सुधार कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि सरकार ने जान-बूझकर ममता बनर्जी के लिए जाल बिछाया और अचानक मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई को लागू किया, ताकि उससे छुटकारा पाकर वह अन्य सुधार कार्यक्रमों को बढ़ा सके, जिनका वह हर स्तर पर विरोध कर सकती थीं। ऐसे कई कारक हैं, जिसने अंततः सरकार को सुधार कार्यक्रमों के लिए प्रेरित किया।

ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि स्टेंडर्ड ऐंड पुअर्स जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने भारत की क्रेडिट रेटिंग घटा दी थी और कहा कि अगर तुरंत कुछ कदम नहीं उठाए गए, तो रेटिंग और भी गिर सकती है। टाइम पत्रिका एवं वाशिंगटन पोस्ट अखबार ने व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए उन्हें लक्ष्य हासिल करने में विफल बताया था। अगर यूपीए सरकार सुधारों को आगे नहीं बढ़ाती, तो कॉरपोरेट इंडिया उसे आगे सत्ता में रहने देने के पक्ष में नहीं था। कुछ लोगों को संदेह है कि पिछले दो वर्षों में जो घोटाले उजागर हुए, उसे लीक करने में भी कॉरपोरेट घरानों का हाथ था।

जबसे सोनिया गांधी ने अपने सांसदों से कहा है कि वे विपक्ष का मुकाबला करें, तबसे सरकार में अधिक स्पष्टता आई है। इसके अलावा, इसका एक अहम पहलू यह भी है कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री, दोनों एकमत हैं। वित्त मंत्री के रूप में प्रणब मुखर्जी ने मंत्रालय को जागीर के रूप में चलाया, जिसमें किसी को हस्तक्षेप की अनुमति नहीं थी।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समय कांग्रेस प्रधानमंत्री के साथ खड़ी है।

ऐसा लगता है कि यह हिसाब लगाया गया कि मौजूदा स्थिति में पहले की तरह रक्षात्मक होने के बजाय अगर कांग्रेस आक्रामक होती है, तो उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, अलबत्ता उसे कुछ फायदा ही हो सकता है। सरकार ने अपने सुधार कार्यक्रमों को वर्ष के अंत तक खाद्य सुरक्षा विधेयक एवं भूमि अधिग्रहण विधेयक जैसे लोकलुभावन उपायों के जरिये लागू करने की योजना बनाई है। ये दोनों विधेयक सोनिया गांधी को प्रिय हैं, पर सरकार के भीतर ही कई लोग इसका विरोध कर रहे हैं। लेकिन सवाल यही है कि सरकार के ताजा कदम से, जिसने कुछ समय के लिए उसे पहलकदमी का अधिकार वापस दिलाने में मदद की है, कांग्रेस को क्या कोई राजनीतिक लाभ मिलेगा।

सपा और बसपा ने अपने फायदे के लिए कुछ समय के लिए सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है। मायावती नहीं चाहतीं कि लोकसभा चुनाव शीघ्र हों, क्योंकि वह विधानसभा चुनाव में मिली हार से उबर नहीं पाई हैं। मगर ममता की तरह मुलायम सिंह को भी जल्दी चुनाव होने से फायदा होगा। जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, सत्ता विरोधी लहर काम करने लगेगी।

लेकिन मुलायम समर्थन वापस लेने का कदम तब तक नहीं उठाएंगे, जब तक वह सरकार के पतन के प्रति आश्वस्त न हो जाएं। फिर, वह दो मुश्किलों के बीच फंस सकते हैं, न तो उन्हें जल्दी चुनाव का लाभ मिलेगा और न ही केंद्र के साथ का फायदा, जो किसी भी राज्य सरकार के लिए महत्वपूर्ण होता है।

अब जबकि कांग्रेस शीर्ष स्तर पर संख्याबल के खेल में कामयाब रही है, उसकी असली लड़ाई जमीनी स्तर पर अपने बारे में उपजी नकारात्मक धारणाओं से निपटने में है। उसकी छवि घोटालों और महंगाई वाली सरकार की बन गई है, इन दोनों मुद्दों ने उस शहरी मध्यवर्ग को आक्रोशित किया है, जो वर्ष 2004 एवं 2009 में उसके पक्ष में था। चाहे डीजल की मूल्यवृद्धि हो, जिसका अन्य चीजों की कीमतों पर भी व्यापक प्रभाव होगा या बिजली की मूल्यवृद्धि, यह मध्य वर्ग के गुस्से को कम नहीं करनेवाला है।

प्रधानमंत्री बेशक लोगों को देश की मौजूदा चुनौतियों के मद्देनजर तैयार रहने और आज की स्थितियों को 1991 से जोड़कर समझाने में सफल रहे हों, लेकिन घोटालों के चलते विश्वसनीयता खोने के कारण मध्यवर्ग को अपने पक्ष में कर पाना कठिन हो गया है।

इस समय सरकार को कोई आसन्न खतरा नहीं है, फिर भी एक प्रमुख सहयोगी के अलग होने और अविश्वसनीय बाहरी समर्थन पर निर्भर होने के चलते इसकी स्थिति नाजुक हो गई है। ऐसे में राजनीतिक दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। कुल मिलाकर यूपीए सरकार ने 2012 में चुनाव को टाल दिया है, पर 2014 या जब भी चुनाव होंगे, उसके लिए कठिन समस्या होगी।

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