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पाकिस्तान फिर कुछ करेगा

महेंद्र वेद

Updated Wed, 21 Nov 2012 11:24 PM IST
pakistan will do again something
अजमल कसाब को फांसी एक न एक दिन दी ही जानी थी। मुंबई हमले के बाद उसका पकड़ा जाना भारत के लिए वरदान की तरह था। आतंकवादी घटनाओं में सामान्यतः ऐसा नहीं होता कि आतंकवादी पकड़े ही जाएं। वे या तो मारे जाते हैं या भागने में सफल हो जाते हैं। कसाब को जिंदा पकड़कर हमने पूरी दुनिया को पाकिस्तान का असली चेहरा दिखाया।
यही नहीं, अदालत में उसे अपना बचाव करने का पूरा अवसर दिया, और अंततः चार साल बाद कानूनी प्रक्रियाओं के तहत उसे मृत्युदंड दिया। इसलिए कसाब को फांसी देने के मामले में अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है। लेकिन इस दौरान पाकिस्तान के प्रति भारत के रवैये की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। तथ्य यह है कि हमारी सरकार ने पाकिस्तान के प्रति अपना रुख सख्त कर लिया है।

दोतरफा रिश्ते तो पहले से ही बहुत अच्छे नहीं थे, लेकिन अभी पाकिस्तान की जो स्थिति है, उसमें भारत के लिए राजनीतिक रूप से पहलकदमी करने के लिए कोई जगह बची नहीं है। वहां अगले साल चुनाव होने वाले हैं। राष्ट्रपति जरदारी की स्थिति बहुत खराब है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी कोई साख नहीं बची है, तो अपने देश में भी उनकी स्थिति डावांडोल है।

न्यायपालिका, सेना और राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान आपस में लड़ रहे हैं। आने वाले दिनों में वहां ऊंट किस करवट बैठेगा, इसके बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता। ऐसे में उससे रिश्ता सुधरे, तो कैसे? हम पाकिस्तान में बात करें, तो किससे? इसीलिए हमारी सरकार ने सोच-समझकर पाकिस्तान के साथ रिश्तों में बहुत उत्साह नहीं दिखाया है।

प्रधानमंत्री की पाकिस्तान यात्रा टल गई है, तो पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री रहमान मलिक की भारत यात्रा के प्रति भी हमारी सरकार ने उत्साह नहीं दिखाया। हालांकि इस बीच दोनों देशों के बीच क्रिकेट सीरीज होनी है, लेकिन वह दूसरा मामला है। क्रिकेट कूटनीति को आप चाहे जिस भी तरह देखें, ध्यान देने वाली बात यह है कि दोतरफा रिश्ते में उसकी बहुत जगह नहीं है।

कसाब की फांसी पर पाकिस्तान से जो शुरुआती संदेश मिले, वे बहुत अच्छे नहीं थे। बाद में इसलामाबाद ने हालांकि आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि कसाब से संबंधित नई दिल्ली की सूचना उसे मिल चुकी है। वह आतंकवाद के खिलाफ गंभीरता की बात भी करता रहा है, लेकिन उसका कोई बहुत मतलब नहीं है। इसलामाबाद चाहे जैसी भी प्रतिक्रिया जताए, हकीकत यह है कि कसाब की फांसी को पाकिस्तान ने गंभीरता से लिया है।

वैसे भी वहां के आम जनमानस में कट्टरवाद और आतंकवाद के प्रति सकारात्मक छवि है। पाकिस्तान में पल रहे 26/11 के गुनाहगार जब अदालत में पहुंचते हैं, तो वकील उनके पक्ष में नारे लगाते हैं और जज को धमकाते हैं कि इनके साथ गलत किया, तो अच्छा नहीं होगा। ऐसे में कसाब की मौत से भला वहां कौन खुश होगा! बल्कि वहां के लोग तो बदले की कार्रवाई के तहत अब सरबजीत को फांसी दे देने की मांग कर रहे हैं, जबकि उसका मामला अलग है।

यह बिलकुल हो सकता है कि अब सरबजीत की रिहाई का मामला और लटक जाए। बल्कि इस मामले के बाद पाकिस्तान के कट्टरपंथी भारत के खिलाफ और एकजुट हो जाएं, तो आश्चर्य नहीं होगा। कसाब की फांसी की प्रतिक्रिया आतंकवादियों की ओर से जरूर होगी। यह तर्क दिया जा सकता है कि ओसामा बिन लादेन की मौत का बदला नहीं लिया गया, लेकिन अमेरिका में 9/11 के बाद हमला करने की जुर्रत आतंकवादियों को नहीं हुई।

भारत का मामला अलग है। न तो आंतरिक सुरक्षा के मामले में अमेरिका से उसका मुकाबला हो सकता है, और न ही आतंकवाद के खिलाफ ताकत और तैयारी में महाशक्ति देश से हमारी कोई बराबरी है। हम बार-बार आतंकी हमलों का सामना करते आए हैं। इसके बावजूद आंतरिक सुरक्षा के मोरचे पर हम कई बार नाकाम साबित हुए हैं। इसलिए किसी भी आशंका से निपटने के लिए सीमाओं पर चौकसी बहुत जरूरी है। यहीं नहीं, बाहर भी भारत को निशाना बनाया जा सकता है, खासकर अफगानिस्तान में इसकी आशंका सर्वाधिक है। वहां ताकतवर हक्कानी समूह जल्दी ही जवाबी कार्रवाई को अंजाम दे, तो आश्चर्य नहीं होगा। इसीलिए सुरक्षा के मोरचे पर चुस्ती बहुत जरूरी है।
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