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अब क्या जान लोगे बच्चे की!

मूलचंद गौतम

Updated Tue, 06 Nov 2012 09:57 PM IST
people struggle for gutkha
पहले के लोग रामायण के अलावा किसी गुटखा को नहीं जानते थे। नित्य पारायण करने के लिए था, यह चलता-फिरता गुटका। जैसे अब वेदांता कंपनी और वेदांत दर्शन में कोई फर्क नहीं रह गया है, उसी तरह आज गुटखे का मतलब नशे की पुड़िया हो गया है, जो पान का तुरंत विकल्प है। अब जमाना वस्तुओं का नहीं, ब्रांडों का है। जैसे ठंडा मतलब कोकाकोला है। आशीर्वाद और शक्तिभोग आज आटे के पर्याय हो गए हैं।
यही हाल गुटखे का है। पान पराग से लेकर राज दरबार, दिलबहार और भी न जाने क्या-क्या। गगन गुटखे ने तो नकली घी के एक मशहूर ब्रांड को ही पीट दिया है। डालडा अपने आप में एक ब्रांड हो गया है। गुटखे के हर ब्रांड के चाहने वाले। सबका अलग-अलग मजा। खातिरदारी का यह नया तरीका है, जिसमें पाउच को फाड़कर मुंह में डालने की एक खास शैली है। एक से मेरा क्या होगा? तो तुम दो लो। इसके बिना दिमाग काम नहीं करता। पहले दारू से दिमाग चलता था-उच्च विचारों का सृजन होता था। उसकी जगह अब गुटखे ने ले ली है। इसके साथ हैसियत का तंबाकू-तुलसी-बाबा आदि सब कितने सात्विक नाम हैं।

ऐसे परम पदार्थ पर प्रतिबंध लगाने वाले नेताओं के बुरे दिन शुरू हो गए हैं। आखिर भारत वेदांतियों का देश है। सिर पर कफन बांधकर कुछ भी करने वालों का देश। ऐसे देश में गुटखे पर प्रतिबंध? कौन नहीं जानता कि चीन कभी अफीमचियों का देश था। दूसरा नंबर तंबाकू का था। क्रांति के बाद सबसे पहले इन्हें खत्म किया गया, तब कहीं पिनकी चीनी सुधरे और आज दुनिया की एक नंबर की अर्थव्यवस्था के संचालक हैं। जबकि भारत ने आजाद होते ही नशे का सेवन बढ़ा दिया। शराब-विरोधी गांधी को धता बता दी, क्योंकि शराब और तंबाकू राजस्व के सबसे बड़े साधन हैं और इनके ज्यादातर कारोबारी विदेशी हैं। चीन ने बुद्ध को छोड़कर माओ को अपनाया और भारत ने गांधी को नकारकर उलटी दिशा में चलना शुरू कर दिया।
 
भारत अब तंबाकू युद्ध के कगार पर है। सरकार लगा दे गुटखे पर प्रतिबंध-हम गुटखा के पक्ष में करोड़ों के विज्ञापन देंगे। सिगरेट-शराब को भी बंद करो, वरना हमें भी छूट दो। इन्हें बंद करोगे, तो ब्लैक में हम चार गुना दामों पर बेचेंगे।  
गुटखा लॉबी ऐसे ही हथियार नहीं डाल देगी युद्ध में। आखिर जान थोड़े ही लोगे बच्चे की?
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