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लोकोपकार भी है ईश्वर भजन

शिवकुमार गोयल

Updated Fri, 16 Nov 2012 08:41 PM IST
philanthropic also god pray
हमारे नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि लौकिक कर्मकांड भगवद्भजन का प्रदर्शन मात्र है। अगर हम वाकई प्रभु की भक्ति करना चाहते हैं, तो हमें कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे लोग सद्कर्मों की ओर उन्मुख हों। इसी से जुड़ा एक प्रसंग महान बांग्ला नाटककार गिरीश घोष से संबंधित है, जो स्वामी रामकृष्ण परमहंस के अनन्य भक्त थे।
घोष के लिखे शिवाजी काव्य को पढ़कर रवींद्रनाथ ठाकुर गद्गद हो उठे थे। एक दिन श्री घोष स्वामी रामकृष्ण की धर्मपत्नी शारदा मां से मिलने जयरामवाटी आश्रम पहुंचे। मां का सारगर्भित प्रवचन सुना, तो उन्हें लगा कि सब व्यर्थ है। ऐसे में संन्यास लेकर भगवान की उपासना में जीवन बिता देना ही उचित है।

सुबह वह मां शारदामणि के चरणों में बैठकर बोले, मां, अब तक मैं नाटक और कविताएं लिखने और थिएटरों में अभिनय करने में अपना समय गंवाता रहा हूं। लेकिन अब संन्यास लेकर भगवान की उपासना में जीवन लगाना चाहता हूं।

मां ने यह सुना, तो मुसकराकर बोलीं, तुम्हारे लेखन से असंख्य पाठक प्रेरणा लेते हैं। तुम लोकोपकार के कार्य में लगे हुए हो। लोकोपकार से बढ़कर भला कौन-सा ईश्वर भजन है। मनुष्य के हर सुकृत्य के साथ स्वयमेव ईश्वर का भजन हो जाता है। गिरीश बाबू मां शारदा का मार्गदर्शन प्राप्त कर कृतकृत्य हो उठे। उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली।
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