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कविता, गीत और संगीत

Abhishek Kumar

Abhishek Kumar

Updated Thu, 06 Sep 2012 05:16 PM IST
Poems songs and music
सवाल यह है कि क्या इस मौके पर कविता से संबंधित दूसरी जरूरी चर्चाएं भी हो रही हैं? आज कविता के लिए समाज में कितनी जगह रह गई है? जो जगह है भी, वो कैसी कविता के लिए है? कविता और गीत का क्या संबंध है? क्या कविता की गीतात्मकता पर फिर से बात होनी चाहिए? क्या हम कविता और फिल्मी गीतों पर एक साथ चर्चा कर सकते हैं? विचार होना चाहिए कि हिंदी जैसी बड़ी भाषा में कविता का गीतात्मकता से संबंध क्यों नहीं बन पाया? यह आकस्मिक नहीं है कि बांग्ला में रवींद्र नाथ ठाकुर अपने गीतों के माध्यम से ही ज्यादा जीवित हैं।
खुद उन्होंने ये लिखा भी कि उनकी दूसरी रचनाएं भले बिसरा दी जाएं पर उनके गीत बांग्ला समाज में हमेशा जीवित रहेंगे। यही हाल उर्दू के उन शायरों का रहा, जिनके फिल्मी गीत भी अच्छी कविता के रूप में याद किए जाते हैं। साहिर से लेकर कैफी आजमी जैसे कई नाम है, जिनके लिखे गाने आज भी लाखों करोड़ों लोगों को याद हैं। ये क्यों याद हैं? इसलिए कि इनका संगीत से मेल हुआ। गालिब, मीर और फैज की कई रचनाएं भी जब गायकों और गायिकाओं ने गाए तो वे लोगों की स्मृति में ज्यादा जीवित रहे। आज भी हैं।

निराला, महादेवी और पंत की रचनाएं भी अगर उस तरह से गाई जातीं, जिस तरह रवींद्र नाथ ठाकुर, फैज या साहिर वगैरह की गाई गईं या गाई जाती रहीं हैं, तो क्या वे और ज्यादा लोकप्रिय न होतीं। क्या हिंदी में कविता और संगीत का संबंध क्षीण रहने से कवियों की लोकप्रियता पर भी असर पड़ा? क्या कविता को इसका नुकसान उठाना पड़ा? ये एक आकलन का विषय है। पर इसमें तो कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि दुनिया भर में संगीत और कविता के मेल से दोनों को ही लाभ हुआ है।

वैसे तो मुक्त छंद वाली कविता में भी लय मौजूद होती है। लेकिन जिसे शब्द और स्वर का संयोग कहा जाता है उससे जो लय बनती है वह लंबे समय तक यानी युगों तक अपना प्रभाव बनाए रखती है। वेद मंत्र भी इसीलिए आज तक असरदार हैं कि वे संगीत की तरह हैं। मध्यकालीन भक्त कवियों- तुलसी, सूर, कबीर और मीरा की रचनाएं जब संगीत के साथ रच बस गईं, तो लोगों के गले का हार बन गईं।

ऐसा नहीं है कि मुक्त छंद की कविताएं महत्वहीन मानी जानी चाहिए। उनमें भी अर्थ का अक्षय कोष होता है। लेकिन हिंदी कविता जिस तरह तक पूरी तरह गीतात्मकता से मुक्त हो गई, उसने उसके प्रभाव को संकुचित कर दिया है। ये भी देखना चाहिए कि हिंदी के कवि फिल्मों के अच्छे गीतकार क्यों नहीं बन पाए? शैलेंद्र जैसे कुछ लोग इसके अपवाद जरूर हैं। आजकल प्रसून जोशी जैसे कुछ गीतकार जरूर उभरे हैं पर उन्हें भी हिंदी कविता में कोई जगह नहीं मिलती। क्या जिसे हम साहित्यिक विमर्श कहते हैं, वो किसी समकालीन सांस्कृतिक विमर्श से बिल्कुल अलग होना चाहिए।

हालांकि ये निष्कर्ष भी नहीं निकालना चाहिए कि जिसे गंभीर साहित्य कहा जाता है, उसको भी लोकप्रियता की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। लोकप्रियता एक मात्र कसौटी नहीं होनी चाहिए। कई बार ऐसा हुआ है कि बेहद अलोकप्रिय कहा गया लेखन भी आगे चलकर लोगों की चेतना और विचार को प्रभावित करता है। लेकिन यह भी रेखांकित किया जाना जरूरी है कि लोकप्रियता, खासकर लंबे वक्त तक टिकी रहनेवाली लोकप्रियता, भी एक गंभीर सांस्कृतिक महत्व की चीज है और गूढ़ विश्लेषण की मांग करती है। जरूरी नहीं कि हर कविता गीत की तरह लिखी जाए, लेकिन ये भी आवश्यक नहीं कि गीत भी अर्थ से आप्लावित न हो।
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